EOW पर कोयला घोटाले में बड़ा आरोप: कोर्ट ने डायरेक्टर, ASP और DSP को भेजा नोटिस – भूपेश बघेल बोले, “क्या अब जांच एजेंसियां सुपारी ले रही हैं?”

छत्तीसगढ़ के चर्चित कोल घोटाला मामले में एक बड़ा मोड़ आया है। रायपुर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने EOW (Economic Offences Wing) और ACB (Anti-Corruption Bureau) के तीन अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि एजेंसी ने आरोपी निखिल चंद्राकर का बयान कोर्ट में दर्ज कराने की बजाय पहले से टाइप किया गया बयान पेश किया।

🔍 कोर्ट ने मांगा जवाब

न्यायालय ने EOW निदेशक अमरेश मिश्रा, ASP चंद्रेश ठाकुर और DSP राहुल शर्मा से स्पष्टीकरण मांगा है। यह मामला तब सामने आया जब कोल स्कैम के मुख्य आरोपी सूर्यकांत तिवारी की जमानत पर सुनवाई के दौरान टाइप्ड बयान वाले दस्तावेज अदालत में पेश किए गए। तिवारी के वकीलों ने इसे लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।

⚖️ आरोप: बाहर तैयार किया गया बयान

शिकायतकर्ता गिरीश देवांगन का कहना है कि जिस बयान की कॉपी कोर्ट को दी गई, वह अदालत की भाषा या फॉर्मेट से मेल नहीं खाती। उपयोग किया गया फॉन्ट भी अदालतों में प्रचलित फॉन्ट नहीं था। आरोप है कि बयान कोर्ट में नहीं बल्कि किसी कंप्यूटर पर टाइप किया गया, फिर पेनड्राइव के जरिए कोर्ट में जमा कर दिया गया।

🧾 फोरेंसिक जांच से खुलासा

गिरीश देवांगन ने इस मामले की शिकायत हाईकोर्ट और रायपुर की मजिस्ट्रेट कोर्ट में की है। उन्होंने दस्तावेजों की जांच फोरेंसिक विशेषज्ञ इमरान खान से कराई, जिनकी रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि बयान अदालत के मूल फॉर्मेट से अलग है।

⚠️ गंभीर उल्लंघन का मामला

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी अभियुक्त का बयान धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष ही दर्ज होना चाहिए। अगर यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन और अदालत के साथ धोखाधड़ी (Forgery & Misrepresentation) का मामला बन सकता है।

🗣️ भूपेश बघेल का तीखा हमला

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया –

“क्या अब जांच एजेंसियां झूठे बयान और सबूत खुद बनाने लगी हैं? किसी को फंसाने के लिए सुपारी ले रही हैं क्या?”

उन्होंने कहा कि अगर एजेंसियां खुद ही फर्जी साक्ष्य तैयार करेंगी, तो किसी आम नागरिक को न्याय मिलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

⚖️ कानूनी विशेषज्ञों की राय

वरिष्ठ अधिवक्ता फैजल रिजवी ने कहा कि भारत में यह पहला मामला है जब किसी जांच एजेंसी ने मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्त का बयान दर्ज कराने की जगह ऑफिस में टाइप किया गया बयान अदालत में जमा किया। यह न केवल अदालत से धोखाधड़ी है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 (न्याय के अधिकार) का भी खुला उल्लंघन है।

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