महासमुंद जिले में जब्त एलपीजी गैस कैप्सूल ट्रकों से करोड़ों रुपए की गैस गायब होने के मामले में पुलिस जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों के मुताबिक जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव इस पूरे गैस सिंडिकेट का मुख्य संचालक था। पुलिस का दावा है कि अधिकारियों, गैस एजेंसी संचालकों और कारोबारियों की मिलीभगत से करीब 92 टन एलपीजी गैस का गबन किया गया।
पुलिस के अनुसार खाद्य अधिकारी अजय यादव ने गौरव गैस एजेंसी के संचालक पंकज चंद्राकर, रायपुर निवासी मनीष चौधरी और अन्य आरोपियों के साथ मिलकर करीब डेढ़ करोड़ रुपए कीमत की गैस का अवैध कारोबार किया। मामले में अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर समेत अन्य आरोपी फरार बताए जा रहे हैं।

जांच में सामने आया कि दिसंबर 2025 में सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में 6 एलपीजी गैस से भरे कैप्सूल ट्रक जब्त किए गए थे। सुरक्षा कारणों से इन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने की जिम्मेदारी खाद्य विभाग को दी गई थी। इसी दौरान गैस निकालने की योजना तैयार की गई।
पुलिस के मुताबिक 23 मार्च 2026 को आरंग के एक ढाबे में आरोपियों की बैठक हुई, जहां गैस बेचने की डील तय की गई। इसके बाद 26 मार्च को ट्रकों में मौजूद गैस का आकलन किया गया। ट्रकों में करीब 102 से 105 मीट्रिक टन एलपीजी होने की जानकारी सामने आई थी।
जांच में पता चला कि ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के साथ करीब 80 लाख रुपए में सौदा तय हुआ। 30 मार्च को खाद्य विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में छह गैस कैप्सूल ट्रकों को सुपुर्दनामा पर लेकर अभनपुर स्थित प्लांट पहुंचाया गया।
पुलिस का कहना है कि इसके बाद सुनियोजित तरीके से ट्रकों से गैस निकाली गई। 31 मार्च, 1 अप्रैल और 5 अप्रैल की रात अलग-अलग कैप्सूलों से गैस खाली की गई और तीन दिनों में करीब 92 टन एलपीजी गायब कर दी गई। यह गैस निजी टैंकरों, बुलेट टैंकों और विभिन्न एजेंसियों में सप्लाई की गई।
जांच में यह भी सामने आया कि ट्रकों का वजन जानबूझकर देर से कराया गया ताकि गैस पहले ही निकाली जा सके। पांच ट्रकों का वजन 6 अप्रैल और आखिरी ट्रक का वजन 8 अप्रैल को कराया गया, तब तक अधिकांश कैप्सूल खाली हो चुके थे।
दस्तावेजों की जांच में पुलिस को कालाबाजारी के सबूत भी मिले हैं। रिकॉर्ड के अनुसार ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स ने अप्रैल में केवल 47 टन गैस खरीदी, जबकि बिक्री 107 टन दिखाई गई। इससे साफ हुआ कि बड़ी मात्रा में बिना वैध खरीदी के गैस बेची गई।
पुलिस ने यह भी दावा किया कि आरोपियों ने जांच को गुमराह करने और पूरे मामले का ठीकरा पुलिस पर फोड़ने की योजना बनाई थी। अप्रैल महीने के रिकॉर्ड और एंट्री रजिस्टर गायब पाए गए, जिससे साक्ष्य मिटाने की कोशिश की पुष्टि हुई।
महासमुंद पुलिस की 40 सदस्यीय टीम ने 15 दिनों तक तकनीकी जांच, कॉल डिटेल, दस्तावेज विश्लेषण और पूछताछ के बाद पूरे नेटवर्क का खुलासा किया। फिलहाल मामले में बीएनएस और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई जारी है।

