करीब पांच दशकों तक देश के लिए चुनौती बने नक्सलवाद पर अब निर्णायक जीत का दावा किया जा रहा है। यह सफलता सुरक्षा बलों के साहस, रणनीति और लगातार चलाए गए अभियानों का परिणाम मानी जा रही है। आंकड़ों के अनुसार अब तक 535 नक्सली मारे जा चुके हैं, जबकि 2898 ने आत्मसमर्पण किया है और महज 23 सक्रिय नक्सली ही शेष बताए जा रहे हैं।
नक्सलवाद की शुरुआत साल 1968 में हुई, जब आंध्रप्रदेश के रास्ते यह अविभाजित मध्यप्रदेश के बस्तर क्षेत्र में पहुंचा। शुरुआत में यह एक विचारधारा तक सीमित था, लेकिन समय के साथ संगठन ने ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली। लोगों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई, विस्फोटक बनाने के तरीके सिखाए गए और ‘जनताना सरकार’ के नाम पर समानांतर व्यवस्था खड़ी की गई।
1990 के दशक में यह समस्या सरगुजा तक फैल गई और 2010 तक अपने चरम पर पहुंच गई। इसके बाद सुरक्षा बलों ने सख्त कार्रवाई शुरू की और 2015 में सरगुजा को नक्सलमुक्त घोषित कर दिया गया। हालांकि बस्तर क्षेत्र अब भी चुनौती बना रहा, क्योंकि अन्य इलाकों से भागे नक्सली यहां आकर छिप गए थे।
घने जंगल, पहाड़ी इलाका और इंद्रावती नदी जैसे भौगोलिक कारक नक्सलियों के लिए सुरक्षा कवच बने हुए थे। साथ ही तेलंगाना, ओडिशा, आंध्रप्रदेश और झारखंड की सीमाओं से सटे होने के कारण वे आसानी से एक राज्य से दूसरे राज्य में भाग जाते थे।
साल 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah के निर्देशन में केंद्र और राज्यों ने संयुक्त रणनीति के तहत बड़े स्तर पर अभियान शुरू किया। करीब 72 हजार सुरक्षाबल के जवानों ने डेढ़ साल तक लगातार ऑपरेशन चलाया। तकनीकी सहायता के लिए ISRO समेत कई एजेंसियों की मदद ली गई।
इस अभियान में कई बड़े नक्सली नेताओं को मार गिराया गया। 21 मई 2025 को महासचिव बसवराजू के मारे जाने को एक अहम मोड़ माना गया, जिसके बाद संगठन में तेजी से टूटन शुरू हुई। इसके बाद 18 नवंबर 2025 को हिड़मा की मौत ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी और बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण होने लगे।
केंद्र सरकार ने पहले ही 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलमुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था। अब तक की स्थिति के अनुसार छत्तीसगढ़ लगभग पूरी तरह इस समस्या से मुक्त हो चुका है। हालांकि तेलंगाना और झारखंड में कुछ बड़े नक्सली नेता अब भी सक्रिय बताए जा रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक राज्य में बचे हुए नक्सली अब गांवों में छिपे हुए हैं और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए लगातार संदेश भेजे जा रहे हैं।
नक्सलवाद के दौर में कई दर्दनाक घटनाएं भी सामने आईं। कांकेर जिले के एक गांव में स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने वाले युवक मनेश नुरेटी की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। इस घटना ने उस दौर के भय और अत्याचार की तस्वीर को उजागर किया, जब आम नागरिकों को देशभक्ति दिखाने की भी कीमत चुकानी पड़ती थी।
आज सुरक्षा बलों की इस सफलता को लोकतंत्र की बड़ी जीत माना जा रहा है, जिसमें जवानों के बलिदान और निरंतर प्रयासों ने अहम भूमिका निभाई है।

