छत्तीसगढ़ के शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में धर्मांतरण के तरीकों में बदलाव देखा गया है। अब मिशनरी संगठन महिलाओं और बच्चियों को सीधे लक्ष्य बना रहे हैं। इसमें महिला प्रचारक पहले अपनी पहचान छिपाकर, बीमारियों और अंधविश्वास से जूझ रही महिलाओं से नजदीकी बढ़ाती हैं, फिर उन्हें “चंगाई सभा” में लेकर जाती हैं और मसीही धर्म अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
सरकार की कार्रवाई:
मंगलवार को डिप्टी सीएम और गृह मंत्री विजय शर्मा ने इस मामले को गंभीरता से लिया और कहा कि इसे रोकने के लिए कठोर एक्ट लाने की योजना है।
प्रचार का तरीका:
कोरबा और जांजगीर जिलों में जांच के दौरान पता चला कि चंगाई सभा के जरिए महिलाओं और बच्चियों को ईसाई बनाया जा रहा है। धर्मांतरण के बाद भी कई महिलाएं अपना नाम और हुलिया नहीं बदलतीं, लेकिन गुप्त रूप से धर्म प्रचार में सहयोग करती हैं।
महिलाओं को प्रार्थना और उपचार के नाम पर चर्च तक लाया जाता है। अधिकांश मामलों में बीमारी या शारीरिक कष्ट का समाधान और 20% मामलों में जादू-टोना जैसे अंधविश्वास का इलाज करने का दावा किया जाता है। एलोपैथिक उपचार किया जाता है, लेकिन इसे प्रभु की कृपा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
बच्चियों का प्रशिक्षण:
मजदूर वर्ग की 3 साल या उससे अधिक उम्र की बच्चियों को चर्च के छात्रावास में रखा जाता है, जहां उन्हें पढ़ाई के साथ धर्म प्रचारक बनने की ट्रेनिंग दी जाती है। वे बाइबिल के वचन कंठस्थ करके चर्च में सुनाती हैं।
पास्टर बाबूलाल का दावा:
कोथारी के पास्टर बाबूलाल मिरी का कहना है कि वे प्रभु की कृपा से हर रोग और परेशानी का इलाज करते हैं। जायदाद, जादू-टोना जैसी समस्याओं से भी मुक्ति दिलाते हैं।
धर्मांतरण में नाम बदलने की बाध्यता समाप्त:
सरकार को वास्तविक आंकड़ा न पता चले और आरक्षण का लाभ महिलाओं को मिलता रहे, इसके लिए मिशनरी अब नाम और सरनेम बदलने की आवश्यकता नहीं रखते। धर्म बदलने के बावजूद हिंदू नाम वाले लोग भी ईसाई धर्म का प्रचार कर सकते हैं।
इस नई रणनीति में मुख्य रूप से महिलाएं, युवतियां और बच्चियां शामिल हैं, जो बीमारी, अंधविश्वास और सामाजिक परेशानियों का हवाला देकर धर्म परिवर्तन के जाल में फंस रही हैं।

