छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की जमीन को लेकर एक पुराना विवाद फिर चर्चा में है। रायपुर निवासी किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और आसपास का हिस्सा उनके पूर्वजों की जमीन पर बना है। उनका कहना है कि वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने यह जमीन अस्थायी रूप से सैन्य जरूरतों के लिए ली थी, जिसे युद्ध समाप्त होने के बाद वापस किया जाना था।

अश्विनी बांधे पिछले करीब 35 वर्षों से इस मामले को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि जून 2026 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लगभग ₹3,500 करोड़ के मुआवजे की मांग की है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने उनके दावे पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है और मामला विचाराधीन है।
बांधे के अनुसार, उनके परिवार की करीब 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन माना क्षेत्र में थी, जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत अधिग्रहित किया गया था। उनका दावा है कि युद्ध समाप्त होने के बाद यह कानून समाप्त हो गया था, इसलिए जमीन वापस मिलनी चाहिए थी।
किसान का कहना है कि हाल ही में संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ऐतिहासिक दस्तावेजों की प्रदर्शनी में उन्हें ऐसे सरकारी रिकॉर्ड मिले, जिनमें उनके पूर्वजों की जमीन का उल्लेख है। उन्होंने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत इन दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां भी प्राप्त की हैं, जिन्हें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपने दावे के समर्थन में प्रस्तुत किया है।
संस्कृति विभाग के अधिकारियों ने भी पुष्टि की है कि विभाग के अभिलेखों में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान माना एयरफील्ड के लिए अधिग्रहित जमीन से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित हैं, जिनमें कई किसानों और भू-स्वामियों के नाम दर्ज हैं। हालांकि, इन दस्तावेजों से किसी के स्वामित्व या मुआवजे के दावे पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अश्विनी बांधे का कहना है कि अधिग्रहण के बाद समय पर मुआवजा नहीं मिलने और ब्याज सहित विभिन्न कानूनी प्रावधानों के आधार पर उन्होंने करीब ₹3,500 करोड़ का दावा किया है। उनका यह भी कहना है कि नवा रायपुर क्षेत्र की कुछ अन्य जमीनों को लेकर भी अलग-अलग विवाद लंबित हैं।
नोट: यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। किसान द्वारा किए गए दावे पर अभी न्यायालय का अंतिम फैसला आना बाकी है। संबंधित सरकारी विभागों का विस्तृत पक्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने पर स्थिति स्पष्ट होगी।



