Chhattisgarh High Court

RTE एडमिशन पर हाईकोर्ट सख्त: 400 स्कूलों में एक भी आवेदन नहीं, सरकार से मांगा जवाब

Chhattisgarh High Court ने प्रदेश में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत पहली कक्षा में एडमिशन की स्थिति को लेकर राज्य सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने उस रिपोर्ट पर हैरानी जताई, जिसमें बताया गया कि राज्य के करीब 400 स्कूलों में RTE के तहत एक भी आवेदन नहीं आया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने शपथ पत्र पेश कर बताया कि 387 स्कूल ऐसे हैं जहां एडमिशन के लिए किसी भी अभिभावक ने आवेदन नहीं किया। वहीं 366 स्कूलों में सीटों के मुकाबले बेहद कम आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनमें कई बड़े और प्रतिष्ठित स्कूल भी शामिल बताए गए हैं। इस पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या गरीब बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ना नहीं चाहते, या फिर कहीं सरकार वास्तविक स्थिति छिपाने की कोशिश तो नहीं कर रही। कोर्ट ने राज्य शासन को पूरी जानकारी शपथ पत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha की डिवीजन बेंच ने कहा कि RTE के तहत स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में यदि किसी स्कूल में सिर्फ एक-दो बच्चों के एडमिशन की जानकारी दी जा रही है, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने शिक्षा विभाग से पूछा कि जब नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, तब गरीब बच्चों के दाखिले में देरी क्यों हो रही है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण हजारों बच्चों का भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि सभी स्कूलों में RTE के तहत आवंटित सीटों और हुए एडमिशन की जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए। साथ ही शिक्षा सचिव को 10 जुलाई तक विस्तृत शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने को कहा गया है।

RTE एडमिशन पर हाईकोर्ट सख्त: 400 स्कूलों में एक भी आवेदन नहीं, सरकार से मांगा जवाब Read Post »

Bilaspur, Chhattisgarh, Education, GOVERNMENT

ताड़मेटला नरसंहार पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 16 साल बाद भी 76 जवानों के हत्यारों का दोष साबित नहीं

साल 2010 में छत्तीसगढ़ के ताड़मेटला में हुए भीषण नक्सली हमले को देश के सबसे बड़े CRPF नरसंहारों में गिना जाता है। इस हमले में 75 सीआरपीएफ जवानों और एक राज्य पुलिसकर्मी ने शहादत दी थी। लेकिन घटना के 16 साल बाद भी किसी आरोपी के खिलाफ अपराध साबित नहीं हो सका। अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि जांच एजेंसियां हमले में शामिल वास्तविक आरोपियों की पहचान तक कानूनी रूप से साबित नहीं कर सकीं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इतने बड़े हमले के बावजूद जांच और अभियोजन पक्ष अदालत के सामने ऐसे विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्य पेश नहीं कर पाए, जिनके आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया जा सके। अदालत ने इसे बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक स्थिति बताया। हमले के बाद पुलिस ने जांच करते हुए 10 लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों पर हत्या, आपराधिक साजिश, दंगा, डकैती, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम सहित कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष का दावा था कि आरोपी नक्सली संगठन से जुड़े हुए थे और हमले में उनकी भूमिका थी। हालांकि दंतेवाड़ा की सत्र अदालत ने 7 जनवरी 2013 को सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। बाद में राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही माना। ताड़मेटला हमले का मास्टरमाइंड कुख्यात नक्सली कमांडर Madvi Hidma को माना जाता था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार बस्तर क्षेत्र में हुए कई बड़े नक्सली हमलों के पीछे उसका नाम सामने आता रहा। बाद में नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश के मारेडूमिल्ली जंगलों में एक ऑपरेशन के दौरान हिड़मा के मारे जाने का दावा किया गया था।

ताड़मेटला नरसंहार पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 16 साल बाद भी 76 जवानों के हत्यारों का दोष साबित नहीं Read Post »

Chhattisgarh, GOVERNMENT, Raipur, Top News

बिलासपुर गौधाम में अव्यवस्था: 10×26 शेड में 205 मवेशी, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

बिलासपुर जिले के तखतपुर ब्लॉक के लाखासार स्थित गौधाम में गंभीर अव्यवस्थाएं सामने आई हैं। यहां महज 10×26 फीट के छोटे से शेड में 200 से अधिक मवेशियों को रखा गया है, जिससे उनके बैठने तक की जगह नहीं बची है। इस मामले को लेकर Chhattisgarh High Court ने राज्य सरकार से शपथपत्र के माध्यम से जवाब मांगा है। जानकारी के अनुसार, इस गौधाम का उद्घाटन 14 मार्च को मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने किया था। करीब 25 एकड़ में बने इस परिसर में पशु संरक्षण और विकास के लिए कई घोषणाएं भी की गई थीं, जिनमें प्रशिक्षण भवन, काऊ कैचर और पशु एम्बुलेंस शामिल हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत इन दावों से अलग नजर आ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, छोटे से शेड में 205 मवेशियों को ठूंसकर रखा गया है, जबकि पशु चिकित्सकों के अनुसार एक मवेशी के लिए कम से कम 30 से 40 वर्गफुट जगह आवश्यक होती है। इस स्थिति में पशुओं के बीमार होने और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है। गौधाम में चारा और पानी की भी कमी बताई जा रही है। पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं है और पूरे परिसर की देखरेख केवल एक चौकीदार के भरोसे है, जिसे सीमित वेतन पर 24 घंटे ड्यूटी करनी पड़ रही है। इसके अलावा, नवजात बछड़ों को उनकी मां से अलग रखने की बात भी सामने आई है, जो पशु कल्याण के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गौधाम का उद्देश्य सड़कों से मवेशियों को हटाना था, लेकिन अब भी आसपास की सड़कों पर बड़ी संख्या में मवेशी घूमते नजर आते हैं। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की खंडपीठ में हुई। अगली सुनवाई 14 मई को निर्धारित की गई है।

बिलासपुर गौधाम में अव्यवस्था: 10×26 शेड में 205 मवेशी, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब Read Post »

Bilaspur, Chhattisgarh, GOVERNMENT, Top News

झारखंड शराब घोटाला मामले में IAS अनिल टुटेजा को अग्रिम जमानत, हाईकोर्ट ने लगाईं सख्त शर्तें

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कथित झारखंड शराब घोटाला मामले में निलंबित आईएएस अधिकारी Anil Tuteja को अग्रिम जमानत प्रदान की है। जस्टिस पी.पी. साहू की एकल पीठ ने उन्हें 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने जमानत देते हुए स्पष्ट किया है कि टुटेजा को जांच में पूरा सहयोग करना होगा और किसी भी गवाह को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करनी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि वे जांच में बाधा डालते हैं, तो जांच एजेंसी उनकी जमानत रद्द कराने के लिए स्वतंत्र होगी। हालांकि, इस राहत के बावजूद टुटेजा का जेल से बाहर आना फिलहाल आसान नहीं माना जा रहा है, क्योंकि हाल ही में छत्तीसगढ़ के चर्चित डीएमएफ और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज हो चुकी है। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) ने टुटेजा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और आईपीसी की धारा 420 व 120B के तहत मामला दर्ज किया है। आरोप है कि उन्होंने अन्य लोगों के साथ मिलकर झारखंड में छत्तीसगढ़ के आबकारी मॉडल की तर्ज पर अवैध शराब कारोबार के लिए एक सिंडिकेट तैयार किया। जांच एजेंसी के अनुसार, इस सिंडिकेट ने झारखंड की आबकारी नीति में बदलाव कर अपने पसंदीदा ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया और अवैध रूप से करोड़ों रुपये का कमीशन अर्जित किया। टुटेजा ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत याचिका दायर करते हुए दावा किया था कि उन्हें लगातार अलग-अलग मामलों में फंसाकर जेल में रखने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड पुलिस ने इस मामले में उन्हें आरोपी तक नहीं बनाया है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि पिछले पांच वर्षों में विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई छापेमारी में उनके पास से कोई अवैध संपत्ति बरामद नहीं हुई और न ही कोई ठोस डिजिटल या वित्तीय साक्ष्य मिला है। वहीं, राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए टुटेजा को कई घोटालों का मास्टरमाइंड बताया और आरोप लगाया कि उन्होंने रायपुर में बैठकर झारखंड के अधिकारियों के साथ साजिश रची, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ। हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कहा कि टुटेजा पिछले दो वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं, इसके बावजूद जांच एजेंसी ने इस मामले में उनसे पूछताछ के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया। साथ ही, झारखंड पुलिस द्वारा उन्हें आरोपी न बनाए जाने और अन्य आरोपियों को जमानत मिलने जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उन्हें अग्रिम जमानत दी, लेकिन स्पष्ट किया कि जांच में सहयोग अनिवार्य होगा और किसी भी प्रकार की लापरवाही की स्थिति में जमानत रद्द की जा सकती है।

झारखंड शराब घोटाला मामले में IAS अनिल टुटेजा को अग्रिम जमानत, हाईकोर्ट ने लगाईं सख्त शर्तें Read Post »

Bilaspur, Chhattisgarh, GOVERNMENT, jharkhand, State, Top News

रेरा कोर्ट नहीं, नियामक संस्था है: हाईकोर्ट ने कहा—शिकायत पर समय सीमा लागू नहीं

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) को अदालत की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, बल्कि यह एक विशेष नियामक संस्था है। कोर्ट ने यह भी कहा कि रेरा में शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं है, इसलिए देरी के आधार पर शिकायत को खारिज करना उचित नहीं है। यह मामला जगदलपुर निवासी निधि साव से जुड़ा है, जिन्होंने दुर्ग जिले के अमलेश्वर स्थित ग्रीन अर्थ सिटी परियोजना में एक फ्लैट बुक किया था। उन्होंने बिल्डर पर समय पर कब्जा नहीं देने और निर्माण की गुणवत्ता खराब होने का आरोप लगाया था। निधि साव ने पहले स्थानीय प्रशासन से शिकायत की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने रेरा में याचिका दायर की। रेरा ने बिल्डर को दो महीने के भीतर निर्माण पूरा कर कब्जा देने का निर्देश दिया और साथ ही खरीदार को बकाया राशि जमा करने के लिए कहा। इस आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने रेरा अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील की, लेकिन ट्रिब्यूनल ने सुनवाई करने के बजाय यह कहते हुए मामला खारिज कर दिया कि शिकायत देर से की गई है। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस बीडी गुरु की बेंच ने ट्रिब्यूनल के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रेरा कानून की धारा 31 में शिकायत दर्ज करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, इसलिए केवल देरी के आधार पर केस खारिज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने मामले को वापस ट्रिब्यूनल को भेजते हुए निर्देश दिया कि अब इस पर नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की जाए, न कि तकनीकी आधार पर।

रेरा कोर्ट नहीं, नियामक संस्था है: हाईकोर्ट ने कहा—शिकायत पर समय सीमा लागू नहीं Read Post »

Bilaspur, Chhattisgarh, Top News

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, अनुकंपा नियुक्ति विरासत नहीं; सास का ख्याल न रखने पर बहू की नौकरी जा सकती है

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि यह कोई व्यक्तिगत लाभ, उपहार या विरासत नहीं है, बल्कि परिवार को आर्थिक संकट से उबारने के उद्देश्य से दी जाने वाली व्यवस्था है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ए.के. प्रसाद ने कहा कि जिस व्यक्ति को अनुकंपा नियुक्ति दी जाती है, उस पर परिवार के आश्रितों की जिम्मेदारी भी उतनी ही लागू होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि नियुक्त व्यक्ति अपने दायित्वों से पीछे हटता है, तो उसकी नौकरी समाप्त की जा सकती है। यह मामला अंबिकापुर की रहने वाली एक महिला से जुड़ा है, जिनके पति पुलिस विभाग में कार्यरत थे और वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे को अनुकंपा नियुक्ति मिली। बाद में बेटे की भी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी पत्नी को नौकरी दी गई। आरोप है कि नौकरी मिलने के बाद बहू ने अपनी सास की देखभाल करना बंद कर दिया और उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगी। आर्थिक रूप से कमजोर हो चुकी सास ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका में यह भी बताया गया कि बहू को नौकरी इस शर्त पर दी गई थी कि वह सास का भरण-पोषण करेगी। लेकिन उसने इस जिम्मेदारी को निभाने से इनकार कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि नियुक्ति के समय बहू ने शपथ-पत्र देकर सास की देखभाल करने की बात स्वीकार की थी। ऐसे में यह जिम्मेदारी निभाना उसके लिए अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति को नौकरी देना नहीं, बल्कि पूरे परिवार को सहारा देना है। इसलिए नियुक्त व्यक्ति अपने कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि शर्तों का पालन नहीं किया गया, तो नियुक्ति रद्द की जा सकती है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, अनुकंपा नियुक्ति विरासत नहीं; सास का ख्याल न रखने पर बहू की नौकरी जा सकती है Read Post »

Bilaspur, Chhattisgarh, GOVERNMENT, State, Top News

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पिता की हत्या के मामले में बेटे की सजा उम्रकैद से घटाकर 10 साल

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पिता की हत्या के आरोप में सजा काट रहे बेटे को राहत देते हुए उसकी सजा कम कर दी है। अदालत ने उम्रकैद की सजा को घटाकर 10 साल कठोर कारावास में बदल दिया है। यह निर्णय छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह घटना पूर्व नियोजित नहीं थी, बल्कि अचानक हुए विवाद और गुस्से में अंजाम दी गई। ऐसे मामलों में हत्या का स्पष्ट इरादा साबित नहीं होता, इसलिए इसे हत्या (IPC 302) के बजाय गैर-इरादतन हत्या (IPC 304 भाग-1) के तहत माना जाना चाहिए। दरअसल, यह मामला वर्ष 2020 का है, जो बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के रामचंद्रपुर थाना क्षेत्र के हरिहरपुर गांव का है। यहां लकड़ी रखने को लेकर पिता और बेटे के बीच विवाद हुआ था। इसी दौरान बेटे महात्मा यादव ने गुस्से में आकर अपने पिता जंगली यादव को पिकअप वाहन से कुचल दिया था। इस घटना में पिता गंभीर रूप से घायल हो गए थे और इलाज के दौरान करीब 9 दिन बाद उनकी मौत हो गई थी। घटना के बाद पुलिस ने आरोपी बेटे के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट पेश की गई और निचली अदालत ने ट्रायल के बाद आरोपी को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि घटना अचानक हुई थी और इसमें पूर्व योजना का कोई प्रमाण नहीं है। हालांकि, आरोपी को यह पता था कि उसका कृत्य जानलेवा हो सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सजा में संशोधन करते हुए हत्या की धारा को बदल दिया और उम्रकैद की सजा को घटाकर 10 साल कर दिया। अदालत ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि आरोपी को अब शेष सजा जेल में ही पूरी करनी होगी।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पिता की हत्या के मामले में बेटे की सजा उम्रकैद से घटाकर 10 साल Read Post »

Bilaspur, Chhattisgarh, Crime, GOVERNMENT, State, Top News

Chhattisgarh High Court ने बिना मान्यता वाले स्कूलों द्वारा एडमिशन के विज्ञापन जारी करने के मामले में कड़ा रुख दिखाया है

अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को इस संबंध में व्यक्तिगत शपथपत्र (पर्सनल एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही संबंधित स्कूल को भी मामले में पक्षकार बनाकर नोटिस जारी किया गया है। यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच में हुई। मामला जनहित याचिका (WPPIL No. 22/2016) से जुड़ा है, जिसमें इंटरवीनर विकास तिवारी द्वारा उठाए गए मुद्दों पर सुनवाई की गई। शिकायतों पर कार्रवाई न होने पर नाराजगी 📄 सुनवाई के दौरान बताया गया कि 5 फरवरी 2026 को लोक शिक्षण संचालनालय ने दुर्ग, रायपुर और बिलासपुर के जिला शिक्षा अधिकारियों को शिकायतों पर एक सप्ताह में कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस पर कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई तक कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया। बिना मान्यता के एडमिशन प्रक्रिया पर सवाल 🎓 अदालत के सामने एक पत्रिका में प्रकाशित प्रवेश विज्ञापन भी पेश किया गया, जिसमें सत्र 2026–27 के लिए कई निजी स्कूलों में एडमिशन शुरू होने की जानकारी दी गई थी। याचिका में दावा किया गया कि ये स्कूल आवश्यक मान्यता के बिना ही संचालित हो रहे हैं और फिर भी प्रवेश प्रक्रिया चला रहे हैं, जो अदालत के पूर्व आदेशों का उल्लंघन हो सकता है। किन स्कूलों का हुआ उल्लेख 🏫 विज्ञापन में तुलसी कृष्णा किड्स एकेडमी (मोवा) और कृष्णा किड्स एकेडमी की शंकर नगर, न्यू राजेंद्र नगर, सुंदर नगर और शैलेंद्र नगर स्थित शाखाओं का नाम सामने आया। अदालत ने Krishna Public School, Tulsi को भी मामले में पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। शिक्षा सचिव से मांगा जवाब ⏳ डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि बिना मान्यता के स्कूलों द्वारा प्रवेश विज्ञापन देना अदालत के आदेशों की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है। इसलिए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च 2026 तय की है, जिसमें विभाग को अब तक की कार्रवाई और अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा।

Chhattisgarh High Court ने बिना मान्यता वाले स्कूलों द्वारा एडमिशन के विज्ञापन जारी करने के मामले में कड़ा रुख दिखाया है Read Post »

Chhattisgarh, Top News

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन चुनाव: रजनीश सिंह बघेल अध्यक्ष निर्वाचित, अनिल त्रिपाठी बने सचिव

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के 2026-2028 कार्यकाल के लिए संपन्न हुए चुनाव में अध्यक्ष पद पर एडवोकेट रजनीश सिंह बघेल ने जीत हासिल की है। उन्होंने सीनियर एडवोकेट राजीव श्रीवास्तव को 137 मतों के अंतर से पराजित किया। सचिव पद पर अनिल त्रिपाठी निर्वाचित हुए हैं। वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में गौतम खेत्रपाल और महिला उपाध्यक्ष के रूप में मांडवी भारद्वाज ने जीत दर्ज की। परिणाम घोषित होते ही अधिवक्ताओं के बीच उत्साह का माहौल रहा और समर्थकों ने जश्न मनाया। 85 प्रतिशत से अधिक मतदान गुरुवार को हुए मतदान में कुल 1418 पंजीकृत मतदाताओं में से 1213 अधिवक्ताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। इस प्रकार कुल मतदान प्रतिशत 85.54 रहा, जो बार एसोसिएशन चुनाव के लिए उल्लेखनीय माना जा रहा है। चुनाव में 17 पदों के लिए 61 उम्मीदवार मैदान में थे। मतदान के बाद शुक्रवार सुबह 11 बजे से मतगणना शुरू हुई और देर शाम तक परिणाम घोषित कर दिए गए। अन्य पदों पर भी घोषित हुए परिणाम अध्यक्ष पद के लिए इस बार कुल 7 प्रत्याशी मैदान में थे। संयुक्त सचिव पद पर एडवोकेट विजय साहू, संयुक्त सचिव (महिला) पद पर आस्था शुक्ला विजयी रहीं। पुस्तकालय सचिव के रूप में राहुल मिश्रा, खेल सचिव (पुरुष) पद पर अमन पांडेय और खेल सचिव (महिला) पद पर प्रज्ञा पांडेय ने जीत दर्ज की। कार्यकारिणी सदस्य पद के परिणाम कार्यकारिणी के पांच पदों पर एडवोकेट अभिषेक पांडेय, त्रिवेणी शंकर साहू, आशुतोष मिश्रा, शरद मिश्रा और उज्ज्वल चौबे निर्वाचित हुए। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा, बार और बेंच के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा वकीलों के लिए सुविधाओं के विस्तार की दिशा में कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया।

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन चुनाव: रजनीश सिंह बघेल अध्यक्ष निर्वाचित, अनिल त्रिपाठी बने सचिव Read Post »

Bilashpur, Chhattisgarh, Top News

35 साल की शादी में तलाक के लिए ठोस सबूत जरूरी: पत्नी के अलग रहने पर भी हाईकोर्ट ने खारिज की पति की याचिका

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि लंबे वैवाहिक संबंधों में तलाक के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि क्रूरता और परित्याग के ठोस व स्पष्ट प्रमाण आवश्यक हैं। कोर्ट ने 35 साल पुरानी शादी को खत्म करने की मांग वाली पति की याचिका खारिज कर दी। यह मामला उस पति से जुड़ा है, जिसने यह कहते हुए तलाक मांगा था कि उसकी पत्नी झगड़ालु है, मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है और पिछले करीब 14–15 वर्षों से उसे छोड़कर बेटी व दामाद के साथ रह रही है। पत्नी ने लगाए पलटवार में आरोप वहीं पत्नी ने पति की तलाक याचिका का विरोध करते हुए कहा कि पति अक्सर उसके चरित्र पर शक करता था और गाली-गलौच करता था। उसने यह भी बताया कि वह बीपी और शुगर की मरीज है, लेकिन पति ने कभी उसके इलाज का खर्च नहीं उठाया। मजबूरी में उसे बेटी के घर रहना पड़ा। क्या है पूरा मामला बेमेतरा जिले के निवासी गिरधर दुबे ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की थी। दंपती की शादी करीब 35 साल पहले हुई थी और उनके दो बच्चे हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पति पेशे से पुजारी है। पति का दावा था कि पत्नी के अलग रहने और मानसिक प्रताड़ना के कारण वैवाहिक जीवन समाप्त हो चुका है। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 5 जुलाई 2023 को यह याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को ठहराया सही पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने की। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पत्नी का अलग रहना तलाक का आधार नहीं बन सकता। क्रूरता और परित्याग साबित करने के लिए स्पष्ट घटनाएं, ठोस आरोप और पुख्ता साक्ष्य जरूरी होते हैं। कोर्ट ने पाया कि पति की ओर से पेश किए गए गवाहों के बयान सामान्य और अस्पष्ट थे, जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वहीं महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट में पत्नी के आरोप अधिक विश्वसनीय पाए गए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि तलाक जैसे गंभीर मामले में केवल अंदाजों या सामान्य आरोपों के आधार पर विवाह विच्छेद नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट का निर्णय रिकॉर्ड के अनुरूप और सही है। इसी आधार पर पति की अपील को खारिज कर दिया गया।

35 साल की शादी में तलाक के लिए ठोस सबूत जरूरी: पत्नी के अलग रहने पर भी हाईकोर्ट ने खारिज की पति की याचिका Read Post »

Bilashpur, Chhattisgarh, State
Scroll to Top