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सिक्किम की अनोखी पहल: बच्चे के जन्म पर 108 पेड़ लगाना अनिवार्य, सरकार देती है जमीन और पौधे

सिक्किम में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक अनोखी पहल की जा रही है। यहां बच्चे के जन्म पर परिवारों को 108 पौधे लगाने होते हैं। खास बात यह है कि लोग इन पौधों की देखभाल अपने बच्चों की तरह कर रहे हैं। पौधों को पानी देना, खाद डालना और उनकी सुरक्षा करना परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। कई परिवार बच्चों का जन्मदिन भी इन पौधों के बीच मनाते हैं। यह पहल सिक्किम सरकार की ‘मेरो रुख, मेरो संतति’ योजना के तहत शुरू की गई है, जिसका अर्थ है “मेरा पेड़, मेरी संतान”। पर्यावरण संरक्षण के लिए इसे देश की अनोखी सरकारी योजनाओं में से एक माना जा रहा है। योजना के अनुसार, बच्चे के जन्म पर माता-पिता को 108 पौधे लगाने अनिवार्य हैं। जिन परिवारों के पास जमीन उपलब्ध है, वे अपने खेत या निजी भूमि पर पौधे लगाते हैं। वहीं जिनके पास जमीन नहीं है, उन्हें सरकार जमीन और पौधे उपलब्ध कराती है। इन पौधों में फलदार, औषधीय और अन्य उपयोगी प्रजातियां शामिल होती हैं। पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी माता-पिता की होती है, जबकि सरकार निगरानी के लिए मॉनिटरिंग सिस्टम भी संचालित कर रही है। योजना के तहत पौधरोपण करने वाले परिवारों के बच्चों के नाम पर सरकार 18 वर्षों के लिए 10,800 रुपए की एफडी भी करती है। बच्चे बड़े होने पर इन पेड़ों की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी जाएगी। सिक्किम में भारी बारिश और प्राकृतिक आपदाओं के कारण कम होती हरियाली को देखते हुए फरवरी 2023 में यह योजना शुरू की गई थी। शुरुआत में 100 पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 108 कर दिया गया, क्योंकि इसे शुभ अंक माना जाता है। अब तक इस योजना के तहत 9,653 परिवारों ने 10.42 लाख से ज्यादा पौधे लगाए हैं। इससे राज्य में हरियाली और वन क्षेत्र बढ़ाने में मदद मिल रही है। देश के अन्य राज्यों में भी पर्यावरण संरक्षण के लिए अलग-अलग योजनाएं चलाई जा रही हैं। छत्तीसगढ़ में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत लाखों पौधे लगाए गए हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी जन्म और संस्कृति से जुड़े पौधरोपण कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। सिक्किम के मुख्यमंत्री Prem Singh Tamang ने कहा कि इस योजना से लोग पौधों को परिवार का हिस्सा मानकर उनकी देखभाल कर रहे हैं, जिससे राज्य में हरियाली लगातार बढ़ रही है। वहीं पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक Rakesh Chaturvedi का कहना है कि सरकारी योजनाओं में अक्सर बड़ी संख्या में पौधे सूख जाते हैं, लेकिन निजी देखभाल के कारण इस योजना में लगभग 90 प्रतिशत पौधे सुरक्षित और जीवित रह रहे हैं।

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रायपुर स्काईवॉक फिर विवादों में: 10 महीने बाद भी अधूरा निर्माण, लोगों को चढ़नी होंगी 100 सीढ़ियां

रायपुर का बहुचर्चित स्काईवॉक प्रोजेक्ट एक बार फिर चर्चा और विवाद का विषय बन गया है। 21 मई 2025 को दोबारा शुरू हुआ निर्माण कार्य 20 अप्रैल 2026 तक पूरा होना था, लेकिन तय समय बीतने के बावजूद प्रोजेक्ट अभी अधूरा है। मौके पर फिलहाल केवल सीढ़ियां लगाने का काम चल रहा है, जबकि लिफ्ट और एस्केलेटर अब तक शुरू नहीं हो पाए हैं। ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि स्काईवॉक का उपयोग करने वाले लोगों को लगभग 90 से 100 सीढ़ियां चढ़नी और उतरनी पड़ेंगी। रेरा ऑफिस की ओर से आने वाले लोगों को 50 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी होंगी, जबकि मेकाहारा-सेंट्रल जेल रोड की ओर उतरने के लिए करीब 45 सीढ़ियां उतरनी पड़ेंगी। इसको लेकर आम लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। कई लोगों का कहना है कि अधूरे और असुविधाजनक प्रोजेक्ट को हटाया जाना चाहिए। स्काईवॉक में कुल 12 एंट्री और एग्जिट पॉइंट बनाए जा रहे हैं। रेरा ऑफिस, कलेक्ट्रेट टाउन हॉल, घड़ी चौक, तहसील कार्यालय, जिला न्यायालय और सेंट्रल जेल के सामने सीढ़ियां लग चुकी हैं। वहीं डीकेएस अस्पताल, शहीद स्मारक मल्टीलेवल पार्किंग, पुराने जेल मुख्यालय और अंबेडकर अस्पताल के पास अभी काम बाकी है। करीब 8 साल से अधूरे पड़े इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए लोक निर्माण विभाग ने 37.75 करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया था। PSA कंस्ट्रक्शन कंपनी को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन 10 महीने बाद भी काम पूरा नहीं हो सका। शास्त्री चौक पर स्काईवॉक को मजबूती देने के लिए रोटरी बनाई जा रही है। इसके अलावा पिलरों पर गर्डर शिफ्ट करने और शेड लगाने का काम जारी है। अधिकारियों के मुताबिक, दिन में भारी ट्रैफिक होने की वजह से अधिकांश निर्माण कार्य रात में किया जा रहा है, जिससे देरी हो रही है। PWD के मुख्य अभियंता एस.के. कोरी ने बताया कि प्रोजेक्ट में 8 एस्केलेटर और 3 लिफ्ट लगाने की योजना है, लेकिन अब तक उनकी जगह तय नहीं हो सकी है। इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्री कुमार मेमन ने कहा कि स्काईवॉक “सफेद हाथी” बन चुका है और इसकी उपयोगिता बेहद कम है। उनका आरोप है कि यह प्रोजेक्ट पूर्व मंत्री राजेश मूणत की जिद का नतीजा है, जिस पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। वहीं भाजपा प्रवक्ता अमित चिमनानी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में गठित कमेटी के सर्वे में 67 फीसदी लोगों ने स्काईवॉक पूरा करने का समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि इसे तोड़ना जनता के पैसे की बर्बादी होगी।

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रायपुर में डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन ठप, वेतन नहीं मिलने पर कर्मचारियों ने किया काम बंद

रायपुर में रविवार को डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित रही। कचरा उठाने वाली गाड़ियों के कर्मचारियों ने वेतन भुगतान नहीं होने के विरोध में काम बंद कर दिया, जिसके कारण शहर के कई इलाकों में घरों से कचरा नहीं उठ सका। कचरा कलेक्शन का जिम्मा संभाल रही रामकी ग्रुप के कर्मचारियों ने सुबह से ही गाड़ियां खड़ी कर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। दलदल सिवनी क्षेत्र में बड़ी संख्या में कचरा गाड़ियां खड़ी नजर आईं। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें हर महीने 7 तारीख तक वेतन मिल जाता था, लेकिन इस बार अब तक भुगतान नहीं किया गया है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि वेतन में देरी की समस्या लगातार बनी हुई है। उनका कहना है कि पहले भी कई बार भुगतान समय पर नहीं मिला, जिससे आर्थिक परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। इसी वजह से मजबूर होकर काम बंद करना पड़ा। यह पहला मौका नहीं है जब सफाई व्यवस्था को लेकर रामकी ग्रुप और नगर निगम के बीच विवाद सामने आया हो। इससे पहले भी कर्मचारियों की हड़ताल के कारण शहर की सफाई व्यवस्था प्रभावित हुई थी। उस समय नगर निगम ने कंपनी पर करीब 18 लाख रुपए की कटौती और 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाने के निर्देश दिए थे। पूर्व समीक्षा बैठक में महापौर मीनल चौबे ने कंपनी अधिकारियों को बुलाकर नाराजगी जताई थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि शहर की सफाई व्यवस्था से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा और भविष्य में इस तरह की स्थिति बनने पर अनुबंध की शर्तों के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। नगर निगम पहले ही यह साफ कर चुका है कि कंपनी को भुगतान कार्य की गुणवत्ता और संतोषजनक प्रदर्शन के आधार पर ही किया जाएगा। अधिकारियों को सफाई व्यवस्था प्रभावित होने की स्थिति में अनुबंध की समीक्षा के निर्देश भी दिए गए थे।

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प्रति एकड़ एक बोरी यूरिया-डीएपी देने के फैसले पर भड़का किसान संगठन, सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

खरीफ सीजन 2026-27 से पहले छत्तीसगढ़ में खाद वितरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। भारतीय किसान यूनियन ने राज्य सरकार की नई व्यवस्था का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल पाएगी और उन्हें निजी दुकानों पर निर्भर होना पड़ेगा। यूनियन के प्रदेश महासचिव तेजराम विद्रोही ने कहा कि सरकार ने सहकारी समितियों में खाद और नगद वितरण का अनुपात बदल दिया है। पहले किसानों को 40 प्रतिशत उर्वरक और 60 प्रतिशत नगद राशि दी जाती थी, जबकि अब इसे 30 प्रतिशत उर्वरक और 70 प्रतिशत नगद कर दिया गया है। उनका कहना है कि इस बदलाव से समितियों में खाद की उपलब्धता कम हो जाएगी। किसान संगठन का आरोप है कि खाद की कमी होने पर किसानों को निजी दुकानों से ज्यादा कीमत पर यूरिया और डीएपी खरीदनी पड़ेगी। साथ ही निजी विक्रेता किसानों पर अन्य उत्पाद खरीदने का दबाव भी बनाते हैं, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है। तेजराम विद्रोही ने सरकार के प्रति एकड़ एक बोरी यूरिया और एक बोरी डीएपी देने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि पिछले साल समय पर खाद नहीं मिलने की वजह से धान उत्पादन में लगभग 20 प्रतिशत तक गिरावट आई थी और इस बार स्थिति और गंभीर हो सकती है। किसान यूनियन ने सरकार की नीति को किसान विरोधी बताते हुए कहा कि सीमित खाद वितरण से उत्पादन घटेगा, जिससे समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का दबाव भी कम हो जाएगा। संगठन ने सरकार से फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

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RTE एडमिशन पर हाईकोर्ट सख्त: 400 स्कूलों में एक भी आवेदन नहीं, सरकार से मांगा जवाब

Chhattisgarh High Court ने प्रदेश में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत पहली कक्षा में एडमिशन की स्थिति को लेकर राज्य सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने उस रिपोर्ट पर हैरानी जताई, जिसमें बताया गया कि राज्य के करीब 400 स्कूलों में RTE के तहत एक भी आवेदन नहीं आया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने शपथ पत्र पेश कर बताया कि 387 स्कूल ऐसे हैं जहां एडमिशन के लिए किसी भी अभिभावक ने आवेदन नहीं किया। वहीं 366 स्कूलों में सीटों के मुकाबले बेहद कम आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनमें कई बड़े और प्रतिष्ठित स्कूल भी शामिल बताए गए हैं। इस पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या गरीब बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ना नहीं चाहते, या फिर कहीं सरकार वास्तविक स्थिति छिपाने की कोशिश तो नहीं कर रही। कोर्ट ने राज्य शासन को पूरी जानकारी शपथ पत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha की डिवीजन बेंच ने कहा कि RTE के तहत स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में यदि किसी स्कूल में सिर्फ एक-दो बच्चों के एडमिशन की जानकारी दी जा रही है, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने शिक्षा विभाग से पूछा कि जब नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, तब गरीब बच्चों के दाखिले में देरी क्यों हो रही है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण हजारों बच्चों का भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि सभी स्कूलों में RTE के तहत आवंटित सीटों और हुए एडमिशन की जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए। साथ ही शिक्षा सचिव को 10 जुलाई तक विस्तृत शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने को कहा गया है।

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छत्तीसगढ़ में जमीन रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटल: रजिस्ट्री के साथ ही शुरू होगा नामांतरण, हर बदलाव पर मिलेगा SMS अलर्ट

Chhattisgarh में जमीन संबंधी व्यवस्थाओं को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राज्य गठन के बाद पहली बार जमीन के लगभग सभी रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए गए हैं। 5 मई तक रायपुर समेत पूरे प्रदेश के गांवों के 5.87 करोड़ से अधिक खसरा रिकॉर्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए जा चुके हैं। राज्य सरकार ने अब जमीन की रजिस्ट्री और नामांतरण प्रक्रिया को भी ऑनलाइन सिस्टम से जोड़ दिया है। नई व्यवस्था के तहत रजिस्ट्री होते ही नामांतरण की प्रक्रिया स्वतः शुरू हो जाएगी। इससे लोगों को तहसील और पटवारी कार्यालयों के बार-बार चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सरकार ने रजिस्ट्री में दर्ज मोबाइल नंबर को जमीन रिकॉर्ड से लिंक किया है। ऐसे में रिकॉर्ड में किसी भी तरह की छेड़छाड़, बदलाव या संदिग्ध गतिविधि होने पर जमीन मालिक और संबंधित अधिकारियों को तुरंत एसएमएस अलर्ट मिलेगा। इससे फर्जीवाड़े और अवैध फेरबदल पर रोक लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है। राजस्व विभाग के अनुसार प्रदेश के 20 हजार से ज्यादा गांवों का भूमि डेटा ऑनलाइन किया जा चुका है। 20,286 गांवों के खसरा रिकॉर्ड और 19,694 गांवों के नक्शों को स्कैन कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया है। वहीं प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के तहत 18,959 गांवों के नक्शों की जियोरेफरेंसिंग भी पूरी कर ली गई है। नई तकनीक की मदद से जमीन का लोकेशन, सीमांकन और रिकॉर्ड ऑनलाइन देखा जा सकेगा। इसके अलावा राज्य के सभी 105 उप-पंजीयक कार्यालयों को तहसील कार्यालयों से ऑनलाइन जोड़ा गया है, जिससे जमीन से जुड़े मामलों का निपटारा तेज होगा। राज्य सरकार का दावा है कि अब लोग मोबाइल एप और ऑनलाइन पोर्टल के जरिए घर बैठे खसरा, बी-1 और अन्य दस्तावेज डाउनलोड कर सकेंगे। साथ ही जमीन पर बैंक लोन या गिरवी जैसी जानकारी भी पोर्टल पर उपलब्ध रहेगी, जिससे खरीदी-बिक्री में पारदर्शिता बढ़ेगी। राजस्व मंत्री Tank Ram Verma ने कहा कि डिजिटल इंडिया भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत राजस्व व्यवस्था को पारदर्शी और पेपरलेस बनाया जा रहा है, ताकि लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।

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IAS संबित मिश्रा होंगे रायपुर नगर निगम के नए आयुक्त, सोमवार से संभालेंगे जिम्मेदारी

राजधानी रायपुर नगर निगम को नया आयुक्त मिल गया है। 2018 बैच के आईएएस अधिकारी Sambit Mishra अब नगर निगम आयुक्त की जिम्मेदारी संभालेंगे। वे सोमवार को औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण करेंगे। प्रशासनिक हलकों में उनकी छवि सक्रिय और तकनीक आधारित कार्यशैली अपनाने वाले अधिकारी की रही है। ओडिशा के भुवनेश्वर निवासी संबित मिश्रा ने यूपीएससी परीक्षा में ऑल इंडिया 51वीं रैंक हासिल की थी। उन्होंने Indian Institute of Technology Kanpur से इंजीनियरिंग और Jawaharlal Nehru University से पब्लिक मैनेजमेंट में मास्टर्स किया है। अपने प्रशासनिक करियर में उन्होंने नगरीय प्रशासन, पंचायत और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं। वे Raigarh नगर निगम आयुक्त, Jashpur जिला पंचायत CEO और Korba जिला पंचायत CEO जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। Bijapur कलेक्टर रहते हुए उनकी कार्यशैली काफी चर्चा में रही। नक्सल प्रभावित इलाकों में पहुंचकर लोगों से सीधे संवाद करना और मौके पर समस्याओं का समाधान निकालना उनकी पहचान बना। दूरस्थ गांवों तक पैदल पहुंचकर निरीक्षण करने की उनकी तस्वीरें भी काफी वायरल हुई थीं। अब रायपुर नगर निगम में उनके सामने सफाई व्यवस्था, जलभराव, ट्रैफिक प्रबंधन, अवैध निर्माण, अतिक्रमण और टैक्स वसूली जैसी चुनौतियां रहेंगी। साथ ही स्मार्ट सिटी परियोजनाओं की निगरानी और जमीनी स्तर पर काम की गति बढ़ाना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल माना जा रहा है।

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ताड़मेटला नरसंहार पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 16 साल बाद भी 76 जवानों के हत्यारों का दोष साबित नहीं

साल 2010 में छत्तीसगढ़ के ताड़मेटला में हुए भीषण नक्सली हमले को देश के सबसे बड़े CRPF नरसंहारों में गिना जाता है। इस हमले में 75 सीआरपीएफ जवानों और एक राज्य पुलिसकर्मी ने शहादत दी थी। लेकिन घटना के 16 साल बाद भी किसी आरोपी के खिलाफ अपराध साबित नहीं हो सका। अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि जांच एजेंसियां हमले में शामिल वास्तविक आरोपियों की पहचान तक कानूनी रूप से साबित नहीं कर सकीं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इतने बड़े हमले के बावजूद जांच और अभियोजन पक्ष अदालत के सामने ऐसे विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्य पेश नहीं कर पाए, जिनके आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया जा सके। अदालत ने इसे बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक स्थिति बताया। हमले के बाद पुलिस ने जांच करते हुए 10 लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों पर हत्या, आपराधिक साजिश, दंगा, डकैती, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम सहित कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष का दावा था कि आरोपी नक्सली संगठन से जुड़े हुए थे और हमले में उनकी भूमिका थी। हालांकि दंतेवाड़ा की सत्र अदालत ने 7 जनवरी 2013 को सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। बाद में राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही माना। ताड़मेटला हमले का मास्टरमाइंड कुख्यात नक्सली कमांडर Madvi Hidma को माना जाता था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार बस्तर क्षेत्र में हुए कई बड़े नक्सली हमलों के पीछे उसका नाम सामने आता रहा। बाद में नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश के मारेडूमिल्ली जंगलों में एक ऑपरेशन के दौरान हिड़मा के मारे जाने का दावा किया गया था।

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राजधानी में बढ़ते अपराधों पर कांग्रेस का हमला: बम सामग्री, गैंगवार और हत्याओं को लेकर सरकार पर उठे सवाल

रायपुर में लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं को लेकर कांग्रेस ने राज्य सरकार की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का कहना है कि राजधानी में अपराधियों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं और सरकार हालात संभालने में विफल साबित हो रही है। कांग्रेस नेताओं ने उरला इलाके में कथित तौर पर बम बनाने की सामग्री मिलने की घटना और मेकाहारा अस्पताल के पास हुई गैंगवार का जिक्र करते हुए कहा कि शहर में खुलेआम हथियार लहराए जा रहे हैं। इसके साथ ही हाल ही में दो युवतियों की गोली मारकर हत्या और पुराने विधानसभा क्षेत्र के पास व्यापारी से करोड़ों की लूट जैसी घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष Sushil Anand Shukla ने कहा कि भाजपा सरकार लगातार कानून व्यवस्था बेहतर होने का दावा कर रही है, जबकि जमीनी स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में हत्या, लूट, चाकूबाजी और डकैती जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कांग्रेस का कहना है कि अपराधियों में पुलिस और कानून का डर खत्म होता जा रहा है। पार्टी ने दावा किया कि राजधानी में आए दिन गोलीबारी और हिंसक घटनाएं हो रही हैं, जिससे आम लोगों में भय का माहौल है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर भी कांग्रेस ने सरकार को घेरा और कहा कि दुष्कर्म एवं उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार अपराध पर नियंत्रण करने में नाकाम रही है और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हो रही। कांग्रेस ने कहा कि मुख्यमंत्री और गृह विभाग प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था संभालने में असफल साबित हो रहे हैं।

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रायगढ़ में सस्ती और देशी शराब की कमी, पसंदीदा ब्रांड के लिए भटक रहे लोग

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में इन दिनों देशी और सस्ती शराब की कमी से शराब प्रेमियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जिले की कई शराब दुकानों में पर्याप्त स्टॉक नहीं पहुंचने के कारण लोग अपनी पसंद की शराब के लिए एक दुकान से दूसरी दुकान भटक रहे हैं। यह समस्या पिछले कई दिनों से बनी हुई है। जिले में कुल 37 शराब दुकानें संचालित हैं, जिनमें 2 प्रीमियम, 15 कंपोजिट, 9 देशी और 11 अंग्रेजी शराब दुकानें शामिल हैं। शहर के सिग्नल चौक, बड़पारा, पुराना सारंगढ़ बस स्टैंड, विजयपुर और पहाड़ मंदिर रोड स्थित दुकानों में सबसे ज्यादा बिक्री होती है। जानकारी के अनुसार अप्रैल महीने से देशी शराब, गोवा ब्रांड और कम कीमत वाले क्वार्टर एवं हाफ बोतलों की सप्लाई प्रभावित है। इसके चलते कम दाम में शराब खरीदने वाले ग्राहकों को काफी दिक्कत हो रही है। कई दुकानों में केवल महंगी शराब की बोतलें उपलब्ध हैं, जबकि कहीं सिर्फ महंगे क्वार्टर ही बिक रहे हैं। ऐसे में सस्ती शराब पसंद करने वाले लोगों को मजबूरी में महंगे ब्रांड खरीदने पड़ रहे हैं। बीयर के शौकीनों को भी उनकी पसंद के ब्रांड नहीं मिल पा रहे हैं। लोग लगातार अलग-अलग दुकानों के चक्कर लगा रहे हैं। शराब खरीदने पहुंचे मंतोष चौहान ने बताया कि वह गोवा ब्रांड की शराब लेने आए थे, लेकिन स्टॉक खत्म होने के कारण उन्हें दूसरी दुकान जाना पड़ रहा है। वहीं अशोक नाम के ग्राहक ने कहा कि कई दुकानों में घूमने के बावजूद मनपसंद शराब नहीं मिल रही है। मामले में जिला आबकारी अधिकारी क्रिस्टोफर खलखो ने कहा कि नई नीति और प्लास्टिक बोतलों के सेटअप में बदलाव के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। उन्होंने बताया कि एक-दो सप्ताह के भीतर स्थिति सामान्य होने की उम्मीद है और लोगों को जल्द उनकी पसंद की शराब मिलने लगेगी।

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