35 साल की शादी में तलाक के लिए ठोस सबूत जरूरी: पत्नी के अलग रहने पर भी हाईकोर्ट ने खारिज की पति की याचिका

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि लंबे वैवाहिक संबंधों में तलाक के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि क्रूरता और परित्याग के ठोस व स्पष्ट प्रमाण आवश्यक हैं। कोर्ट ने 35 साल पुरानी शादी को खत्म करने की मांग वाली पति की याचिका खारिज कर दी।

यह मामला उस पति से जुड़ा है, जिसने यह कहते हुए तलाक मांगा था कि उसकी पत्नी झगड़ालु है, मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है और पिछले करीब 14–15 वर्षों से उसे छोड़कर बेटी व दामाद के साथ रह रही है।

पत्नी ने लगाए पलटवार में आरोप

वहीं पत्नी ने पति की तलाक याचिका का विरोध करते हुए कहा कि पति अक्सर उसके चरित्र पर शक करता था और गाली-गलौच करता था। उसने यह भी बताया कि वह बीपी और शुगर की मरीज है, लेकिन पति ने कभी उसके इलाज का खर्च नहीं उठाया। मजबूरी में उसे बेटी के घर रहना पड़ा।

क्या है पूरा मामला

बेमेतरा जिले के निवासी गिरधर दुबे ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की थी। दंपती की शादी करीब 35 साल पहले हुई थी और उनके दो बच्चे हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पति पेशे से पुजारी है।

पति का दावा था कि पत्नी के अलग रहने और मानसिक प्रताड़ना के कारण वैवाहिक जीवन समाप्त हो चुका है। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 5 जुलाई 2023 को यह याचिका खारिज कर दी थी।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को ठहराया सही

पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने की।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पत्नी का अलग रहना तलाक का आधार नहीं बन सकता। क्रूरता और परित्याग साबित करने के लिए स्पष्ट घटनाएं, ठोस आरोप और पुख्ता साक्ष्य जरूरी होते हैं।

कोर्ट ने पाया कि पति की ओर से पेश किए गए गवाहों के बयान सामान्य और अस्पष्ट थे, जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वहीं महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट में पत्नी के आरोप अधिक विश्वसनीय पाए गए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि तलाक जैसे गंभीर मामले में केवल अंदाजों या सामान्य आरोपों के आधार पर विवाह विच्छेद नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट का निर्णय रिकॉर्ड के अनुरूप और सही है। इसी आधार पर पति की अपील को खारिज कर दिया गया।

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