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कवासी लखमा से मुलाकात के बाद भूपेश बघेल का हमला, ईडी–ईओडब्ल्यू की कार्रवाई पर उठाए सवाल

रायपुर। रायपुर सेंट्रल जेल में बंद पूर्व आबकारी मंत्री और वरिष्ठ आदिवासी नेता कवासी लखमा से मुलाकात के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना ठोस सबूतों के लखमा और अन्य लोगों को परेशान किया जा रहा है और यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है। मीडिया से बातचीत में भूपेश बघेल ने कहा कि फिलहाल कवासी लखमा का स्वास्थ्य ठीक है और उन्हें जेल में जरूरी दवाइयां मिल रही हैं। उन्होंने बताया कि पिछली मुलाकात के दौरान लखमा को सीने और पैर में दर्द की शिकायत थी, जिसके बाद उन्होंने डीजीपी को पत्र लिखकर मेडिकल जांच की मांग की थी। इसके बाद जेल प्रशासन द्वारा जांच कर इलाज कराया गया। जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव का आरोप भूपेश बघेल ने कहा कि सबसे गंभीर विषय यह है कि जांच एजेंसियों के पास ठोस और तथ्यात्मक सबूतों का अभाव है, इसके बावजूद लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने इसे केवल परेशान करने और दबाव बनाने की रणनीति बताया। पूर्व मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अदालत के निर्देश पर अपनी फाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है, लेकिन आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) अब तक रिपोर्ट दाखिल नहीं कर पाई है। उन्होंने कहा कि बार-बार प्रोडक्शन वारंट जारी कर कवासी लखमा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आदिवासी नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश का हिस्सा है। ‘एजेंसियां खुद को अदालत से ऊपर समझ रही हैं’ भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि कुछ जांच एजेंसियां खुद को अदालत से ऊपर मानने लगी हैं, जो लोकतंत्र और कानून व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया जाएगा, तो यह न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। डिप्टी सीएम अरुण साव के बयान पर तंज डिप्टी सीएम अरुण साव के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भूपेश बघेल ने कहा कि भाजपा नेताओं के मुंह से अनजाने में सच्चाई निकल रही है। उन्होंने कहा कि अरुण साव, केदार कश्यप और रामविचार नेताम जैसे नेताओं के बयानों से यह स्पष्ट होता है कि कवासी लखमा एक निर्दोष आदिवासी नेता हैं, जो पिछले एक साल से जेल में बंद हैं। भूपेश बघेल ने सवाल उठाया कि जब खुद भाजपा नेता उन्हें निर्दोष मान रहे हैं, तो फिर ईओडब्ल्यू की कार्रवाई आखिर किस आधार पर जारी है। आदिवासी राजनीति से जुड़ा मामला राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कवासी लखमा का मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। भूपेश बघेल के लगातार आक्रामक बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस इस मुद्दे को आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक विषय बना सकती है। आदिवासी समाज में भी इस कार्रवाई को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।

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रायपुर सेंट्रल जेल पहुंचे भूपेश बघेल, बोले– अगर मेरे हाथ में होता तो बेटा जेल ही नहीं जाता

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शुक्रवार को रायपुर सेंट्रल जेल पहुंचे, जहां उन्होंने शराब घोटाले के मामले में बंद पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा से मुलाकात की। जेल से बाहर निकलने के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए भूपेश बघेल ने जांच एजेंसियों और भाजपा पर तीखा हमला बोला। बघेल ने आरोप लगाया कि केंद्रीय जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं। उन्होंने अपने बेटे चैतन्य बघेल की जमानत को लेकर उठ रहे सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुछ लोग यह भ्रम फैला रहे हैं कि उन्होंने अपने बेटे को जेल से छुड़वा लिया, जबकि हकीकत यह है कि उसे अदालत से जमानत मिली है। पूर्व सीएम ने कहा, “अगर मेरे हाथ में होता, तो मेरा बेटा जेल जाता ही नहीं। कोर्ट ने जांच एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाई, तभी जाकर उसे जमानत मिली।” कवासी लखमा को लंबे समय तक जेल में रखने की कोशिश भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि कवासी लखमा को जानबूझकर लंबे समय तक जेल में रखने की साजिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में समय पर जवाब दाखिल नहीं किया, जिससे मामले का फैसला टल गया। उन्होंने दावा किया कि यदि एजेंसी समय पर जवाब पेश करती, तो 17 दिसंबर को ही निर्णय आ सकता था। लेकिन जवाब रोका गया ताकि लखमा को जेल में रखा जा सके। भाजपा नेताओं पर निशाना साधते हुए भूपेश बघेल ने कहा कि उनके बयानों से सच्चाई सामने आ रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब कवासी लखमा को निर्दोष बताया जा रहा है, तो फिर EOW और ED की कार्रवाई क्यों जारी है। साथ ही भाजपा नेताओं को “घड़ियाली आंसू” न बहाने की सलाह दी। कौन हैं कवासी लखमा कवासी लखमा बस्तर अंचल के प्रमुख आदिवासी नेताओं में गिने जाते हैं। वे सुकमा जिले की कोंटा विधानसभा सीट से छह बार विधायक रह चुके हैं। 2013 के दरभा घाटी नक्सली हमले में वे उन नेताओं में शामिल थे, जो जीवित बच पाए थे। 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद उन्हें आबकारी मंत्री बनाया गया था। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार के मंत्रियों में से गिने-चुने नेता ही अपनी सीट बचा पाए, जिनमें कवासी लखमा भी शामिल रहे। क्या है छत्तीसगढ़ शराब घोटाला छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) कर रहा है। एजेंसी का दावा है कि करीब 3,200 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ है। इस मामले में एसीबी में दर्ज FIR में राजनेताओं, आबकारी विभाग के अधिकारियों और कारोबारियों के नाम शामिल हैं। ED के अनुसार, पूर्ववर्ती भूपेश सरकार के कार्यकाल में IAS अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के तत्कालीन एमडी एपी त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर के कथित सिंडिकेट के जरिए इस घोटाले को अंजाम दिया गया।

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डिप्टी सीएम अरुण साव पर टिप्पणी को लेकर भूपेश बघेल घिरे, साहू समाज ने जताया विरोध, 10 दिन में माफी की मांग

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा उप मुख्यमंत्री अरुण साव को लेकर की गई विवादित टिप्पणी के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। भूपेश बघेल के बयान से साहू समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है। समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे अपमानजनक बताते हुए पूर्व मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की है। बिलासपुर में साहू समाज ने इस मामले को लेकर एसएसपी कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई है। समाज ने चेतावनी दी है कि यदि भूपेश बघेल ने 10 दिनों के भीतर माफी नहीं मांगी, तो प्रदेशव्यापी उग्र आंदोलन किया जाएगा। जंगल की कहानी से कसा था तंज दरअसल, बिलासपुर दौरे के दौरान भूपेश बघेल ने एक कथित उदाहरण देते हुए उप मुख्यमंत्री अरुण साव पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि जंगल में राजा चुनने की प्रक्रिया में सभी जानवरों ने मिलकर बंदर को राजा बना दिया। यह टिप्पणी सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से वायरल हुई, जिसे साहू समाज ने सीधे तौर पर अरुण साव का अपमान बताया। बयान सामने आने के बाद प्रदेश के कई जिलों में साहू समाज के लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रदर्शन किए और कुछ जगहों पर पुतला दहन भी किया गया। 29 दिसंबर को बिलासपुर में दिया गया था बयान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 29 दिसंबर 2025 को बिलासपुर के लिंगियाडीह क्षेत्र पहुंचे थे। यहां वे बस्ती हटाने के विरोध में चल रहे आंदोलन के समर्थन में शामिल हुए थे। इसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उप मुख्यमंत्री अरुण साव और विधायक अमर अग्रवाल पर तीखी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने लिंगियाडीह क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे और स्थानीय लोगों से आंदोलन जारी रखने की अपील की थी। इसी भाषण के दौरान उन्होंने अरुण साव को लेकर विवादित टिप्पणी की, जिसे अब समाज विशेष के अपमान के रूप में देखा जा रहा है। जशपुर में सौंपा गया ज्ञापन जशपुर जिले में भी साहू समाज ने पूर्व मुख्यमंत्री के बयान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। समाज के प्रतिनिधियों ने जशपुरनगर में एसएसपी शशि मोहन सिंह को ज्ञापन सौंपते हुए 10 दिनों के भीतर माफी की मांग की है। जिला साहू संघ के अध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता ने कहा कि उप मुख्यमंत्री अरुण साव साहू समाज के प्रतिनिधि हैं और एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। ऐसे में उनके खिलाफ इस तरह की टिप्पणी न केवल व्यक्तिगत बल्कि पूरे समाज का अपमान है। सक्ती जिले में भी आक्रोश सक्ती जिले में भी 5 जनवरी को जिला साहू संघ ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई की मांग की। जिला अध्यक्ष डॉ. खिलावन साहू ने प्रेस वार्ता में कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री की टिप्पणी असंवेदनशील और निंदनीय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहू समाज अपनी गरिमा से समझौता नहीं करेगा और यदि माफी नहीं मांगी गई तो संगठित रूप से आंदोलन किया जाएगा।

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कानपुर-वाराणसी मॉडल पर रायपुर में लागू होगा पुलिस कमिश्नरी सिस्टम, एक जिले में दोहरी पुलिस व्यवस्था की तैयारी

छत्तीसगढ़ में पहली बार राजधानी रायपुर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू होने जा रहा है। प्रस्तावित योजना के अनुसार यह व्यवस्था 23 जनवरी से प्रभावी हो सकती है। इसे लेकर गृह विभाग द्वारा विस्तृत ब्लू प्रिंट तैयार किया जा रहा है। मंत्री परिषद की बैठक के बाद सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, नगरीय निकाय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 22 शहरी थानों में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू किया जाएगा। वहीं, ग्रामीण इलाकों के 15 थानों के लिए अलग से ग्रामीण पुलिस अधीक्षक (SP) की नियुक्ति की जाएगी। इस तरह एक ही जिले में दो अलग-अलग पुलिस व्यवस्थाएं लागू होंगी। यह मॉडल पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर और वाराणसी में लागू किया गया था, लेकिन वहां इसे व्यावहारिक कठिनाइयों और समन्वय की कमी के चलते असफल माना गया। बाद में यूपी सरकार ने पूरे जिले में एक समान कमिश्नरी सिस्टम लागू कर दिया था। अब इसी मॉडल को रायपुर में लागू करने की तैयारी को लेकर प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोहरी पुलिस व्यवस्था से अपराध नियंत्रण, वीआईपी सुरक्षा और जांच प्रक्रिया में कई तरह की जटिलताएं सामने आ सकती हैं। शहरी-ग्रामीण विभाजन से सामने आ सकती हैं ये समस्याएं 1. वीआईपी मूवमेंट में बढ़ेगी जटिलताअगर कमिश्नरी सिस्टम केवल शहरी क्षेत्र तक सीमित रहता है, तो पुराने रायपुर से नवा रायपुर के बीच वीआईपी मूवमेंट के दौरान दो अलग-अलग कारकेड लगाने पड़ेंगे। नगर निगम सीमा तक कमिश्नरी पुलिस और उसके आगे ग्रामीण पुलिस द्वारा सुरक्षा संभालने की व्यवस्था करनी होगी। 2. प्रमुख संस्थानों की सुरक्षा बंटेगी दो हिस्सों मेंइस प्रस्तावित सिस्टम में एयरपोर्ट ग्रामीण एसपी के अधिकार क्षेत्र में रहेगा। वहीं सिविल लाइन स्थित मुख्यमंत्री निवास, राजभवन और मंत्री बंगलों की सुरक्षा पुलिस कमिश्नर के जिम्मे होगी। दूसरी ओर, नवा रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास, विधानसभा, मंत्रालय और सचिवालय की सुरक्षा ग्रामीण एसपी के अधीन रहेगी। 3. अपराध की जांच में सीमा विवादहत्या, लूट, डकैती जैसी गंभीर वारदातों में शहरी और ग्रामीण सीमा को लेकर विवाद की स्थिति बन सकती है। सीमावर्ती इलाकों में घटना होने पर जांच एजेंसी तय करने में देरी और आपसी समन्वय की समस्या उत्पन्न हो सकती है। साथ ही ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रशासनिक अनुमतियों के लिए शासन स्तर पर निर्भरता बढ़ेगी। क्या कहते हैं एक्सपर्ट उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह के अनुसार, कमिश्नरी सिस्टम तभी प्रभावी होता है जब पूरे जिले में एक समान व्यवस्था लागू हो। पुलिस कमिश्नर को धारा 144 लागू करने, हथियार लाइसेंस, जिला बदर और आबकारी से जुड़े अधिकार मिलने चाहिए। उनका मानना है कि आईजी या एडीजी रैंक के अधिकारियों को ही पुलिस कमिश्नर बनाया जाना चाहिए, ताकि अनुभव के आधार पर बेहतर निर्णय लिए जा सकें। एक शहर, दो पुलिसिंग पर सवाल स्थानीय विशेषज्ञों और पत्रकारों का कहना है कि एक ही शहर में दो तरह की पुलिसिंग व्यवस्था प्रशासनिक भ्रम और जवाबदेही का संकट पैदा कर सकती है। नवा रायपुर जैसे आधुनिक और विकसित क्षेत्र को ग्रामीण श्रेणी में रखना व्यावहारिक रूप से उचित नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों का तर्क है कि जब राजधानी, कलेक्टर और प्रशासनिक ढांचा एक है, तो पुलिस व्यवस्था भी एक समान होनी चाहिए। अन्यथा पुलिस सुधार के नाम पर यह व्यवस्था आधा-अधूरा प्रयोग साबित हो सकती है। भारत में पुलिसिंग के दो प्रमुख मॉडल भारत में पुलिस व्यवस्था मुख्य रूप से दो प्रणालियों पर आधारित है—सुपरिटेंडेंट सिस्टम, जो छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लागू होता है, जहां कानून-व्यवस्था के अधिकार जिला मजिस्ट्रेट के पास होते हैं।वहीं कमिश्नरेट सिस्टम बड़े शहरों में लागू होता है, जिसमें पुलिस कमिश्नर को मजिस्ट्रियल पावर भी दी जाती है और वे सीधे कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण रखते हैं।

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तीसरे बजट सत्र की तैयारी में साय सरकार, आज से मंत्रियों के साथ वन-टू-वन बैठकें शुरू

छत्तीसगढ़ सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के तीसरे बजट की तैयारियों को रफ्तार दे दी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार इस बजट के जरिए विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। इसी क्रम में वित्त विभाग ने मंत्री-स्तरीय बैठकों का विस्तृत कार्यक्रम जारी किया है। 6 से 9 जनवरी तक चलने वाली इन बैठकों की अध्यक्षता वित्त मंत्री ओपी चौधरी करेंगे। इस दौरान वे अलग-अलग मंत्रियों से वन-टू-वन चर्चा कर उनके विभागों के बजट प्रस्तावों और प्राथमिकताओं की समीक्षा करेंगे। पहले दिन 4 मंत्री रखेंगे विभागीय प्रस्ताव मंगलवार को पहले दिन चार मंत्री अपने-अपने विभागों के बजट प्रस्ताव वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली समिति के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। 📅 6 जनवरी की बैठक का कार्यक्रम 📅 7 जनवरी का शेड्यूल 📅 8 जनवरी की बैठक 8 जनवरी को उप मुख्यमंत्री अरुण साव की अध्यक्षता में लोक निर्माण विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, खेल एवं युवा कल्याण तथा नगरीय प्रशासन विभागों के बजट प्रस्तावों पर चर्चा होगी।इसके बाद दोपहर 2.30 बजे स्कूल शिक्षा, ग्रामोद्योग और विधि-विधायी विभागों के प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाएंगे। 📅 9 जनवरी का कार्यक्रम सरकार का उद्देश्य इन बैठकों के माध्यम से बजट को ज़मीनी जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है, ताकि राज्य के विकास और सामाजिक कल्याण से जुड़ी योजनाओं को नई दिशा दी जा सके।

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छत्तीसगढ़ की वोटर लिस्ट में फिर बढ़ेगी मतदाताओं की संख्या, 2.74 लाख से ज्यादा लोगों ने दोबारा आवेदन किया

छत्तीसगढ़ में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कार्यक्रम पूरा होने के बाद मतदाता सूची को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में जहां 27 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग अपने नाम दोबारा जुड़वाने के लिए सामने आ रहे हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, SIR प्रक्रिया के बाद प्रदेश में कुल 2 करोड़ 12 लाख 30 हजार 737 मतदाता दर्ज किए गए थे। ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद जिन मतदाताओं के नाम लिस्ट से बाहर हो गए थे, उनके लिए दावा-आपत्ति की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके तहत अब तक 2 लाख 74 हजार से ज्यादा लोगों ने अपने नाम दोबारा शामिल कराने के लिए आवेदन फॉर्म भरे हैं। 45 दिन चला घर-घर सत्यापन अभियान यह विशेष अभियान 7 नवंबर से करीब 45 दिनों तक चला, जिसमें बूथ लेवल अधिकारियों ने प्रदेशभर में घर-घर जाकर मतदाताओं का भौतिक सत्यापन किया। इस दौरान मृत मतदाता, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोग, दोहरी प्रविष्टि वाले नाम और अपात्र मतदाताओं को सूची से हटाया गया। किन कारणों से हटे नाम निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए कुल 27,34,817 नामों में शामिल हैं— दावा-आपत्ति की समय-सीमा जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट में शामिल नहीं हैं, उन्हें चुनाव आयोग की ओर से नोटिस जारी कर दोबारा नाम जुड़वाने का अवसर दिया जा रहा है। अब तक फार्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनकी जांच और स्क्रूटनी के बाद योग्य पाए गए मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में जोड़े जाएंगे। निर्वाचन आयोग का बयान निर्वाचन आयोग के अधिकारियों का कहना है कि SIR अभियान का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित बनाना है, ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलती से हट गए हैं, उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। सभी जिलों के कलेक्टरों और निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि दावा-आपत्ति की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी रखा जाए। आयोग ने मतदाताओं से अपील की है कि वे ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में अपना नाम अवश्य जांचें। अंतिम सूची जारी होने के बाद छत्तीसगढ़ में मतदाताओं की संख्या में एक बार फिर बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है।

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रायपुर: मांगों को लेकर सड़क पर उतरीं बिहान योजना की महिलाएं, मंत्री से मुलाकात तक धरना जारी रखने का ऐलान

रायपुर में एनआरएलएम (बिहान योजना) से जुड़ी महिलाएं अपनी लंबित मांगों को लेकर सड़क पर उतर आईं। प्रदेश के विभिन्न जिलों से राजधानी पहुंचीं सैकड़ों महिलाएं राजीव गांधी चौक पर धरने पर बैठ गईं। प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक संबंधित विभाग के मंत्री से सीधी बातचीत नहीं होती, वे सड़क से नहीं हटेंगी। महिलाएं अपनी 7 सूत्रीय मांगों को लेकर पिछले कई घंटों से प्रदर्शन कर रही हैं। उनका कहना है कि वे वर्षों से सरकार की योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने का काम कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न तो उचित मानदेय मिल रहा है और न ही नौकरी की कोई सुरक्षा दी गई है। बेहद कम मानदेय, बढ़ता आर्थिक दबाव धरने में शामिल महिलाओं ने बताया कि उन्हें वर्तमान में मात्र 1910 रुपए मासिक मानदेय दिया जा रहा है, जो मौजूदा महंगाई के दौर में बेहद अपर्याप्त है। महिलाओं का कहना है कि इतनी कम राशि में न तो परिवार का खर्च चल पाता है और न ही काम से जुड़े जरूरी खर्च पूरे हो पाते हैं। उन्होंने मांग की कि उनका मानदेय छत्तीसगढ़ शासन के न्यूनतम वेतन अधिनियम के अनुरूप बढ़ाया जाए। महिलाओं ने यह भी कहा कि पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में इसी तरह कार्यरत महिलाओं को 6000 रुपए प्रतिमाह दिए जाते हैं, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार की समान हिस्सेदारी होती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में बेहद कम मानदेय देना उनके साथ अन्याय है। निजी संसाधनों से कराया जा रहा सरकारी काम बिहान योजना से जुड़ी महिलाओं ने आरोप लगाया कि उनसे लगातार ऑनलाइन कार्य कराया जा रहा है, लेकिन इसके लिए न तो सरकारी मोबाइल उपलब्ध कराया गया है और न ही इंटरनेट खर्च दिया जाता है। महिलाएं अपने निजी मोबाइल और स्वयं के पैसे से रिचार्ज कर सरकारी काम करने को मजबूर हैं। उन्होंने सभी कैडर को सरकारी मोबाइल या मोबाइल-इंटरनेट भत्ता देने की मांग की। यात्रा और बैठक भत्ते की भी मांग प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है कि उन्हें नियमित रूप से मीटिंग, प्रशिक्षण और फील्ड विजिट के लिए बुलाया जाता है, लेकिन इसके बदले न तो यात्रा भत्ता दिया जाता है और न ही कोई मीटिंग या दैनिक भत्ता मिलता है, जिससे आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है। जबरन हटाने और भुगतान में देरी के आरोप महिलाओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कई जगहों पर वर्षों से काम कर रही सक्रिय महिलाओं को जबरदस्ती काम से हटाया जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कई ब्लॉकों में मानदेय 5 से 6 महीने देरी से मिलता है और कई बार बिना कारण राशि काट ली जाती है। महिलाओं की मांग है कि मानदेय हर महीने समय पर और सीधे बैंक खाते में दिया जाए। नियमितीकरण और नियुक्ति पत्र की मांग प्रदर्शन कर रही महिलाओं का कहना है कि लंबे समय से सेवा देने के बावजूद उन्हें आज तक नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है। उन्होंने अपने नियमितीकरण की भी मांग की है। महिलाओं ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही मंत्री स्तर पर बातचीत नहीं हुई और मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।

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टीएस सिंहदेव को मिली बड़ी जिम्मेदारी, तमिलनाडु–पुडुचेरी के लिए बने कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरपर्सन

आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों के तहत अखिल भारतीय कांग्रेस ने कई राज्यों के लिए स्क्रीनिंग कमेटियों की घोषणा कर दी है। इस सूची में छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव का नाम प्रमुख रूप से शामिल है। उन्हें तमिलनाडु और पुडुचेरी के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरपर्सन नियुक्त किया गया है। साल 2026 में तमिलनाडु, केरल, असम, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसे देखते हुए कांग्रेस संगठनात्मक तैयारियों में जुटी हुई है। उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में स्क्रीनिंग कमेटियां गठित की हैं। टीएस सिंहदेव की अहम भूमिका टीएस सिंहदेव को पार्टी ने अहम जिम्मेदारी देते हुए तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे रणनीतिक राज्यों की स्क्रीनिंग कमेटी की कमान सौंपी है। स्क्रीनिंग कमेटी का मुख्य कार्य है चुनाव से पहले उम्मीदवारों का मूल्यांकन करना और नेतृत्व को नाम सुझाना। प्रियंका गांधी को असम की कमेटी का चेयरपर्सन संगठन में और भी अहम नाम शामिल हैं। पार्टी महासचिव और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा को असम के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरपर्सन बनाया गया है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस जानकारी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया। वरिष्ठ नेताओं पर भरोसा कांग्रेस का मानना है कि अनुभवी नेताओं के नेतृत्व में गठित स्क्रीनिंग कमेटियां बेहतर और मजबूत उम्मीदवार चयन में मदद करेंगी। पार्टी का फोकस आगामी विधानसभा चुनावों में संगठन को मजबूत कर रणनीतिक ढंग से मैदान में उतरने पर है।

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रायपुर की सड़कों पर उतरे विधायक और महापौर, खारुन नदी में नाला मिलने पर अफसरों को फटकार; 5 दिन में सुधार के निर्देश

रायपुर पश्चिम के विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेश मूणत विकास कार्यों की गुणवत्ता और समय-सीमा की जमीनी हकीकत परखने के लिए सड़कों पर उतरे। निरीक्षण के दौरान वे सरोना और चंदनडीह क्षेत्रों में चल रहे और पूर्ण हो चुके विकास कार्यों का जायजा लेने पहुंचे। इस दौरान उनके साथ महापौर मीनल चौबे, नगर निगम आयुक्त विश्वदीप, लोक निर्माण विभाग और नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। निरीक्षण के दौरान चंदनडीह में 80 करोड़ रुपये की लागत से बने एसटीपी प्लांट की स्थिति सामने आने पर विधायक मूणत खासे नाराज नजर आए। अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार चिंगरी नाले का दूषित और बदबूदार पानी अब भी सीधे खारुन नदी में मिल रहा है, जिस पर विधायक ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए 5 दिन का अल्टीमेटम दिया और स्पष्ट निर्देश दिए कि तत्काल ठोस कार्ययोजना बनाकर प्रस्तुत की जाए। सरोना को विकास की दोहरी सौगात निरीक्षण के दौरान विधायक मूणत ने बताया कि अमृत मिशन 2.0 के तहत भारत सरकार से स्वीकृत 9 करोड़ रुपये की राशि से सरोना क्षेत्र में एक भव्य उद्यान विकसित किया जाएगा। इसके लिए उन्होंने शीतला मंदिर के पीछे स्थित रिक्त भूमि का निरीक्षण किया और राजस्व अधिकारियों को पटवारियों के साथ तुरंत सीमांकन कर लेआउट प्लान तैयार करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही चंदनडीह से सरोना होते हुए महादेव घाट तक नए बायपास रोड के निर्माण का प्रस्ताव आगामी बजट में भेजने के निर्देश दिए गए। विधायक ने कहा कि इससे क्षेत्र में बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करने में मदद मिलेगी। उन्होंने ट्रेंचिंग ग्राउंड की सफाई व्यवस्था का भी निरीक्षण किया और कार्य को निर्धारित समय-सीमा में पूरा करने के निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान ये रहे मौजूद निरीक्षण कार्यक्रम में महापौर मीनल चौबे, नगर निगम आयुक्त विश्वदीप, जोन अधिकारी, योजना शाखा के अधिकारी, भू-राजस्व निरीक्षक, पटवारी, लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अभियंता और भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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शराब घोटाला मामला: चैतन्य बघेल की रिहाई पर सियासत तेज, BJP ने उठाए सवाल, सिंहदेव बोले– बिना दोष सिद्ध किए दी जा रही सजा

छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को करीब 170 दिन बाद रायपुर सेंट्रल जेल से जमानत पर रिहा कर दिया गया है। उनकी रिहाई के बाद प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता देवीलाल ठाकुर ने सवाल उठाते हुए कहा कि जिस शराब घोटाले में चैतन्य बघेल को जमानत मिल जाती है, उसी मामले में पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा अब भी जेल में बंद हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भूपेश बघेल ने लखमा की कभी पैरवी नहीं की और कांग्रेस शासनकाल में आदिवासी नेताओं को साजिश के तहत निशाना बनाया गया। ठाकुर ने कहा कि कवासी लखमा के अनपढ़ होने का फायदा उठाकर उनके खिलाफ मामला गढ़ा गया। अगर जांच निष्पक्ष है, तो फिर एक को राहत और दूसरे को जेल क्यों? उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस सरकार के समय शराब घोटाले को सत्ता का संरक्षण मिला। सिंहदेव का पलटवार— जांच एजेंसियों का दुरुपयोग वहीं, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ईडी जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल कर बिना अपराध सिद्ध हुए ही लोगों को सजा दे रही है, जो कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। सिंहदेव ने कहा कि चैतन्य बघेल ही नहीं, बल्कि कवासी लखमा, देवेंद्र यादव, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के कई नेताओं के साथ भी यही रवैया अपनाया गया। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। भूपेश बघेल बोले— राजनीतिक बदले की कार्रवाई चैतन्य बघेल की रिहाई पर प्रतिक्रिया देते हुए भूपेश बघेल ने कहा कि उनके बेटे की गिरफ्तारी राजनीतिक साजिश का हिस्सा थी। उन्होंने आरोप लगाया कि ED, IT और EOW जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल बदले की भावना से किया गया। भूपेश बघेल ने कहा कि चैतन्य को हाईकोर्ट से जमानत मिलना इस बात का सबूत है कि कार्रवाई गलत थी। उन्होंने बताया कि चैतन्य की रिहाई उनके बेटे के जन्मदिन के दिन हुई, जबकि ED ने जन्मदिन के दिन ही गिरफ्तारी कर खुशी में खलल डालने की कोशिश की थी। ED के आरोप क्या हैं? ED के मुताबिक शराब घोटाले की जांच के दौरान ऐसे साक्ष्य मिले हैं, जिनमें चैतन्य बघेल पर करीब 1000 करोड़ रुपए की लेयरिंग और मनी ट्रांजैक्शन का आरोप है। जांच एजेंसी का दावा है कि शराब घोटाले की रकम विभिन्न चैनलों से होते हुए चैतन्य बघेल तक पहुंचाई गई। क्या है छत्तीसगढ़ शराब घोटाला? ED की जांच में 3200 करोड़ रुपए से अधिक के शराब घोटाले का खुलासा हुआ है। आरोप है कि भूपेश सरकार के कार्यकाल में IAS अधिकारी, आबकारी विभाग के अफसर और कारोबारियों के सिंडिकेट के जरिए घोटाले को अंजाम दिया गया। इस मामले में कई राजनेताओं, अधिकारियों और कारोबारियों के खिलाफ FIR दर्ज है।

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