ट्रांसजेंडर समुदाय में आक्रोश: नए संशोधन बिल से पहचान और भविष्य पर संकट

Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026 के पास होने के बाद देशभर में ट्रांसजेंडर समुदाय में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। Raipur सहित कई जगहों पर लोग इस कानून के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। समुदाय का कहना है कि यह बिल उनकी पहचान, शिक्षा, रोजगार और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर डाल सकता है।

“पहचान ही खत्म हो रही है”

रायपुर में रहने वाले अभिनव कुमार (बदला हुआ नाम) का कहना है कि इस नए कानून से उनकी पहचान पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। उनका कहना है कि अगर उनकी पहचान को ही मान्यता नहीं मिलेगी, तो वे खुद को समाज में कैसे साबित करेंगे। उनका दर्द यह है कि वे न पूरी तरह पुरुष माने जा रहे हैं, न महिला — ऐसे में उनकी स्थिति क्या होगी, इसका कोई जवाब नहीं है।

मेडिकल जांच और सख्त नियमों का विरोध

समुदाय के लोगों का कहना है कि पहले जहां स्व-पहचान (self-identification) को मान्यता थी, अब इस संशोधन में मेडिकल जांच और सख्त प्रक्रिया को अनिवार्य बनाया जा रहा है। उनका मानना है कि यह उनकी गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

पढ़ाई और नौकरी पर खतरा

अभिनव बताते हैं कि उनके दस्तावेजों में जेंडर मिसमैच होने के कारण उन्हें कई कॉलेजों में एडमिशन नहीं मिला। बड़ी मुश्किल से NALSA Judgment 2014 का हवाला देने के बाद उन्हें दाखिला मिला। अब उन्हें डर है कि नए कानून के लागू होने पर उनकी पढ़ाई भी खतरे में पड़ सकती है।

नौकरी के क्षेत्र में भी उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। पहचान स्पष्ट न होने के कारण न निजी क्षेत्र में अवसर मिल रहे हैं, न सरकारी नौकरी में।

सर्जरी के बाद भी असुरक्षा

अभिनव ने अपनी पहचान के लिए काफी संघर्ष किया और करीब एक लाख रुपए खर्च कर सर्जरी करवाई। उनका कहना है कि सर्जरी के बाद उन्हें लगा था कि अब वे अपनी असली पहचान के साथ जी पाएंगे, लेकिन नए कानून के बाद फिर से सब कुछ अनिश्चित हो गया है।

दस्तावेज रद्द होने का डर

रायपुर की चांद किन्नर का कहना है कि इस बिल के कारण आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज भी रद्द होने का खतरा है। उनका सवाल है कि अगर ऐसा हुआ, तो वे जीवनयापन कैसे करेंगी।

“सालों की मेहनत पलभर में खत्म”

बॉबी फारिकार का कहना है कि उन्होंने सालों की मेहनत से अपनी पहचान और जीवन बनाया है, लेकिन अब उन्हें डर है कि यह सब कुछ एक झटके में खत्म हो सकता है। उन्होंने कहा कि अगर यह बिल वापस नहीं लिया गया, तो वे इसके खिलाफ आंदोलन जारी रखेंगे।

सरकार का पक्ष

इस मामले में छत्तीसगढ़ कॉलेज, रायपुर के विधि विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र करवंदे का कहना है कि सरकार का उद्देश्य वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना है, ताकि जरूरतमंद लोगों तक सही लाभ पहुंच सके। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि मेडिकल सर्टिफिकेट को अनिवार्य करना स्व-पहचान के अधिकार को प्रभावित कर सकता है, जो 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत है।

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