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बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर फटा तिरंगा लहराया, रेलवे की लापरवाही पर उठे सवाल

छत्तीसगढ़ के Bilaspur स्थित Bilaspur Railway Station में राष्ट्र सम्मान से जुड़ी एक गंभीर लापरवाही सामने आई है। स्टेशन के वीआईपी गेट नंबर-2 के बाहर लगाया गया विशाल तिरंगा फटा हुआ और गंदगी से भरा हुआ लहराता नजर आया, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। देश की आन-बान और शान माने जाने वाले राष्ट्रीय ध्वज की इस स्थिति को लेकर लोगों ने इसे अपमानजनक बताया है। यह तिरंगा आमतौर पर गौरव और सम्मान का प्रतीक होता है, लेकिन मौजूदा हालात में इसकी स्थिति बदहाल दिखाई दी। झंडे का कपड़ा जगह-जगह से फटा हुआ था और उस पर धूल-मिट्टी भी जमी हुई थी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि इतनी महत्वपूर्ण जगह पर लगे राष्ट्रीय ध्वज की देखरेख में आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई। इस मामले ने South East Central Railway के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर रेलवे “अमृत स्टेशन योजना” जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के तहत आधुनिक सुविधाओं के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय प्रतीकों की इस तरह अनदेखी चिंता का विषय बन गई है। नियमों के अनुसार, Flag Code of India में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तिरंगे को हमेशा साफ और सम्मानजनक स्थिति में ही फहराया जाना चाहिए। फटा या गंदा झंडा सार्वजनिक स्थान पर लगाना नियमों का उल्लंघन माना जाता है। इसके अलावा, क्षतिग्रस्त झंडे को सम्मानपूर्वक नष्ट करने की भी प्रक्रिया निर्धारित है—या तो उसे एकांत में जलाया जाए या जमीन में दफन किया जाए। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों ने प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही तिरंगे को तुरंत बदलने और भविष्य में ऐसी लापरवाही न होने की व्यवस्था सुनिश्चित करने की अपील की जा रही है।

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भीषण गर्मी में पशुओं की सुरक्षा के लिए एडवाइजरी जारी, 30°C से ऊपर पैदल परिवहन पर रोक

छत्तीसगढ़ में बढ़ती गर्मी और लू के प्रकोप को देखते हुए Chhattisgarh State Animal Welfare Board ने पशुपालकों और आम लोगों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है। बोर्ड ने चेतावनी दी है कि इस मौसम में पशु हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और गर्म सतहों से जलने जैसी समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं, इसलिए उनकी विशेष देखभाल जरूरी है। जारी दिशा-निर्देशों में पशुओं के लिए छाया की उचित व्यवस्था करने और उन्हें दिनभर साफ व ताजा पानी उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। साथ ही चौड़े मुंह वाले मजबूत बर्तनों में पानी रखने की सलाह दी गई है, ताकि पशु आसानी से पानी पी सकें और बर्तन पलटने की संभावना कम रहे। बोर्ड ने पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के लिए नियमों का सख्ती से पालन करने को कहा है। निर्देशों के मुताबिक, 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में पशुओं के पैदल परिवहन पर प्रतिबंध रहेगा। इसके अलावा सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद भी इस तरह के परिवहन से बचने को कहा गया है, ताकि पशुओं को अत्यधिक गर्मी से राहत मिल सके। एडवाइजरी में पशुपालकों को हीट स्ट्रोक के लक्षणों पर विशेष ध्यान देने की भी सलाह दी गई है। यदि किसी पशु में तेज सांस चलना, अत्यधिक सुस्ती, लार गिरना, दिल की धड़कन बढ़ना या बेहोशी जैसे संकेत दिखाई दें, तो तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क कर इलाज कराना जरूरी है। बोर्ड ने अपील की है कि गर्मी के इस दौर में पशुओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें, ताकि उन्हें किसी भी तरह की परेशानी या नुकसान से बचाया जा सके।

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CSR फंड में गड़बड़ी का आरोप: BSP के 2 करोड़ में से 40 लाख से खरीदे एसी, मरीजों को नहीं मिला लाभ

छत्तीसगढ़ के Durg जिले में सीएसआर फंड के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। Bhilai Steel Plant (बीएसपी) ने कोरोना की तीसरी लहर के दौरान जिला अस्पताल को बेहतर सुविधाएं देने के लिए 200 लाख रुपए की राशि दी थी, लेकिन इस फंड के उपयोग को लेकर पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि इस राशि में से 40 लाख रुपए खर्च कर एयर कंडीशनर खरीदे गए, जो मरीजों के वार्ड की बजाय अधिकारियों और डॉक्टरों के कमरों में लगाए गए। जानकारी के मुताबिक, 5 अप्रैल 2023 को बीएसपी ने यह राशि कलेक्टर के सीएसआर खाते में ट्रांसफर की थी। ऑडिट के दौरान जब खर्च का हिसाब मांगा गया, तो स्वास्थ्य विभाग केवल 16.49 लाख रुपए का ही विवरण दे पाया, जिसमें से महज 8.24 लाख रुपए का उपयोगिता प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किया गया। यानी करीब दो करोड़ रुपए के फंड का पूरा हिसाब अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि 40 लाख रुपए से एसी खरीदे गए। जांच में सामने आया कि जिला अस्पताल के न्यू ओपीडी ब्लॉक में अधिकांश डॉक्टरों के कक्ष, प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के कमरों में एसी लगाए गए हैं, जबकि मरीजों के वार्ड और वेटिंग एरिया में ऐसी सुविधाएं नहीं पहुंच पाईं। केवल बर्न वार्ड में कुछ पुराने एसी लगाए जाने की बात सामने आई है। पिछले तीन वर्षों में बीएसपी द्वारा लगातार पत्राचार के बावजूद पूरा विवरण नहीं दिया गया। 8 जनवरी 2026 को भेजे गए 11वें पत्र में खर्च, बिल, फोटो और वीडियो मांगे गए, लेकिन अब तक संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। इतना ही नहीं, सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी पर भी विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया है। इस पूरे मामले ने सीएसआर फंड के उपयोग और निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नियमों के अनुसार, ऐसे फंड के उपयोग का पूरा हिसाब और उपयोगिता प्रमाण-पत्र देना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी होती है। अब देखना होगा कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों से जवाबदेही तय की जाती है।

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दुर्ग में सरकारी कर्मचारियों के लिए हेलमेट-सीट बेल्ट अनिवार्य, नियम तोड़ने पर कार्रवाई के निर्देश

छत्तीसगढ़ के Durg जिले में सड़क सुरक्षा को लेकर प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी Abhijit Singh ने आदेश जारी करते हुए सभी शासकीय अधिकारी और कर्मचारियों के लिए वाहन चलाते समय हेलमेट और सीट बेल्ट पहनना अनिवार्य कर दिया है। इस कदम का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाना और सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना बताया जा रहा है। जारी निर्देशों के मुताबिक, दोपहिया वाहन चलाने वाले कर्मचारियों को हर स्थिति में हेलमेट पहनना होगा, जबकि चारपहिया वाहन चलाने वालों के लिए सीट बेल्ट लगाना जरूरी कर दिया गया है। कलेक्टर ने सभी विभाग प्रमुखों को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से इन नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराएं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी तरह की लापरवाही पर संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। दुर्ग-भिलाई में ट्रैफिक पुलिस नियमित रूप से चौक-चौराहों पर चालान काट रही है, लेकिन इसके बावजूद कई लोग बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के वाहन चलाते नजर आ रहे हैं। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि केवल चालान काटने से ज्यादा जरूरी लोगों में जागरूकता बढ़ाना है, ताकि वे स्वेच्छा से नियमों का पालन करें। प्रशासन को उम्मीद है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्यता लागू होने के बाद आम जनता भी सड़क सुरक्षा नियमों के प्रति अधिक गंभीर होगी और इससे दुर्घटनाओं में कमी आएगी।

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छत्तीसगढ़ बोर्ड रिजल्ट कल 2:30 बजे जारी: 10वीं-12वीं के 5.66 लाख छात्रों का इंतजार खत्म

छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (Chhattisgarh Board of Secondary Education) कल दोपहर 2:30 बजे हाई स्कूल (10वीं) और हायर सेकेंडरी (12वीं) परीक्षा के नतीजे घोषित करेगा। इसकी जानकारी स्कूल शिक्षा मंत्री Gajendra Yadav ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के जरिए दी। इस साल करीब 5.66 लाख छात्र-छात्राओं ने बोर्ड परीक्षा दी थी, जिनकी मेहनत का परिणाम अब सामने आने वाला है। मंडल की आधिकारिक वेबसाइट पर छात्र अपना रोल नंबर दर्ज कर आसानी से रिजल्ट देख सकेंगे। इस बार 10वीं में 3,20,535 और 12वीं में 2,45,785 परीक्षार्थी शामिल हुए। आंकड़ों के मुताबिक, 10वीं के छात्रों की संख्या 12वीं से लगभग 31 प्रतिशत अधिक रही, जो हर साल की तरह इस बार भी ट्रेंड को दिखाता है। पिछले साल के मुकाबले इस बार कुल परीक्षार्थियों की संख्या लगभग स्थिर रही है, हालांकि 12वीं में छात्रों की संख्या में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं 75% उपस्थिति अनिवार्य होने के कारण करीब 1400 छात्र परीक्षा में शामिल नहीं हो पाए। रिजल्ट का इंतजार सिर्फ छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों और स्कूलों के लिए भी बेहद अहम होता है। 10वीं के छात्र जहां आगे के विषय और स्ट्रीम का चयन करेंगे, वहीं 12वीं के छात्र कॉलेज एडमिशन और करियर की दिशा तय करेंगे। पिछले साल की तरह इस बार भी सभी की नजर पास प्रतिशत, मेरिट लिस्ट और टॉपर्स पर टिकी हुई है। मंडल ने छात्रों से अपील की है कि वे रिजल्ट को सकारात्मक रूप से लें। अच्छे अंक आने पर आगे की तैयारी में जुटें, और यदि परिणाम उम्मीद के मुताबिक न हो तो निराश होने के बजाय नए अवसरों पर ध्यान दें।

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AI वीडियो विवाद: भूपेश बघेल और सौम्या चौरसिया का कथित वीडियो वायरल, FIR दर्ज, जांच तेज

छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व उपसचिव सौम्या चौरसिया से जुड़ा एक कथित AI जनरेटेड वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। इस वीडियो को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्य के अलग-अलग 8 थानों में शिकायत दर्ज कराई है। मामला भिलाई नगर थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां पुलिस ने संबंधित इंस्टाग्राम आईडी संचालक के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित इंस्टाग्राम पेज को भी बैन कर दिया गया है। यह वीडियो ‘कांग्रेस पोल खोल’ और ‘रैंडम छत्तीसगढ़’ नाम के इंस्टाग्राम अकाउंट से साझा किया गया था, जिसे कांग्रेस नेताओं ने आपत्तिजनक और भ्रामक बताया है। जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग (ग्रामीण) के अध्यक्ष राकेश ठाकुर ने इस पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) के तहत केस दर्ज किया है। इस मुद्दे को लेकर 26 अप्रैल को कांग्रेस नेताओं ने एसएसपी विजय अग्रवाल से मुलाकात कर कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद जिले के कई थाना क्षेत्रों—जामगांव आर, कुम्हारी, भिलाई-3, नंदिनी नगर अहिवारा, जामुल, धमधा, अंडा, जेवरा सिरसा और रानीतराई—में कार्यकर्ताओं ने पहुंचकर विरोध दर्ज कराया। फिलहाल पुलिस ने जिन इंस्टाग्राम आईडी से वीडियो पोस्ट किया गया था, उन्हें प्लेटफॉर्म से हटवा दिया है और अब उन अकाउंट्स को संचालित करने वाले लोगों की पहचान की जा रही है। मामले की जांच साइबर टीम को सौंपी गई है, जो वीडियो के स्रोत, एडिटिंग और अपलोड की पूरी प्रक्रिया का पता लगाने में जुटी है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही आरोपियों तक पहुंचकर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इधर राज्य महिला आयोग ने भी इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है और दुर्ग के एसएसपी को पत्र लिखकर जांच के निर्देश दिए हैं। आयोग ने इसे बेहद संवेदनशील मामला बताते हुए कहा है कि तकनीक का दुरुपयोग कर किसी की छवि खराब करना, खासकर महिलाओं को लेकर आपत्तिजनक सामग्री तैयार करना, गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है।

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21 करोड़ की फोरेंसिक वैन खड़ी, जांच ठप: जिलों में न पहुंचने से रायपुर लैब पर बढ़ा दबाव

राज्य में अपराध जांच को आधुनिक और तेज बनाने के उद्देश्य से सरकार ने 21.35 करोड़ रुपए खर्च कर 35 मोबाइल फोरेंसिक वैन खरीदीं, लेकिन खरीदी के करीब चार महीने बाद भी ये वाहन जिलों तक नहीं पहुंच पाए हैं और अमलेश्वर में खड़े हैं। इसका सीधा असर जांच प्रक्रिया पर देखने को मिल रहा है। जहां पहले किसी केस की फोरेंसिक रिपोर्ट 2-3 दिनों में मिल जाती थी, अब वही रिपोर्ट आने में 3 से 4 हफ्ते लग रहे हैं। दरअसल, प्रदेश के किसी भी जिले में गंभीर अपराध होने पर अब भी सैंपल जांच के लिए रायपुर की फोरेंसिक लैब भेजे जा रहे हैं, जिससे वहां काम का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार के नए बीएनएस कानून के तहत गंभीर मामलों में फोरेंसिक जांच अनिवार्य किए जाने के बावजूद संसाधनों का सही तरीके से उपयोग नहीं हो पा रहा है। रायपुर की हाईटेक लैब में डीएनए जांच, डिजिटल साक्ष्य, हथियार, विस्फोटक और विभिन्न जैविक नमूनों की जांच की जा रही है, लेकिन पूरे राज्य का भार एक ही जगह होने से प्रक्रिया धीमी हो गई है। वहीं, मोबाइल फोरेंसिक वैन का मुख्य उद्देश्य यही था कि घटनास्थल पर ही साक्ष्य एकत्र कर उनकी प्राथमिक जांच की जा सके। इन वैन के जरिए मौके पर ही फोटो-वीडियो रिकॉर्डिंग, सीन स्केच और साक्ष्यों की सुरक्षित पैकेजिंग जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं, जिससे जांच की गुणवत्ता और गति दोनों में सुधार होता। हालांकि विभाग का कहना है कि वाहनों को जिलों में भेजने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और एक सप्ताह के भीतर इन्हें रवाना कर दिया जाएगा, जिसके बाद जांच व्यवस्था में सुधार की उम्मीद है।

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भीषण गर्मी में राहत: छत्तीसगढ़ के बांध 63% तक भरे, जल संकट का खतरा टला

छत्तीसगढ़ में भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच जल संसाधन विभाग की ताजा रिपोर्ट राहत देने वाली साबित हुई है। 24 अप्रैल 2026 के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के बड़े और मध्यम बांधों में 62.06% से अधिक पानी भरा हुआ है, जो पिछले दो सालों की तुलना में लगभग दोगुना है। तुलना करें तो 2024 में इसी समय जलस्तर केवल 31.82% था, जबकि 2025 में यह करीब 39.82% दर्ज किया गया था। ऐसे में इस वर्ष जल भंडारण में हुई बढ़ोतरी को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश के कुल 46 प्रमुख जलाशयों, जिनमें 12 बड़े और 34 मध्यम बांध शामिल हैं, में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने से गर्मी के दौरान संभावित जल संकट की आशंका काफी हद तक कम हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मई-जून की तीखी लू से पहले 60% से अधिक जलस्तर होना राज्य के लिए बेहद लाभकारी है। इससे शहरों में पेयजल की आपूर्ति सुचारू रह सकेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई की जरूरत भी आसानी से पूरी हो पाएगी। वर्तमान में गंगरेल, दुधावा और तांदुला जैसे प्रमुख बांधों से नहरों के माध्यम से पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे खेती और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जल उपलब्धता बनी हुई है। इस बेहतर जलस्तर से उम्मीद की जा रही है कि इस बार गर्मी के बावजूद पानी की कमी जैसी स्थिति नहीं बनेगी।

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नगर निगम सभा में हंगामा: महिला सशक्तिकरण पर तीखी बहस, माइक छीना तो बढ़ा विवाद

नगर निगम की विशेष सामान्य सभा में महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर जमकर राजनीतिक टकराव देखने को मिला। चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए, जिससे माहौल काफी गरमा गया। विवाद उस समय और बढ़ गया जब नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने बिना किसी का नाम लिए ‘अंग्रेजों के मुखबिर’ जैसी टिप्पणी कर दी। इस बयान पर भाजपा पार्षद नाराज हो गए और विरोध जताते हुए उनका माइक छीनने तक पहुंच गए। इसके चलते करीब 15 मिनट तक हंगामा और नारेबाजी होती रही, जिसके बाद स्थिति को संभालने के लिए सभापति को बैठक कुछ समय के लिए स्थगित करनी पड़ी। करीब साढ़े पांच घंटे तक चली इस बैठक में आखिरकार महिला सशक्तिकरण को लेकर जनजागरूकता अभियान चलाने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इससे पहले भाजपा पार्षद महिला आरक्षण संशोधन के विरोध में काले कपड़े और काले रिबन पहनकर सभा में पहुंचे थे। बैठक खत्म होने के बाद उन्होंने निगम मुख्यालय से कोतवाली चौक तक रैली निकालकर अपना विरोध भी दर्ज कराया। बैठक के दौरान सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह महिला अधिकारों के मुद्दे पर सहयोग नहीं कर रहा है। वहीं विपक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति की जा रही है और शहर की मूलभूत समस्याएं जैसे पेयजल, सफाई और सड़क को नजरअंदाज किया जा रहा है। महापौर मीनल चौबे ने महिला सशक्तिकरण को एक जरूरी पहल बताते हुए विपक्ष की आलोचना की, जबकि विपक्ष ने इसे महज राजनीतिक एजेंडा करार दिया।

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छत्तीसगढ़ में RTE से प्री-स्कूल बाहर: 38 हजार बच्चों पर असर, सरकार बनाम स्कूल एसोसिएशन आमने-सामने

छत्तीसगढ़ सरकार ने प्री-स्कूल (नर्सरी, LKG, UKG) कक्षाओं को शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के दायरे से बाहर करने का निर्णय लिया है। 16 दिसंबर 2025 को जारी इस आदेश का असर राज्य के करीब 38 हजार गरीब बच्चों पर पड़ने की आशंका है। इस फैसले को लेकर विवाद भी तेज हो गया है। छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इसे संविधान के खिलाफ बताया है। एसोसिएशन का कहना है कि आज के समय में शिक्षा की शुरुआत प्री-स्कूल स्तर से होती है, ऐसे में गरीब बच्चों को इस शुरुआती चरण से बाहर करना उन्हें आगे की पढ़ाई में भी पीछे धकेल सकता है। सरकार ने अपने पक्ष में तर्क दिया है कि RTE अधिनियम मूल रूप से 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों, यानी कक्षा 1 से 8 तक के लिए बनाया गया है। ऐसे में प्री-स्कूल को इसमें शामिल करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। इसके साथ ही सरकार ने आर्थिक बोझ का मुद्दा भी उठाया है। सरकार के अनुसार यदि प्री-स्कूल को RTE के तहत रखा जाता है, तो हर साल लगभग 60 से 70 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। सरकार का यह भी कहना है कि पहले प्री-स्कूल को RTE में शामिल करना एक प्रशासनिक त्रुटि थी, जिसे अब सुधारने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इस फैसले का एक अलग पक्ष भी है। साल 2015-16 में राज्य सरकार ने खुद यह निर्णय लिया था कि प्री-स्कूल को RTE के दायरे में लाया जाए, ताकि 3 से 6 साल के बच्चों को शुरुआती स्तर पर बेहतर शिक्षा मिल सके। उस समय सरकार का मानना था कि प्रारंभिक शिक्षा से बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होता है और भविष्य में ड्रॉपआउट दर भी कम होती है। साथ ही, यह कदम सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए भी अहम माना गया था, ताकि गरीब और अमीर बच्चे एक साथ पढ़ सकें। सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि छोटे बच्चों में ड्रॉपआउट दर अधिक होती है और प्री-स्कूल के नाम पर कई नए संस्थान खुल रहे हैं, जिससे कानून के दुरुपयोग की आशंका है। लेकिन उपलब्ध आंकड़े इस दावे पर सवाल खड़े करते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार 3 से 8 साल के बच्चों में ड्रॉपआउट दर लगभग 2 से 3 प्रतिशत के बीच है, जो बहुत अधिक नहीं मानी जाती। हालांकि, नामांकन में कमी जरूर देखी गई है, जहां 16 से 28 प्रतिशत तक बच्चे अब भी प्री-प्राइमरी शिक्षा से बाहर हैं। वर्तमान में यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और सभी की नजरें अदालत के फैसले पर टिकी हैं। कोर्ट के निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि प्री-स्कूल कक्षाएं दोबारा RTE के दायरे में आएंगी या नहीं, और राज्य की शिक्षा नीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी

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