छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित श्री बजरंग पंचायत मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की अनोखी परंपरा का प्रतीक भी रहा है। यहां वर्षों से हनुमानजी को साक्षी मानकर पंचायत लगाई जाती थी, जिसमें हर वर्ग और धर्म के लोग शामिल होकर फैसलों को स्वीकार करते थे।
मगरपारा-तालापारा इलाके में स्थित इस मंदिर का इतिहास करीब 100 साल पुराना बताया जाता है। उस दौर में जब अदालतों तक पहुंच आसान नहीं थी, तब लोग अपने विवाद लेकर यहां आते थे और पंचायत द्वारा दिए गए निर्णय को अंतिम मानते थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा अंग्रेजी शासनकाल में शुरू हुई थी। उस समय मंदिर का वर्तमान ढांचा नहीं था, बल्कि खुले स्थान पर ही हनुमानजी की स्थापना थी। वहीं पर समाज के बुजुर्ग और प्रमुख लोग बैठकर पंचायत करते थे और भगवान को साक्षी मानकर निष्पक्ष फैसला सुनाते थे।
समय के साथ यह स्थान “बजरंग पंचायत मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया, क्योंकि यहां आस्था के साथ न्याय भी मिलता था। खास बात यह थी कि इस पंचायत में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी समुदाय के लोग शामिल होते थे और बिना किसी भेदभाव के निर्णय लिए जाते थे।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि उस समय शहर में केवल सिटी कोतवाली थाना ही था, लेकिन लोग पुलिस या अदालत जाने के बजाय इस पंचायत पर अधिक भरोसा करते थे। यहां दिए गए फैसले को सभी समुदायों द्वारा सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाता था।
आज भी यह मंदिर आपसी भाईचारे, विश्वास और निष्पक्ष न्याय की उस परंपरा की याद दिलाता है, जिसने समाज को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



