नर्सरी, पीपी-1 और पीपी-2 में गरीब बच्चों की एंट्री बंद, अभिभावकों पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव
छत्तीसगढ़ सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए प्रावधान के अनुसार अब निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों पर गरीब परिवारों के बच्चों को नर्सरी के बजाय सीधे कक्षा-1 से ही प्रवेश मिलेगा। यह व्यवस्था आगामी शैक्षणिक सत्र से लागू होगी।
सरकार के इस फैसले से राज्य को सालाना करीब 63 करोड़ रुपए की बचत होगी, लेकिन इसका सीधा असर गरीब परिवारों और उनके बच्चों पर पड़ेगा। पहले जहां नर्सरी से ही बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिलती थी, अब अभिभावकों को नर्सरी, पीपी-1 और पीपी-2 की पूरी फीस खुद वहन करनी होगी।
क्यों बदला गया नियम
आरटीई अधिनियम के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार दिया गया है। इसी आधार पर निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रहती हैं। करीब 12 साल पहले छत्तीसगढ़ में नर्सरी से ही RTE के तहत दाखिले की अनुमति दी गई थी, लेकिन नए निर्देशों में इसे खत्म कर दिया गया है। अब सिर्फ कक्षा-1 को ही प्रवेश कक्षा माना जाएगा।
गरीब बच्चों के सामने मुश्किलें
इस बदलाव के बाद बड़ी संख्या में गरीब परिवारों के बच्चे कक्षा-1 से पहले निजी स्कूलों में पढ़ाई नहीं कर पाएंगे। जो अभिभावक फीस चुकाने में सक्षम होंगे, वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों की प्री-प्राइमरी कक्षाओं में दाखिला दिलाएंगे। वहीं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के पास आंगनबाड़ी या सीमित सरकारी विकल्प ही बचेंगे। अधिकांश सरकारी स्कूलों में नर्सरी की सुविधा नहीं है, सिर्फ कुछ आत्मानंद स्कूलों में ही पीपी-1 और पीपी-2 संचालित हैं।
फायदे और नुकसान
नुकसान
- गरीब परिवारों पर लगभग तीन गुना आर्थिक बोझ
- नर्सरी और प्री-प्राइमरी की फीस अब खुद देनी होगी
फायदा
- सरकार को हर साल करीब 63 करोड़ रुपए की बचत
शिक्षा विशेषज्ञों की चिंता
शिक्षाविदों का मानना है कि 3 से 6 वर्ष की उम्र बच्चों के विकास के लिए सबसे अहम होती है। इस उम्र में भाषा, व्यवहार और सीखने की बुनियाद पड़ती है। नर्सरी और प्री-प्राइमरी शिक्षा से वंचित रहने पर गरीब बच्चों का शैक्षणिक स्तर कमजोर रह सकता है। इससे आत्मविश्वास में कमी, पढ़ाई में पिछड़ना और ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ सकता है।
खर्च का गणित ऐसे समझें
इस सत्र में प्रदेश के 6,947 निजी स्कूलों में RTE के तहत करीब 53 हजार सीटें थीं। इनमें से लगभग 30 हजार सीटें नर्सरी स्तर की थीं। सरकार प्रति छात्र 7 हजार रुपए सालाना की प्रतिपूर्ति करती थी। यदि नर्सरी से लेकर केजी तक 90 हजार बच्चों को शामिल किया जाए, तो सरकार पर लगभग 63 करोड़ रुपए का वार्षिक खर्च आता था, जो अब बचेगा।
एक्सपर्ट की राय
शिक्षाविद राजीव गुप्ता के अनुसार, यह फैसला शैक्षणिक असमानता को और बढ़ाएगा। नर्सरी और प्री-प्राइमरी शिक्षा से वंचित बच्चे फॉनिक्स, बुनियादी शब्दावली और कक्षा की दिनचर्या से अनजान रहेंगे। इससे कक्षा-1 का अंग्रेजी माध्यम पाठ्यक्रम उनके लिए भारी साबित होगा। परिणामस्वरूप स्कूलों में रेमेडियल क्लासेस की जरूरत पड़ेगी, लेकिन संसाधनों की कमी इसे मुश्किल बना देगी। यह स्थिति अभिभावकों पर मानसिक दबाव बढ़ाएगी और बच्चों के स्कूल छोड़ने की आशंका भी बढ़ा सकती है।

