पद्मश्री विजेता और ओलंपिक पदक विजेता वेटलिफ्टर साइखोम मीराबाई चानू ने अपने संघर्ष और सफलता की कहानी साझा करते हुए बताया कि उनकी ताकत और जिद की शुरुआत बचपन की एक घटना से हुई थी। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 के उद्घाटन के लिए रायपुर पहुंचीं चानू ने कहा कि जब वह हार मानने लगी थीं, तब उनकी मां के शब्दों ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

भाई की चुनौती बनी टर्निंग पॉइंट
चानू ने बताया कि जब वह 13–14 साल की थीं, तब हर सप्ताह पहाड़ों पर जाकर लकड़ियां इकट्ठा करती थीं। एक बार भारी गट्ठा उठाना मुश्किल हो रहा था तो उनके भाई ने कहा कि यह तुमसे नहीं होगा। लेकिन जिद के कारण उन्होंने वह गट्ठा खुद उठाकर घर तक पहुंचाया। उसी क्षण उन्होंने तय कर लिया कि वह वेटलिफ्टर बनेंगी।
एशियन गेम्स पर नजर, चोटों से मिली सीख
उन्होंने बताया कि फिलहाल उनका पूरा ध्यान आगामी एशियन गेम्स की तैयारी पर है। पिछले वर्षों में चोटों के कारण कई बार लक्ष्य से चूकना पड़ा, लेकिन अब वह पूरी तरह फिट हैं और रोजाना कड़ी ट्रेनिंग कर रही हैं ताकि इस बार देश के लिए बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकें।
वेटलिफ्टिंग में आया बड़ा बदलाव
चानू के अनुसार, पहले राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीतना जरूरी लक्ष्य था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया जा सके। 2015 के बाद वेटलिफ्टिंग में डाइट, फिटनेस और स्पोर्ट्स साइंस पर काफी ध्यान बढ़ा है, जिससे खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर हुआ है।
फिल्म बने तो दिखेगा संघर्ष
उन्होंने कहा कि अगर उनकी जिंदगी पर फिल्म बनती है तो उसमें सफलता से ज्यादा संघर्ष को दिखाया जाना चाहिए, क्योंकि लोग पदक देखते हैं, लेकिन उसके पीछे की मेहनत और मुश्किलों को नहीं जानते।
25 किमी दूर ट्रेनिंग के लिए ट्रकों से लेती थीं लिफ्ट
चानू ने शुरुआती दिनों की कठिनाइयों को याद करते हुए बताया कि उनके घर के पास प्रशिक्षण की सुविधा नहीं थी। उन्हें रोजाना 25 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग के लिए जाना पड़ता था। आने-जाने के लिए कोई साधन नहीं होने पर वह ट्रकों से लिफ्ट लेकर पहुंचती थीं। कई साल तक सीमित साधनों में केवल दाल-चावल खाकर ही ट्रेनिंग जारी रखी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

