दुर्ग जिले में मौसम की अनिश्चितता और अक्टूबर तक जारी बारिश ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। पकने की स्थिति में पहुंच चुकी धान की फसल अब खेतों में गिरने और सड़ने लगी है। कई इलाकों में खेतों में जलभराव की स्थिति बन गई है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ रहा है।
दुर्ग, पाटन, धमधा, अहिवारा और भिलाई-3 के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान फसल बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अक्टूबर के आखिरी हफ्ते तक जारी बारिश और तेज हवाओं के कारण खेतों में धान की बालियां झुककर सड़ने लगी हैं।

मौसम की मार और कीटों का कहर
पाटन क्षेत्र के किसान अशोक चौधरी बताते हैं कि पहले कम बारिश से कीट प्रकोप (तना छेदक) बढ़ा, और अब अधिक नमी से फसल सड़ रही है। उन्होंने बताया कि इस बार दवा और कीटनाशकों पर खर्च लगभग दोगुना हो गया है।
कृषि विभाग के अनुसार, जिले में इस साल अक्टूबर में औसत से अधिक बारिश दर्ज की गई है। लगातार नमी और हवा के दबाव से लंबी किस्म की धान झुककर गिर गई है, और जिन खेतों में पानी नहीं निकाला जा सका, वहां सड़न की स्थिति बन गई है।

बढ़ा हार्वेस्टिंग खर्च
खेतों में पानी भरे होने के कारण पारंपरिक टायर हार्वेस्टर काम नहीं कर पा रहे हैं। किसान अब चेन माउंटेड हार्वेस्टर का सहारा ले रहे हैं, जिसका खर्च 4 हजार रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच गया है, जबकि पहले यह 2500 रुपये था। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
नुकसान की आशंका, लेकिन उम्मीद बाकी

हनोदा गांव के किसान लोकेश चंद्राकर ने बताया कि अगर आने वाले दिनों में मौसम साफ रहा तो कुछ फसलें अभी बचाई जा सकती हैं। कृषि अधिकारियों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों से पानी निकालने और जल्द कटाई शुरू करने की व्यवस्था करें।
दुर्ग जिले में करीब 60 प्रतिशत क्षेत्र धान उत्पादन के तहत आता है। लेकिन इस साल मौसम की अनिश्चितता, कीट प्रकोप और बढ़ते खर्चों के चलते किसानों की चिंताएं दोगुनी हो गई हैं।

