Narayanpur News

नारायणपुर में तोते को उतारने के लिए फायर ब्रिगेड का इस्तेमाल, हजारों लीटर पानी बर्बाद होने पर विवाद

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर से एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है, जहां एक पालतू तोते को पेड़ से नीचे उतारने के लिए फायर ब्रिगेड को बुलाया गया। तोता काफी ऊंचाई पर बैठा हुआ था और लंबे समय तक नीचे नहीं आ रहा था, जिसके बाद उसे उतारने के लिए पानी की तेज धार का इस्तेमाल किया गया। जानकारी के मुताबिक यह घटना ओबीसी बॉयज हॉस्टल के पास की है। फायर ब्रिगेड की टीम ने पाइप के जरिए लगातार पानी की बौछारें कीं, जिसके बाद काफी प्रयासों के बाद तोता नीचे आया। इस पूरी प्रक्रिया में हजारों लीटर पानी खर्च हो गया। बताया जा रहा है कि यह तोता किसी अधिकारी का था, हालांकि अभी तक उस अधिकारी की पहचान सामने नहीं आई है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। भीषण गर्मी और पानी की कमी के बीच इस तरह पानी के इस्तेमाल को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी देखने को मिल रही है। लोगों का कहना है कि फायर ब्रिगेड जैसी जरूरी सेवा का उपयोग आग और आपात स्थितियों के लिए होना चाहिए, न कि ऐसे कामों के लिए। सोशल मीडिया यूजर्स भी इस मामले को लेकर सवाल उठा रहे हैं और इसे सरकारी संसाधनों के गलत इस्तेमाल के तौर पर देख रहे हैं। मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा शुरू हो गई है और अब इस पर कार्रवाई को लेकर नजर बनी हुई है।

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अबूझमाड़ में बदलाव की शुरुआत: नक्सल प्रभाव खत्म होने के बाद 239 गांवों में पहली बार पहुंचा प्रशासन

बस्तर का Abujhmad क्षेत्र, जो कभी नक्सल गतिविधियों का गढ़ माना जाता था, अब धीरे-धीरे मुख्यधारा से जुड़ रहा है। केंद्र सरकार द्वारा इस क्षेत्र को नक्सल प्रभाव से मुक्त घोषित किए जाने के बाद यहां प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। पहली बार यहां के 239 गांवों में सरकारी सर्वे शुरू किया गया है। इस सर्वे के जरिए गांवों में रहने वाले परिवारों की संख्या, सदस्यों का विवरण, खेती करने वाले लोगों की जानकारी और जमीन के उपयोग का आकलन किया जा रहा है। राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम इस काम में जुटी हुई है। सर्वे को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए Indian Institute of Technology Roorkee की मदद से पूरे क्षेत्र का सैटेलाइट मैप तैयार किया जा रहा है। सैटेलाइट इमेज के आधार पर गांवों और आबादी का प्रारंभिक नक्शा बनाया जा रहा है, जिसके बाद फील्ड टीम मौके पर जाकर हर घर और जमीन का सत्यापन करेगी। सर्वे पूरा होने के बाद दावा-आपत्ति की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इसके आधार पर जो परिवार जहां निवास कर रहा है और जिस जमीन पर खेती कर रहा है, उसे उसी के अनुसार मालिकाना हक प्रदान किया जाएगा। इससे लंबे समय से बिना अधिकार के रह रहे वनवासियों को कानूनी पहचान और जमीन का अधिकार मिल सकेगा। नारायणपुर जिले का ओरछा ब्लॉक, जिसे अबूझमाड़ के नाम से जाना जाता है, दशकों तक प्रशासन की पहुंच से बाहर रहा। आजादी के बाद भी यहां कई गांव सड़क और संचार सुविधाओं से कटे हुए थे। जैसे ही सड़क निर्माण शुरू हुआ, नक्सली गतिविधियां बढ़ गईं, जिससे यह इलाका उनका सुरक्षित ठिकाना बन गया। इसी वजह से यहां गांवों, आबादी और जमीन का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार नहीं हो पाया था। अब सुरक्षा बलों की मौजूदगी और सड़क विस्तार के बाद हालात बदल रहे हैं और प्रशासन पहली बार गांवों तक पहुंच पा रहा है। करीब 3 लाख हेक्टेयर में फैले इस घने जंगल क्षेत्र में वन विभाग की गतिविधियां भी दोबारा शुरू की जा रही हैं। जिन इलाकों में वर्षों पहले नक्सलियों द्वारा वन विभाग के भवनों को नष्ट कर दिया गया था, वहां फिर से काम शुरू हो रहा है। प्रशासन के अनुसार, सर्वे के साथ-साथ ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण भी किया जाएगा। नक्शा और खसरा तैयार होने के बाद जमीन के अधिकार देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। यह पहल न केवल विकास को गति देगी, बल्कि क्षेत्र के लोगों को स्थायी पहचान और अधिकार भी दिलाएगी।

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