देशभर में आपातकालीन सेवाओं को अधिक सरल और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। आने वाले समय में पुलिस, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस और अन्य सभी इमरजेंसी सेवाओं के लिए अलग-अलग हेल्पलाइन नंबरों की जगह केवल डायल-112 का इस्तेमाल किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर 100, 101, 102, 108, 1033, 1091 समेत सभी आपातकालीन नंबरों को 112 में शामिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही इस प्रक्रिया की प्रगति रिपोर्ट भी अदालत में प्रस्तुत करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस दिशा में तैयारी शुरू कर दी है। गृह विभाग के अधिकारियों ने हाल ही में बैठक कर सभी इमरजेंसी सेवाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाने की योजना पर चर्चा की। इसके लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है, ताकि सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।
वर्तमान में प्रदेश में लगभग 400 डायल-112 वाहन और करीब 375 एंबुलेंस 108 सेवा के तहत संचालित हैं। अभी किसी मेडिकल आपात स्थिति की सूचना डायल-112 से 108 सेवा को भेजी जाती है, जबकि आग लगने जैसी घटनाओं की जानकारी अलग प्रणाली के माध्यम से फायर विभाग तक पहुंचती है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद सभी सूचनाएं एक ही सिस्टम के जरिए संबंधित विभाग तक पहुंचेंगी, जिससे प्रतिक्रिया का समय कम होगा और राहत कार्य तेजी से शुरू किया जा सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई 2026 को सेव लाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने माना कि सहायता मिलने में देरी कई बार जानलेवा साबित होती है, इसलिए पूरे देश में एकीकृत आपातकालीन व्यवस्था आवश्यक है।
छत्तीसगढ़ में डायल-112 सेवा की शुरुआत 15 अगस्त 2018 को “एक्के नंबर, सब्बो बर” अभियान के साथ हुई थी। बाद में इस सेवा का विस्तार राज्य के सभी 33 जिलों तक किया गया। वर्तमान में डायल-112 प्रतिदिन लगभग 10 हजार कॉल संभाल रहा है। 20 मई से 16 जून 2026 के बीच इस सेवा पर 3,06,264 कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें 79,782 घटनाएं दर्ज की गईं।
सुप्रीम Court ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया है कि सड़क दुर्घटना के घायलों को कैशलेस इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाए, गुड सेमेरिटन कानून का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाए, सभी एंबुलेंस में जीपीएस और व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम अनिवार्य हो, पैरामेडिकल कर्मचारियों को मानकीकृत प्रशिक्षण दिया जाए, ट्रॉमा सेंटरों की ग्रेडिंग की जाए और नई व्यवस्था की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जाए।

