होटल में जबरन घुसी पुलिस, हाईकोर्ट ने ठोका ₹1 लाख का जुर्माना; बिना FIR होटल मालिक को भेजा था जेल

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में पुलिस की कथित मनमानी पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। एक होटल में बिना अनुमति घुसकर कार्रवाई करने, होटल संचालक से मारपीट करने और बिना एफआईआर के जेल भेजने के मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए राज्य सरकार पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है

साथ ही अदालत ने सरकार को यह छूट दी है कि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से यह राशि वसूल की जा सकती है।


होटल में ठहरे थे आधार कार्ड देकर मेहमान

मामला कोहका इलाके में संचालित एक होटल से जुड़ा है। होटल में ठहरे लोगों ने वैध पहचान दस्तावेज (आधार कार्ड) जमा किए थे। इसके बावजूद पुलिस ने बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के होटल में घुसकर कमरों की तलाशी ली और महिला-पुरुष को बाहर निकाल दिया।


होटल संचालक ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

होटल संचालक आकाश कुमार साहू (30), जो भिलाई के अवंतीबाई चौक के निवासी और लॉ स्टूडेंट हैं, ने अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी

याचिका में कहा गया कि वह विधिवत लाइसेंस लेकर होटल का संचालन कर रहे हैं और यही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार में आता है।


8 सितंबर 2025 को हुई थी पूरी घटना

याचिकाकर्ता के अनुसार, 8 सितंबर 2025 को पुलिस अधिकारी होटल पहुंचे और गुमशुदा लड़की की तलाश के नाम पर रजिस्टर और पहचान पत्रों की जांच की।

इसके बाद बिना महिला पुलिस की मौजूदगी एक कमरे में जबरन घुस गए, जहां महिला और पुरुष ठहरे हुए थे। मैनेजर के साथ बदसलूकी की गई और धमकाकर पुलिस वहां से चली गई।

कुछ देर बाद पुलिस फिर होटल पहुंची और कर्मचारियों पर सोने के गहनों की चोरी का झूठा आरोप लगाया। जब कर्मचारियों ने CCTV कैमरे दिखाने की बात कही, तो पुलिस जांच के बजाय कमरों की तलाशी लेने लगी।


मैनेजर की पिटाई, मालिक को बिना FIR किया गिरफ्तार

आरोप है कि पुलिस ने होटल मैनेजर की बेरहमी से पिटाई की। इसके बाद होटल मालिक आकाश साहू को बुलाया गया। खुद को संचालक बताने पर पुलिस अफसर भड़क गए और गाली-गलौज करते हुए मारपीट की

बिना किसी वैध कारण और बिना एफआईआर दर्ज किए आकाश साहू को हिरासत में लेकर थाने ले जाया गया और बाद में जेल भेज दिया गया।


पुलिस का दावा: सरकारी काम में डाली बाधा

पुलिस का पक्ष था कि वे गुमशुदा लड़की की तलाश में होटल गए थे। उनका दावा था कि होटल संचालक ने सरकारी काम में बाधा डाली, पुलिस वाहन की चाबी छीनी और ड्राइवर से हाथापाई की, जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी। इसी आधार पर बीएनएस की धारा 170 के तहत हिरासत में लिया गया।


हाईकोर्ट का सख्त रुख

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि:

  • याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध दर्ज नहीं था
  • बिना एफआईआर जेल भेजना असंवैधानिक है
  • गिरफ्तारी के समय कारण बताना कानूनी रूप से जरूरी है
  • गिरफ्तारी मेमो में खुद याचिकाकर्ता ने लिखा था – “मुझे मामले की जानकारी नहीं है”

अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाती है और यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।


एसडीएम की भूमिका पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने इस मामले में एसडीएम की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना सोच-विचार किए पुलिस की रिपोर्ट पर मुहर लगाकर युवक को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।


सभी आपराधिक कार्रवाई रद्द

हाईकोर्ट ने:

  • याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक कार्रवाई रद्द की
  • राज्य सरकार को 4 सप्ताह में ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया
  • भुगतान में देरी पर 9% वार्षिक ब्याज देने के निर्देश दिए

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि पुलिस की अवैध कार्रवाई और गैरकानूनी रिमांड से आपराधिक न्याय प्रणाली पर जनता का भरोसा कमजोर होता है

अदालत ने गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिए कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।

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