दंतेवाड़ा जिले में व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कमी अब पर्यावरण के लिए बड़ी चिंता बनती जा रही है। गैस आपूर्ति बाधित होने के कारण होटल, रेस्टोरेंट, आश्रम-छात्रावास और पोटाकेबिनों में फिर से लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल शुरू हो गया है। इससे जहां कारोबार प्रभावित हो रहा है, वहीं जंगलों पर दबाव बढ़ने के साथ अवैध कटाई भी तेज हो गई है।
जानकारी के अनुसार पिछले करीब 20 दिनों से जिले में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की सप्लाई लगभग बंद है। इसका सबसे ज्यादा असर होटल व्यवसाय पर पड़ा है। कई छोटे होटल बंद हो चुके हैं, जबकि कुछ संचालक मजबूरी में लकड़ी जलाकर भोजन बना रहे हैं। होटल संचालकों का कहना है कि गैस उपलब्ध नहीं है और जो मिल रही है वह महंगी है, इसलिए 4 से 5 हजार रुपये में मिलने वाली एक ट्रैक्टर लकड़ी उनके लिए सस्ता विकल्प बन गई है।

जंगलों पर बढ़ा दबाव
इस स्थिति का फायदा उठाकर जंगलों में अवैध कटाई बढ़ रही है। कुआकोंडा और कटेकल्याण क्षेत्रों में खुलेआम लकड़ी काटकर लाई जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निगरानी कमजोर होने के कारण यह गतिविधियां बिना रोक-टोक जारी हैं।
संस्थानों में भी लकड़ी का उपयोग बढ़ा
आश्रम, छात्रावास, जेल और अस्पतालों में घरेलू गैस सिलेंडर उपयोग की अनुमति होने के बावजूद लकड़ी पर निर्भरता बढ़ना चिंता का विषय बन गया है। इससे पर्यावरण को नुकसान होने के साथ नियमों की अनदेखी भी हो रही है। वन विभाग और प्रशासन की निष्क्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
आश्रम-छात्रावासों में सबसे ज्यादा असर
जिले में लगभग 128 आश्रम-छात्रावास और 17 पोटाकेबिन संचालित हैं, जहां 20 हजार से अधिक छात्रों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। पहले यहां गैस और लकड़ी दोनों का उपयोग होता था, लेकिन अब पूरी तरह लकड़ी पर निर्भरता बढ़ गई है। कई संस्थानों में गैस सिलेंडरों का स्टॉक खत्म हो चुका है।
स्थिति यह है कि प्रत्येक आश्रम-छात्रावास में औसतन 100 क्विंटल तक लकड़ी जमा की गई है और रोजाना करीब 100 क्विंटल लकड़ी की खपत हो रही है। यह लकड़ी अधिकृत डिपो से नहीं, बल्कि जंगलों से अवैध रूप से लाई जा रही बताई जा रही है।
तत्काल समाधान की मांग
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से व्यावसायिक गैस की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने और जंगलों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जल्द व्यवस्था नहीं सुधरी तो वन क्षेत्र को भारी नुकसान हो सकता है और पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।

