भगवान जगन्नाथ की पावन रथयात्रा आज रायपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में श्रद्धा और भक्ति के साथ निकाली जाएगी। शहर के विभिन्न जगन्नाथ मंदिरों से तय समय और मार्गों पर भव्य शोभायात्राएं निकलेंगी। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन और आयोजन समितियों ने सुरक्षा, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाएं पूरी कर ली हैं।
रायपुर की रथयात्रा की सबसे खास परंपराओं में से एक ‘छेरापहरा’ है। इस रस्म में भगवान जगन्नाथ के रथ के आगे करीब सवा किलो वजनी दो स्वर्ण झाड़ुओं से मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई की जाती है। परंपरा के अनुसार एक झाड़ू राज्यपाल और दूसरी मुख्यमंत्री द्वारा चलाकर पुरी की सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया जाता है।
रथयात्रा से पहले शहर के प्रमुख जगन्नाथ मंदिरों को फूलों और आकर्षक सजावट से सजाया गया है। जिन मार्गों से रथयात्रा निकलेगी, वहां विशेष साफ-सफाई, सुरक्षा और यातायात प्रबंधन की व्यवस्था की गई है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि घर से निकलने से पहले ट्रैफिक रूट की जानकारी अवश्य लें और पुलिस के निर्देशों का पालन करें।
रथयात्रा की तैयारियों के तहत ओडिशा से आए कलाकारों ने गायत्री नगर स्थित जगन्नाथ मंदिर और रथों को पारंपरिक शैली में सजाया है। मंदिर की दीवारों, प्रवेश द्वार और रथों पर पुरी की तर्ज पर धार्मिक चित्रकारी और रंगीन अलंकरण किए गए हैं। वहीं, पूजा-अर्चना और सभी धार्मिक अनुष्ठानों को विधि-विधान से संपन्न कराने के लिए ओडिशा से पुजारियों को भी आमंत्रित किया गया है, ताकि श्रद्धालुओं को पुरी जैसी आध्यात्मिक अनुभूति मिल सके।
रायपुर की पुरानी बस्ती स्थित टुरी-हटरी जगन्नाथ मंदिर शहर के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। लगभग 500 वर्ष पुराने इस मंदिर को पहले ‘साहूकार मंदिर’ के नाम से जाना जाता था। अग्रवाल परिवार द्वारा निर्मित इस मंदिर का बाद में विस्तार और सौंदर्यीकरण कराया गया। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा स्थापित होने के बाद इसकी पहचान जगन्नाथ मंदिर के रूप में स्थापित हुई।
मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथ के अलावा श्रीराम दरबार, दो शिव मंदिर, संतोषी माता मंदिर, गरुड़ मंदिर और संकटमोचन हनुमान मंदिर भी स्थित हैं। यही कारण है कि यह मंदिर केवल रथयात्रा के दौरान ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहता है।