
दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 28 मार्च 2025 को फैसला सुनाया कि रेस्तरां और होटल भोजन बिलों में अनिवार्य रूप से सेवा शुल्क नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि यह उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करता है और अनुचित व्यापार प्रथा है। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह की एकल पीठ ने इस निर्णय में राष्ट्रीय रेस्तरां संघ (NRAI) और होटल और रेस्तरां संघ महासंघ (FHRAI) द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिन्होंने केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) के दिशानिर्देशों को चुनौती दी थी।
न्यायालय ने CCPA के उन दिशानिर्देशों को बरकरार रखा, जो होटल और रेस्तरां को भोजन बिलों में स्वचालित या डिफ़ॉल्ट रूप से सेवा शुल्क लगाने से रोकते हैं। इन दिशानिर्देशों के अनुसार:
- होटल या रेस्तरां भोजन बिल में स्वचालित या डिफ़ॉल्ट रूप से सेवा शुल्क नहीं जोड़ सकते।
- किसी अन्य नाम से सेवा शुल्क की वसूली नहीं की जा सकती।
- कोई होटल या रेस्तरां उपभोक्ता को सेवा शुल्क का भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता और उपभोक्ता को स्पष्ट रूप से सूचित करना चाहिए कि सेवा शुल्क स्वैच्छिक, वैकल्पिक और उपभोक्ता के विवेक पर निर्भर है।
- सेवा शुल्क की वसूली के आधार पर उपभोक्ताओं पर प्रवेश या सेवाओं के प्रावधान पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा।
- सेवा शुल्क को भोजन बिल के साथ जोड़कर और कुल राशि पर जीएसटी लगाकर एकत्र नहीं किया जाएगा।
न्यायालय ने कहा कि सेवा शुल्क या टिप उपभोक्ता द्वारा स्वैच्छिक भुगतान है और इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। रेस्तरां द्वारा इसे अनिवार्य रूप से वसूलना उपभोक्ता हितों के खिलाफ है और उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन करता है।
इसके अलावा, न्यायालय ने NRAI और FHRAI पर प्रत्येक पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया, जिसे उपभोक्ता कल्याण के लिए CCPA के पास जमा करना होगा। www.ndtv.com
यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करता है और रेस्तरां और होटल उद्योग में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देता है। अब उपभोक्ताओं को यह स्वतंत्रता होगी कि वे सेवा से संतुष्ट होने पर अपनी इच्छा से टिप दें, बिना किसी अनिवार्य शुल्क के।
