Raipur

100 किलो से ज्यादा कचरा पर नया नियम: कॉलोनियों को खुद करनी होगी प्रोसेसिंग, नहीं तो लगेगा शुल्क

राजधानी रायपुर में अब कचरा प्रबंधन को लेकर सख्त नियम लागू किए जा रहे हैं। यदि किसी कॉलोनी, सोसायटी या संस्थान से प्रतिदिन 100 किलो या उससे अधिक कचरा निकलता है, तो उसे वहीं पर प्रोसेस करना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं करने पर नगर निगम कचरे के निपटान के लिए अलग से शुल्क वसूलेगा। यह व्यवस्था नए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2026 के तहत लागू की गई है, जो अप्रैल 2026 से देशभर में प्रभावी हो चुके हैं। हालांकि, अभी नगर निकायों में इस नियम को लागू करने के लिए पूरी व्यवस्था तैयार नहीं है, लेकिन सर्वे और बैठकों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नए नियमों के अनुसार अब कचरे को चार श्रेणियों में अलग-अलग एकत्र किया जाएगा—गीला, सूखा, सैनेटरी और खतरनाक कचरा। नियम लागू होने से पहले सभी कॉलोनियों, अपार्टमेंट्स, अस्पतालों, मॉल और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ईपीआर (एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी) पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। इसमें कचरे की मात्रा, प्रोसेसिंग की विधि और नियमों के पालन की जानकारी देनी होगी, जिसे नगर निगम सत्यापित कर प्रमाण पत्र जारी करेगा। आने वाले समय में कॉलोनियों को अपने स्तर पर कचरा प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करनी होगी। गीले कचरे को कंपोस्ट या बायोगैस में बदला जा सकता है, जबकि सूखे कचरे को रिसाइक्लिंग के लिए भेजना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार एक व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 500 ग्राम कचरा उत्पन्न करता है। इस हिसाब से 5 लोगों के एक परिवार से रोजाना करीब 3 किलो कचरा निकलता है। यदि किसी कॉलोनी में 50 परिवार हैं, तो वहां प्रतिदिन लगभग 150 किलो कचरा उत्पन्न होगा, जिससे वह ‘बल्क वेस्ट प्रोड्यूसर’ की श्रेणी में आ जाएगी। ऐसी स्थिति में यदि कॉलोनी खुद कचरा प्रोसेस नहीं करती है, तो नगर निगम प्रति टन के हिसाब से शुल्क वसूलेगा। राजधानी में लगभग 1500 कॉलोनियां, अपार्टमेंट और कवर्ड कैंपस इस नियम के दायरे में आएंगे, साथ ही कई होटल और व्यावसायिक संस्थान भी प्रभावित होंगे। नियमों को लागू करने के लिए नगर निगम द्वारा वार्डवार सूची तैयार की जा रही है, ताकि बड़े कचरा उत्पादकों की पहचान कर उन्हें कचरा प्रबंधन के लिए प्रेरित किया जा सके।

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रायपुर में बनेगी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी, 1000 करोड़ की योजना से खिलाड़ियों को मिलेगा नया मंच

छत्तीसगढ़ अब केवल धान उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि खेल प्रतिभाओं के केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्य के खेल एवं युवा कल्याण विभाग ने राजधानी रायपुर में ‘छत्तीसगढ़ स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी’ स्थापित करने के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए लगभग 1000 करोड़ रुपए का प्रारंभिक बजट निर्धारित किया गया है। इस यूनिवर्सिटी के संचालन पर हर साल करीब 155 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इसके लिए वित्तीय संसाधन केंद्र सरकार की ‘खेलो इंडिया’ योजना, यूजीसी तथा सेल और एनटीपीसी जैसी कंपनियों के सीएसआर फंड से जुटाने की योजना बनाई गई है। शुरुआत में इसे मणिपुर स्थित नेशनल स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी से संबद्ध करने का भी प्रस्ताव है। हाल ही में आयोजित खेलो इंडिया कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने इस प्रोजेक्ट को जल्द मंजूरी देने का आश्वासन दिया था। इसके बाद खेल संचालनालय ने प्रस्ताव राज्य सरकार को भेज दिया है, जिसे जल्द ही केंद्र सरकार को अग्रेषित किया जाएगा। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी क्षेत्रों में छिपी खेल प्रतिभाओं को पहचान दिलाना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना है। प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया है कि राज्य में प्राकृतिक खेल क्षमता का बड़ा भंडार मौजूद है। यह यूनिवर्सिटी न केवल खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करेगी, बल्कि राज्य के विभिन्न जिलों में प्रस्तावित खेल कॉलेजों के लिए एक संबद्ध संस्था के रूप में भी कार्य करेगी। इससे स्पोर्ट्स टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा और खेल क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यूनिवर्सिटी का मॉडल देश के प्रमुख संस्थानों से प्रेरित होगा, जिसमें गुजरात की स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के आधुनिक रिसर्च सिस्टम, मणिपुर की नेशनल स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का शैक्षणिक ढांचा और दिल्ली के एकीकृत स्कूल-यूनिवर्सिटी मॉडल को शामिल किया जाएगा, ताकि कम उम्र से ही खिलाड़ियों को तैयार किया जा सके। राज्य के खेल मंत्री अरुण साव ने बताया कि प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजने की प्रक्रिया जल्द पूरी की जाएगी, जिससे छत्तीसगढ़ खेल, पर्यटन और रोजगार का एक बड़ा केंद्र बन सके।

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ई-रिक्शों से बिगड़ी ट्रैफिक व्यवस्था: बिना परमिट और नियंत्रण के सड़कों पर अव्यवस्था

राजधानी में ई-रिक्शों की बढ़ती संख्या ट्रैफिक व्यवस्था के लिए बड़ी समस्या बन गई है। सिग्नल तोड़ना, बीच सड़क पर गाड़ी रोककर सवारी बैठाना और उतारना आम बात हो गई है, जिससे यातायात पूरी तरह प्रभावित हो रहा है। स्टेशन चौक, फाफाडीह चौक, अंबेडकर अस्पताल चौक, जयस्तंभ चौक, आमापारा, लोधीपारा, अवंति बाई चौक, कलेक्टोरेट चौक, कपड़ा मार्केट चौक, कालीबाड़ी और पचपेड़ी नाका जैसे प्रमुख स्थानों पर स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। इन जगहों पर पुलिस की मौजूदगी के बावजूद ई-रिक्शा चालक नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। वे कहीं भी वाहन खड़ा कर सवारी चढ़ाते-उतारते हैं, क्योंकि उनके लिए कोई तय स्टॉप या पार्किंग स्थान निर्धारित नहीं है। कई बार समझाने पर चालक अभद्र व्यवहार भी करते हैं। पुलिस का कहना है कि ई-रिक्शों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है, लेकिन तकनीकी दिक्कतें इसमें बाधा बन रही हैं। ग्रीन नंबर प्लेट कैमरों में साफ नजर नहीं आती, जिससे ई-चालान जारी करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में मौके पर फोटो लेकर कार्रवाई की जा रही है। ई-रिक्शा संचालन को लेकर शहर में अब तक कोई ठोस नीति लागू नहीं की गई है। नगर निगम, जिला प्रशासन, पुलिस और आरटीओ के बीच समन्वय की कमी के कारण न तो रूट तय किए गए हैं और न ही संचालन के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के चलते बड़ी संख्या में ई-रिक्शा बेचे जा रहे हैं, लेकिन इनके लिए परमिट अनिवार्य नहीं है और चालकों का कोई पंजीकृत रिकॉर्ड भी नहीं रखा जा रहा। कई लोग एक से अधिक ई-रिक्शा खरीदकर उन्हें किराए पर चला रहे हैं। शहर में कितने ई-रिक्शों की जरूरत है, किस मार्ग पर कितनी गाड़ियां चलनी चाहिए और उनके स्टॉपेज कहां होंगे—इस पर अब तक कोई सर्वे या योजना तैयार नहीं की गई है। हालांकि, पुलिस ने ई-रिक्शा संचालन को व्यवस्थित करने के लिए एक प्रस्ताव जिला प्रशासन को भेजा था। इसमें शहर को चार जोन में बांटकर प्रत्येक क्षेत्र में ई-रिक्शों का संतुलित संचालन और उनके लिए निर्धारित रूट तय करने का सुझाव दिया गया था। इससे ट्रैफिक दबाव कम हो सकता था और लोग सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करते, लेकिन यह योजना अब तक लागू नहीं हो सकी है।

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महिला एवं बाल विकास विभाग में साड़ी घोटाला: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मिली छोटी और घटिया साड़ियां

महिला एवं बाल विकास विभाग में साड़ी वितरण को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। ठेकेदारों द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को निर्धारित माप से छोटी और खराब गुणवत्ता की साड़ियां दी गई हैं। वर्ष 2024-25 के लिए प्रदेश की लगभग 1.94 लाख महिलाओं के लिए साड़ियों की खरीदी की गई थी। इस खरीद की जिम्मेदारी खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड को दी गई थी। करीब 9.7 करोड़ रुपए खर्च कर प्रत्येक साड़ी 500 रुपए में खरीदी गई। कार्यादेश के अनुसार साड़ी की कुल लंबाई 6.3 मीटर होनी थी, जिसमें 5.5 मीटर साड़ी और 80 सेंटीमीटर ब्लाउज पीस शामिल था। अगस्त 2025 से फरवरी 2026 के बीच इन साड़ियों का वितरण किया गया। लेकिन कई जिलों में वितरित साड़ियों की लंबाई तय मानक से कम पाई गई। कई जगहों पर सिर्फ 5 मीटर की साड़ी ही दी गई, जिससे कार्यकर्ताओं को पहनने में परेशानी हो रही है। इतना ही नहीं, साड़ी धोने पर रंग निकल जाता है और कपड़ा सिकुड़कर और छोटा हो जाता है। कार्यकर्ताओं ने गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि दी गई साड़ियां बाजार में 250 रुपए या उससे भी कम कीमत की लगती हैं। शिकायतों के बाद विभाग के संचालक ने पूरे प्रदेश में साड़ियों की जांच के आदेश दिए हैं। जिला अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जहां भी साड़ियों में कमी पाई जाए, उन्हें बदला जाए। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने सामूहिक रूप से हस्ताक्षर कर मंत्रालय को पत्र भेजकर साड़ियां वापस लेने और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यूनिफॉर्म उनके सम्मान और पहचान से जुड़ी होती है। कई कार्यकर्ता नई साड़ियां छोड़कर पुरानी पहन रही हैं, जबकि कुछ बिना यूनिफॉर्म के ही काम कर रही हैं। बिलासपुर जिले के मंगला, निरतू, घूटकू और गनियारी क्षेत्रों में जांच के दौरान पाया गया कि साड़ियों की लंबाई और चौड़ाई दोनों कम हैं। पानी में डालते ही रंग छूट गया और कपड़ा काफी पतला व पारदर्शी निकला। बिलासपुर में ही 1930 महिलाओं ने साड़ियों की गुणवत्ता पर आपत्ति जताई है और उनका उपयोग बंद कर दिया है। कुछ कार्यकर्ताओं ने बताया कि पहले दी गई साड़ियां सही माप की थीं, लेकिन इस बार की साड़ियां बेहद खराब हैं। मामले की जांच के लिए संचालक रेणुका श्रीवास्तव ने एक समिति का गठन किया है, जिसने दुर्ग, धमतरी और रायगढ़ सहित कई जिलों में जांच की है। रिपोर्ट के आधार पर सभी जिलों से विस्तृत जानकारी मांगी गई है। फिलहाल खादी ग्रामोद्योग बोर्ड को भुगतान रोक दिया गया है। दोषपूर्ण साड़ियों को बदलने के निर्देश दिए गए हैं और संबंधित ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी। विभाग की ओर से यह भी कहा गया है कि जहां-जहां खराब साड़ियों की सप्लाई हुई है, उन्हें वापस लेकर नई साड़ियां दी जाएंगी।

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आई-गॉट प्लेटफॉर्म पर 3 कोर्स अनिवार्य, पूरा न करने पर अप्रैल वेतन पर रोक

राज्य सरकार ने मिशन कर्मयोगी के तहत विकसित आई-गॉट (इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग) प्लेटफॉर्म को लागू करने के निर्देश जारी किए हैं। यह एआई आधारित ऑनलाइन प्रणाली है, जिसका उद्देश्य सभी शासकीय अधिकारी और कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाना, कौशल विकसित करना और उन्हें नियमित प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है। अब सभी अधिकारी-कर्मचारियों के लिए एआई से जुड़े कोर्स सहित कम से कम तीन कोर्स पूरे करना अनिवार्य कर दिया गया है। वर्ष 2026-27 से इन कोर्सों को एपीएआर (वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन) से भी जोड़ा जाएगा। विशेष रूप से अप्रैल महीने का वेतन प्राप्त करने के लिए तीनों कोर्स पूरे करना जरूरी होगा। डीडीओ (आहरण एवं संवितरण अधिकारी) वेतन जारी करने से पहले कर्मचारियों के कोर्स पूर्ण होने के प्रमाण पत्र की जांच करेंगे, उसके बाद ही भुगतान किया जाएगा। आई-गॉट प्लेटफॉर्म पर 100 से अधिक कोर्स उपलब्ध हैं। कर्मचारी परिचय पोर्टल या ईएचआरएमएस पोर्टल के ‘ट्रेनिंग के अवसर’ सेक्शन के माध्यम से पंजीकरण कर सकते हैं। उन्हें अपनी प्रोफाइल में पदनाम, विभाग, एनआईसी ईमेल और मोबाइल नंबर जैसी जानकारी अपडेट करनी होगी। सभी विभागों को 15 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन और पूर्ण किए गए कोर्स का विवरण ई-ऑफिस के माध्यम से भेजना होगा। प्रशिक्षण को तीन तरीकों से संचालित किया जाएगा—इंडक्शन प्रोग्राम, मिड-करियर लर्निंग और सेल्फ लर्निंग। प्रत्येक कोर्स के अंत में परीक्षा होगी और सफल उम्मीदवारों को डिजिटल प्रमाण पत्र दिया जाएगा। इन प्रमाण पत्रों का प्रभाव पदोन्नति और अन्य लाभों पर भी पड़ेगा। मुख्य सचिव ने सभी विभागों को निर्देश दिए हैं कि वे जल्द से जल्द अपने कर्मचारियों को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ें और उनकी ऑनबोर्डिंग सुनिश्चित करें।

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दुर्ग में दिव्यांग युवती से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की कोशिश, आरोपी को 8 साल की सजा

दुर्ग में एक 19 साल की मूक-बधिर युवती के साथ गलत हरकत करने और दुष्कर्म की कोशिश के मामले में कोर्ट ने आरोपी को सजा सुनाई है। आरोपी युवती के पिता का जानने वाला था। घटना 8 अप्रैल 2025 की है। युवती घर में अकेली थी, तभी आरोपी घर में घुस गया और उसके साथ जबरदस्ती करने लगा। उसने युवती के कपड़े उतारने की कोशिश की और गलत हरकतें कीं। युवती ने हिम्मत दिखाते हुए आरोपी का विरोध किया, उसे काटा और वहां से भागकर पड़ोसी के घर पहुंच गई। कोर्ट में युवती ने इशारों (सांकेतिक भाषा) से अपनी बात बताई, जिसे जज ने सही और भरोसेमंद माना। परिवार और पड़ोसियों ने भी उसकी बात का समर्थन किया। कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए कुल 8 साल की सजा सुनाई है। साथ ही जुर्माना भी लगाया गया है। जज ने कहा कि ऐसे मामलों में सख्त सजा जरूरी है, खासकर जब पीड़िता दिव्यांग हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि युवती को मुआवजा दिया जाए ताकि उसे मदद मिल सके।

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कंपोजिट बिल्डिंग निर्माण में लापरवाही, SSP दफ्तर के पुराने रिकॉर्ड खराब होने के कगार पर

कलेक्टोरेट परिसर में बन रही नई कंपोजिट बिल्डिंग के निर्माण कार्य के बीच गंभीर लापरवाही सामने आई है। पुराने भवनों और एसएसपी कार्यालय को तोड़ा जा रहा है, लेकिन वहां रखे महत्वपूर्ण दस्तावेज अब तक पूरी तरह सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट नहीं किए गए हैं। बताया जा रहा है कि रिकॉर्ड रूम में 35 से 40 साल पुराने दस्तावेज मौजूद हैं, जिनमें विभिन्न थानों से जुड़े अहम रिकॉर्ड भी शामिल हैं। निर्माण कार्य और तोड़फोड़ के दौरान इन दस्तावेजों के खराब होने, गुम होने या आग जैसी घटना का खतरा बना हुआ है। पहले ये दस्तावेज खुले में पड़े थे, जिन्हें बाद में एक कमरे में रखा गया, लेकिन वहां भी स्थिति सुरक्षित नहीं है। टूटी हुई खिड़कियों के कारण बारिश का पानी, धूल और गंदगी अंदर पहुंच रही है, जिससे रिकॉर्ड तेजी से खराब हो रहे हैं। इस मामले पर पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला का कहना है कि दस्तावेजों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही सभी रिकॉर्ड को सुरक्षित कर लिया जाएगा। कलेक्टोरेट परिसर में बनने वाली यह नई बिल्डिंग 5 मंजिला होगी, जिसमें जिला प्रशासन के कई विभाग एक ही स्थान पर संचालित होंगे। हालांकि, अभी तक पूरा सामान नहीं हटने के कारण एसएसपी कार्यालय को पूरी तरह नहीं तोड़ा जा सका है। पीडब्ल्यूडी विभाग ने भी इस स्थिति पर आपत्ति जताई है। पिछले करीब तीन महीनों से तोड़फोड़ का काम जारी है, जबकि दूसरी ओर निर्माण के तहत खुदाई और कॉलम डालने का कार्य भी शुरू हो चुका है।

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11 हाउसिंग कॉलोनियों का सर्वे के बाद ही होगा निगम को हैंडओवर, पहले दूर होंगी कमियां

हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनियों को नगर निगम के अधीन लाने की प्रक्रिया अब तेज कर दी गई है, लेकिन इसके पहले सभी कॉलोनियों का विस्तृत निरीक्षण किया जाएगा। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी कमियां दूर नहीं होतीं, तब तक कॉलोनियों का हैंडओवर नहीं किया जाएगा। इस संबंध में नगर निगम के चीफ इंजीनियर, जोन कमिश्नर और हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों की बैठक में अहम निर्णय लिया गया। तय हुआ कि दोनों विभागों की संयुक्त टीम कॉलोनियों का निरीक्षण करेगी और वहां सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट और पेयजल व्यवस्था की स्थिति की जांच करेगी। निरीक्षण के दौरान यदि कहीं भी निर्माण कार्य में खामियां या अधूरी सुविधाएं पाई जाती हैं, तो उसकी रिपोर्ट तैयार कर हाउसिंग बोर्ड को सौंपी जाएगी। सभी कमियां दूर होने के बाद ही कॉलोनियों को नगर निगम के हवाले किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, वर्तमान में इन कॉलोनियों में मरम्मत कार्य के लिए कोई स्थायी फंड उपलब्ध नहीं है, जिससे कई बार खर्च रहवासियों को उठाना पड़ता है। निगम के अधीन आने के बाद इन कार्यों के लिए केंद्र और राज्य सरकार से मिलने वाले फंड का उपयोग किया जाएगा, जिससे लोगों को राहत मिलेगी। पानी की व्यवस्था में भी सुधार होने की संभावना है। अभी इन कॉलोनियों में ट्यूबवेल पर निर्भरता अधिक है, जिससे गर्मी के समय पानी की समस्या बढ़ जाती है। निगम के अधीन आने के बाद फिल्टर प्लांट के जरिए स्वच्छ पानी की आपूर्ति की जाएगी। इसके अलावा, शहर के विस्तार को ध्यान में रखते हुए सेजबहार, बोरियाकला और पिरदा क्षेत्रों की कॉलोनियों को भी भविष्य में नगर निगम में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। इन कॉलोनियों का होगा हैंडओवर:कचना फेस-2, भावना नगर फेस-2, शंकर नगर स्टूडियो अपार्टमेंट, हिमालयन हाइट्स डूमरतराई फेस-1 और 2, कमल विहार (इंद्रप्रस्थ), बोरियाखुर्द (सरोना), रायपुरा (हीरापुर) समेत कुल 11 कॉलोनियां। हाउसिंग बोर्ड के अपर आयुक्त सुनील कुमार भगत ने बताया कि संयुक्त निरीक्षण के बाद सड़क, नाली और स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाओं में सुधार कराया जाएगा, और पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही कॉलोनियों को निगम को सौंपा जाएगा।

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12 अप्रैल को रायपुर में CDS और NDA परीक्षा, 8 सेंटर तैयार

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा आयोजित CDS और NDA परीक्षा 12 अप्रैल 2026 को रायपुर जिले के विभिन्न केंद्रों पर आयोजित की जाएगी। परीक्षा को लेकर जिला प्रशासन ने सभी जरूरी तैयारियां पूरी कर ली हैं और अधिकारियों की जिम्मेदारियां भी तय कर दी गई हैं। CDS परीक्षा तीन अलग-अलग पालियों में होगी। पहली पाली सुबह 9 बजे से 11 बजे तक, दूसरी पाली दोपहर 12:30 बजे से 2:30 बजे तक और तीसरी पाली शाम 4 बजे से 6 बजे तक आयोजित की जाएगी। इसके लिए शहर में तीन केंद्र बनाए गए हैं, जिनमें राष्ट्रीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बाल आश्रम परिसर कचहरी चौक, पीजी उमाठे शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला शांति नगर और पीजी डागा गर्ल्स कॉलेज शामिल हैं। वहीं NDA परीक्षा दो पालियों में आयोजित होगी। पहली पाली सुबह 10 बजे से 12:30 बजे तक और दूसरी पाली दोपहर 2 बजे से 4:30 बजे तक होगी। इसके लिए जिले में पांच परीक्षा केंद्र निर्धारित किए गए हैं, जिनमें लक्ष्मीनारायण कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला गुरुकुल परिसर, स्वामी आत्मानंद शासकीय अंग्रेजी माध्यम विद्यालय लालपुर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, रायपुर कॉन्वेंट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय गुढियारी और श्री शंकराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी शामिल हैं। परीक्षा के सुचारू संचालन के लिए डिप्टी कलेक्टर उपेंद्र किण्डो को सहायक समन्वयक पर्यवेक्षक और विशेष रोजगार कार्यालय रायपुर के अधिकारी केदारनाथ पटेल को कंट्रोल रूम प्रभारी नियुक्त किया गया है। प्रशासन ने सभी अभ्यर्थियों से अपील की है कि वे समय से पहले अपने परीक्षा केंद्र पहुंचें और जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें, ताकि परीक्षा शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सके।

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रायपुर में छात्रों को राहत: आधार और निवास प्रमाण पत्र पर मिलेगा 5 किलो LPG सिलेंडर

रायपुर में एलपीजी गैस को लेकर हो रही परेशानियों के बीच जिला प्रशासन ने छात्रों के लिए राहत भरा कदम उठाया है। कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह के निर्देश पर कलेक्टरेट स्थित रेडक्रॉस हॉल में अपर कलेक्टर कीर्तिमान सिंह राठौर ने गैस एजेंसियों के साथ समीक्षा बैठक की। बैठक में गैस की उपलब्धता, स्टॉक और वितरण व्यवस्था को लेकर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों ने बताया कि जिले में रहने वाले विद्यार्थियों को अब 5 किलो का छोटा गैस सिलेंडर एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए छात्रों को केवल अपना आधार कार्ड और निवास प्रमाण पत्र दिखाना होगा। अपर कलेक्टर ने साफ कहा कि जिले में गैस का पर्याप्त भंडार मौजूद है और सभी उपभोक्ताओं को नियमों के अनुसार गैस दी जा रही है। उन्होंने गैस वितरकों को निर्देश दिए कि वितरण में किसी भी प्रकार की लापरवाही न हो। साथ ही चेतावनी दी कि नियमों के खिलाफ सिलेंडर लेने की कोशिश करने या डिलीवरी कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा, एम्स, मेकाहारा, वृद्धाश्रम, अनाथालय और अन्य जरूरी संस्थानों में गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि शहरी क्षेत्रों में 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन के बाद ही अगली गैस बुकिंग की जा सकेगी। फिलहाल नए गैस कनेक्शन और सिंगल-डबल कनेक्शन पर अस्थायी रोक लगाई गई है। इंडेन डीलर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष और ऑल एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष विकास मरकाम ने लोगों से अपील की है कि घबराने की जरूरत नहीं है, पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और सभी को नियमानुसार गैस मिलती रहेगी।

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