डोंगरगांव ब्लॉक के ग्राम बगदई के किसान तोरनदास साहू ने रासायनिक खेती छोड़कर 2015 से जैविक खेती अपनाई और अब एक एकड़ में 26 क्विंटल तक धान का उत्पादन कर रहे हैं। उन्हें गोमूत्र के गुणों का अनुभव होने के बाद खेतों में जैविक तरीके से फसल उगाने का तरीका मिला। दिसंबर 2025 में तोरनदास को नई दिल्ली में फार्मर ऑफ द ईयर अवार्ड से सम्मानित किया गया।
तोरनदास अपनी 3 एकड़ 70 डिसमिल जमीन पर खरीफ और रबी में धान के साथ चना, मसूर, आलू, पत्तेदार सब्जियों की खेती करते हैं। उनके खेतों में गोबर और गोमूत्र से तैयार जैविक खाद, जीवामृत और नीमास्त्र का इस्तेमाल किया जाता है। यह न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है बल्कि फसल को रोग और कीटों से भी बचाता है।
जैविक कीटनाशक और फसल सुरक्षा
तोरनदास ने जैविक कीटनाशक ब्रह्मास्त्र और नीमास्त्र तैयार किए हैं। इसमें नीम की पत्तियां, करंज, सीताफल, धतूरे, हरी मिर्च, लहसुन और गोमूत्र का मिश्रण होता है। इसे उबालकर या 48 घंटे के लिए छांव में रखा जाता है और शाम को खेत में छिड़काव किया जाता है। इसके अलावा जीवामृत तैयार करके मिट्टी की गुणवत्ता और बीज उपचार में इस्तेमाल किया जाता है।

लागत और लाभ
रासायनिक खेती में प्रति एकड़ खर्च लगभग 20 हजार रुपए होता है, जबकि जैविक खेती में यह केवल 15 हजार रुपए है। डीएपी और यूरिया खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। बेहतर मिट्टी प्रबंधन और जोताई से अतिरिक्त 5 हजार रुपए की बचत होती है। जैविक खेती से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि लागत भी कम होती है और लाभ अधिक होता है।
स्थानीय किसानों और प्रशिक्षण
तोरनदास के अनुभव से उनके गांव के कमल साहू और श्यामलाल साहू ने भी जैविक खेती अपनाई और कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल किया। उन्होंने लोहे और लकड़ी से दतारी नामक यंत्र बनाया, जो ट्रैक्टर से बेहतर जोताई करता है। इसके अलावा पक्षियों और चूहों को दूर रखने के लिए भी यंत्र विकसित किया। 2023-24 में तोरनदास ने 200 कृषि सखियों को अपने गांव में जैविक खेती का प्रशिक्षण भी दिया।

