रायपुर। पीलिया (जॉन्डिस) को हल्की बीमारी समझकर देरी करना और अंधविश्वासी तरीकों पर भरोसा करना मरीजों के लिए भारी पड़ रहा है। शहर से लेकर गांव तक नाभि पर अंडा रखने, अमरबेल का रस पिलाने, आंखों में पत्तियों का रस डालने, राख-चूने से झाड़ने और जड़ी-माला पहनाने जैसे “इलाज” खुलेआम किए जा रहे हैं—जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। नतीजा यह कि मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं जब हालत गंभीर हो चुकी होती है।
क्लिनिकल रिकॉर्ड में चौंकाने वाले संकेत
50 से अधिक मरीजों के क्लिनिकल रिकॉर्ड के विश्लेषण में सामने आया कि बड़ी संख्या में लोग हफ्तों-महीनों तक टोना-टोटका करवाते रहे। कई मामलों में सामान्य पीलिया समझकर देरी की गई, जबकि मरीज ऑब्स्ट्रक्टिव जॉन्डिस (पित्त नली में रुकावट) से जूझ रहे थे। इस देरी से बिलीरुबिन खतरनाक स्तर तक पहुंच गया और कुछ मरीजों में इलाज जटिल हो गया—यहां तक कि कैंसर रोगियों को समय पर कीमोथेरेपी देना भी संभव नहीं रहा।
मेकाहारा और अंबेडकर अस्पताल की स्टडी
मेकाहारा अस्पताल में सामने आए मामलों में पाया गया कि अंधविश्वासी उपचार के कारण मरीज गंभीर अवस्था में पहुंचे। वहीं डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग की 2023–2025 के बीच 250 से अधिक गंभीर मरीजों पर आधारित अध्ययन में भी यही रुझान दिखा। अनुमान है कि हर महीने करीब 20 मामले ऐसे मिलते हैं जिनमें देसी-टोटकों के कारण उपचार में देरी हुई।
251 रुपए की “माला” और मंत्र का दावा
राजधानी के महादेव घाट इलाके में 251 रुपए में “मंत्र पढ़ी माला” देकर 15 दिन पहनने का दावा किया जा रहा है। जड़ी-बूटी और तंत्र-सामग्री का हवाला देकर इलाज का भरोसा दिलाया जाता है, जबकि इसका कोई चिकित्सीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
⚠️ ऑब्स्ट्रक्टिव जॉन्डिस क्यों खतरनाक?
ऑब्स्ट्रक्टिव जॉन्डिस तब होता है जब पित्त नली में रुकावट आ जाती है। पित्त की पथरी, ट्यूमर, सूजन या कैंसर इसके कारण हो सकते हैं। यह छिपे हुए कैंसर का शुरुआती संकेत भी बन सकता है।
पीलिया दो तरह का माना जाता है—
- मेडिकल जॉन्डिस: दूषित पानी/भोजन से होने वाला हेपेटाइटिस।
- सर्जिकल/ऑब्स्ट्रक्टिव जॉन्डिस: पित्त नली में रुकावट से जुड़ा, अधिक जोखिमपूर्ण।
सलाह: पीलिया के लक्षण (आंख-त्वचा पीली, गाढ़ा पेशाब, कमजोरी) दिखें तो तुरंत ब्लड टेस्ट और सोनोग्राफी कराएं। इलाज केवल योग्य डॉक्टर से कराएं; देरी जानलेवा हो सकती है।

