राजधानी रायपुर के भाठागांव बस स्टैंड से संचालित नेशनल परमिट बसों के यात्रियों को इन दिनों गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इन बसों का किराया किसी तय सरकारी नियम या फॉर्मूले पर नहीं, बल्कि बस मालिकों और ऑपरेटर्स की मनमर्जी पर निर्भर है। हालात ऐसे हैं कि फ्लाइट टिकट की तरह बसों का किराया हर आधे घंटे में घट-बढ़ रहा है।
यात्रियों की संख्या बढ़ते ही किराया अचानक बढ़ा दिया जाता है और सीटें खाली रहने पर रेट कम कर दिए जाते हैं। ऑपरेटर्स लगातार ऑनलाइन बुकिंग स्टेटस पर नजर रखते हैं। इसी वजह से एक ही रूट पर अलग-अलग ऑपरेटरों की बसों में कुछ घंटों के भीतर ही 150 से 300 रुपये तक का अंतर देखने को मिल रहा है।
खासकर नेशनल परमिट और टूरिस्ट परमिट पर चलने वाली बसों में यह उतार-चढ़ाव सबसे ज्यादा है। यात्रियों का कहना है कि उन्हें टिकट लेते वक्त यह अंदाजा ही नहीं होता कि अगली बस में किराया कितना होगा।
परिवहन विभाग की मजबूरी
परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि दूसरे राज्यों में जाने वाली कई बसें ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट के तहत चलती हैं। इन बसों के किराए पर राज्य सरकार का कोई सीधा नियंत्रण नहीं होता। विभाग केवल सुरक्षा मानकों, दस्तावेजों और नियमों का पालन सुनिश्चित करता है।
यदि टूरिस्ट परमिट वाली बसें रास्ते में सवारी चढ़ाने या उतारने के दौरान पकड़ी जाती हैं, तो उन पर कार्रवाई की जाती है, लेकिन किराया तय करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
बस मालिकों का तर्क, विशेषज्ञों की आपत्ति
बस ऑपरेटरों का दावा है कि डीजल-पेट्रोल की कीमतें, मौसम, ट्रैफिक और यात्रियों की संख्या के आधार पर किराया बदलना मजबूरी है। उनका कहना है कि भीड़ ज्यादा होने पर किराया बढ़ाया जाता है और बस खाली रहने पर रेट घटा दिए जाते हैं।
हालांकि परिवहन विशेषज्ञ इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि बार-बार और बिना नियम के किराया बदलना यात्रियों के साथ खुली मनमानी है, जिसे किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता।
तीन महीने का होता है टूरिस्ट परमिट
परिवहन विभाग के अनुसार, टूरिस्ट परमिट की बसों को करीब 90 हजार रुपये फीस देकर केवल तीन महीने के लिए परमिट मिलता है। इन बसों का उपयोग आमतौर पर शादी, टूर या अनुबंधित यात्राओं के लिए किया जाता है। इनके किराए का निर्धारण अधिकतर दिल्ली स्तर से होता है।
भाठागांव बस स्टैंड पर किराए की खुली लूट
प्रदेश के सबसे बड़े अंतरराज्यीय बस अड्डे भाठागांव में स्थिति और भी चौंकाने वाली है। यहां हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, इंदौर, उज्जैन जैसे शहरों के लिए खड़ी बसों में एक ही समय पर अलग-अलग किराए वसूले जा रहे हैं।
कहीं पुणे का किराया 1600 रुपये बताया जा रहा है, तो कुछ ही मिनट बाद दूसरी बस के लिए वही किराया 1900 या 2200 रुपये हो जाता है। इसी तरह बेंगलुरु और प्रतापगढ़ जैसे रूटों पर भी सैकड़ों रुपये का फर्क सामने आ रहा है।
प्रदेश में बस किराए के तय नियम
राज्य में स्टेज कैरिज बसों के लिए किराया पहले से निर्धारित है—
- प्रदेश में लगभग 14,000 बसें संचालित
- साधारण बस का किराया: 1 रुपये प्रति किमी
- एसी बस का किराया: 2.20 रुपये प्रति किमी
- रात में चलने वाली एसी बस: 3 रुपये प्रति किमी
- रायपुर से करीब 500 बसें टूरिस्ट परमिट पर संचालित
नियम क्या कहता है?
नियमों के मुताबिक, टूरिस्ट परमिट वाली बसें केवल अनुबंधित या पर्यटन यात्रियों को ही ले जा सकती हैं। ये नियमित इंटरस्टेट या सामान्य बस सेवाओं की तरह सवारी नहीं उठा सकतीं।
इसके बावजूद, भाठागांव बस स्टैंड पर चल रही व्यवस्था यात्रियों के लिए परेशानी और जेब पर सीधा असर डाल रही है। अब सवाल यह है कि आखिर इस मनमानी पर लगाम कौन लगाएगा?

