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रायपुर में अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद स्थानीय प्रतिक्रिया, शोक और विरोध प्रदर्शन

रायपुर: मध्य पूर्व में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं, खासकर उस खबर के बाद जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की पुष्टि हुई है। संयुक्त रूप से अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए पैमाने पर सैन्य हमलों के कारण खामेनेई सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मार दिए गए हैं, जिसकी वजह से विश्वभर में तनाव और प्रतिक्रिया की लहर फैल रही है। राजधानी रायपुर के मोमिनपारा इलाके में शिया समुदाय के लोगों ने बुधवार को हमले का विरोध और खामेनेई की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया। विरोध प्रदर्शनों में डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के पोस्टर भी लगाए गए, जिन पर ‘Down to America’ और ‘Down to Israel’ जैसे नारे लिखे गए थे। कुछ लोगों ने इन पोस्टरों पर नीली स्याही भी फेंकी, जबकि राहगीरों को इन पोस्टरों को पैरों से रौंदते हुए आगे बढ़ते देखा गया। स्थानीय भीड़ ने विरोध के साथ-साथ खामेनेई के लिए शोक सभाओं का आयोजन भी किया। मोमिनपारा व पंडरी क्षेत्रों के इमामबाड़ों में बड़ी संख्या में लोगों ने इकट्ठा होकर मौन रक्षा सभाएं और मजलिसें रखीं, जिसमें समुदाय के लोगों ने भावनात्मक शोक व्यक्त किया। आम लहज़ा और समुदाय की भावनाएँ शिया समुदाय का शोक सभा आयोजन मोमिनपारा तथा पंडरी स्थित कई इमामबाड़ों में खामेनेई की मौत की खबर पर शोक सभा एवं मजलिस का आयोजन किया गया। शोक सभा में लोगों ने खामेनेई के व्यक्तित्व और उनके नेतृत्व के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। खामेनेई कौन थे और क्या हुआ? अयातुल्ला अली खामेनेई, ईरान के सबसे उच्च राजनीतिक और धार्मिक नेता थे, जिन्होंने 1989 से इस पद पर कार्य किया। संयुक्त अमेरिका और इज़राइल द्वारा 28 फरवरी 2026 को ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले किए गए, जिनमें हवाई हमले तथा मिसाइल दागे गए। राज्य मीडिया और कई अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के अनुसार, इस हमले में खामेनेई की मौत की पुष्टि की गई है। हमलों में न केवल खामेनेई बल्कि उनके परिवार के सदस्यों और अनेक वरिष्ठ सैन्य तथा राजनीतिक अधिकारियों के भी मारे जाने की खबरें सामने आई हैं। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों के बाद ईरान ने जवाबी मिसाइल हमले किए हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। क्या अमेरिका-इजराइल हमले थे? उल्लेखनीय है कि संयुक्त युद्ध अभियान को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के नाम से जाना जा रहा है, जिसमें बड़े पैमाने पर लक्षित हमले किए गए। इस ऑपरेशन में संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल की वायु सेना और मिसाइल प्रणालियों का व्यापक उपयोग किया गया।

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केमिकल रंगों से बिगड़ सकता है आपका त्योहार: होली खेलें समझदारी से, सेहत और त्वचा का रखें खास ख्याल

होलिका दहन के साथ ही प्रदेशभर में रंगों के त्योहार होली की शुरुआत हो जाएगी। यह पर्व उमंग, भाईचारे और खुशियों का प्रतीक है, लेकिन जरा सी लापरवाही आपके उत्सव को फीका कर सकती है। खासकर केमिकल युक्त रंगों का इस्तेमाल त्वचा, आंखों और बालों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। अक्सर लोग पूरे जोश में होली तो खेलते हैं, लेकिन बाद में रंग छुड़ाने की जल्दबाजी में त्वचा पर डिटर्जेंट, केमिकल या अन्य कठोर चीजों का प्रयोग करने लगते हैं। इससे त्वचा में जलन, एलर्जी, रैशेज और लंबे समय तक रहने वाले दाग हो सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि होली खेलने से पहले और बाद में कुछ सावधानियां जरूर बरती जाएं। 1. होली से पहले त्वचा की तैयारी जरूरी होली खेलने से पहले त्वचा को तैयार करना बेहद आवश्यक है। बाहर निकलने से पहले शरीर और चेहरे पर नारियल तेल, सरसों तेल या मॉइश्चराइजर अच्छी तरह लगा लें। इससे रंग सीधे त्वचा पर चिपक नहीं पाएगा और बाद में आसानी से छूट जाएगा। हल्के रंग के बजाय गहरे और पूरे बाजू के कपड़े पहनें ताकि त्वचा कम एक्सपोज हो। बालों में भी तेल लगाकर उन्हें बांध लें, जिससे स्कैल्प सुरक्षित रहे। 2. केमिकल रंगों से बनाएं दूरी बाजार में मिलने वाले सस्ते और चटक रंगों में कई बार हानिकारक रसायन मिले होते हैं। ये त्वचा संक्रमण, आंखों में जलन और एलर्जी का कारण बन सकते हैं। ऐसे में हर्बल या प्राकृतिक रंगों का उपयोग बेहतर विकल्प है। घर पर भी फूलों, हल्दी या बेसन जैसे प्राकृतिक पदार्थों से रंग तैयार किए जा सकते हैं। इससे त्योहार का आनंद भी बना रहेगा और सेहत पर बुरा असर भी नहीं पड़ेगा। 3. रंग छुड़ाने में जल्दबाजी न करें होली के बाद रंग छुड़ाने के लिए डिटर्जेंट या कठोर साबुन का इस्तेमाल न करें। इससे त्वचा की ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है। चेहरे के लिए बेसन और दही का लेप एक सुरक्षित और कारगर उपाय माना जाता है। इसे हल्के हाथों से लगाकर धोने से रंग धीरे-धीरे साफ हो जाता है। इसके अलावा माइल्ड फेसवॉश और गुनगुने पानी का उपयोग करें। याद रखें, कुछ रंग 2–3 दिन में खुद ही हल्के पड़ जाते हैं। त्वचा के साथ जोर-जबरदस्ती करने से बेहतर है थोड़ा धैर्य रखें। 4. अलग-अलग त्वचा के लिए अलग देखभाल हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है। जिनकी त्वचा संवेदनशील है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। एलर्जी या स्किन प्रॉब्लम से जूझ रहे लोग होली खेलने से पहले डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। तैलीय त्वचा वाले लोग ऑयल-फ्री मॉइश्चराइजर लगाएं, जबकि ड्राई स्किन वालों को अच्छी तरह मॉइश्चराइज करना चाहिए। 5. बीपी, शुगर और बुजुर्गों का रखें ध्यान होली के दौरान अत्यधिक भागदौड़ और धूप में रहना बीपी और शुगर के मरीजों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। ऐसे लोग सीमित समय तक ही होली खेलें और पर्याप्त पानी पीते रहें। घर में छोटे बच्चे और बुजुर्ग हों तो उन पर विशेष ध्यान दें। उनकी आंख, नाक और मुंह में रंग न जाए, इसका ख्याल रखें। बच्चों को सुरक्षित और प्राकृतिक रंगों से ही होली खेलने दें। होली खुशियों का त्योहार है। थोड़ी सी सावधानी और समझदारी से आप इसे सुरक्षित और यादगार बना सकते हैं। इस बार रंगों के साथ सेहत की भी रक्षा करें, ताकि त्योहार की मिठास लंबे समय तक बनी रहे।

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रायपुर: चंद्रखुरी में 51 फीट ऊंची वनवासी श्रीराम की नई प्रतिमा होगी स्थापित, ग्वालियर से पहुंची 35 टन की मूर्ति

रायपुर। जिले के Chandkhuri में जल्द ही 51 फीट ऊंची वनवासी रूप में Bhagwan Shri Ram की नई भव्य प्रतिमा स्थापित की जाएगी। चंद्रखुरी को माता कौशल्या की जन्मस्थली और भगवान श्रीराम का ननिहाल माना जाता है, इसलिए यह स्थान धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। ग्वालियर में तैयार हुई प्रतिमा यह प्रतिमा ग्वालियर में तैयार की गई है। विश्व प्रसिद्ध टिडमिंट पत्थर से निर्मित इस मूर्ति में लगभग 70 टन पत्थर का उपयोग किया गया है, जबकि तैयार प्रतिमा का वजन करीब 35 टन बताया जा रहा है। मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा और उनकी 25 सदस्यीय टीम ने करीब सात महीनों तक लगातार मेहनत कर इस प्रतिमा को आकार दिया। प्रतिमा में 108 रुद्राक्ष की माला भी उकेरी गई है, जो इसकी आध्यात्मिक भव्यता को और बढ़ाती है। तीन हिस्सों में लाई जा रही प्रतिमा भारी भरकम आकार के कारण प्रतिमा को तीन हिस्सों में रायपुर लाया जा रहा है। चंद्रखुरी में इसे जोड़कर विधिवत स्थापित किया जाएगा। पहले भी रही है विशाल प्रतिमा चंद्रखुरी में पूर्व में भी भगवान श्रीराम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। हालांकि, उसके स्वरूप को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे। नई प्रतिमा को अधिक भव्य और आकर्षक स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। पर्यटन और आस्था को मिलेगा बढ़ावा राम वनगमन पथ से जुड़े इस स्थल पर नई प्रतिमा स्थापित होने से धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। स्थानीय प्रशासन और श्रद्धालुओं में इसे लेकर उत्साह देखा जा रहा है। प्रतिमा की स्थापना के बाद चंद्रखुरी एक बार फिर आस्था और सांस्कृतिक पहचान के केंद्र के रूप में चर्चा में रहेगा।

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स्विट्जरलैंड घूमने का सपना छोड़ साध्वी बनने जा रही सुरभि, रायपुर के 8 लोग मुमुक्ष बने; 13–16 साल के बच्चे भी शामिल

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से जैन समाज की आस्था और त्याग से जुड़ी एक अनोखी मिसाल सामने आई है। यहां अलग-अलग परिवारों के 8 सदस्यों ने सांसारिक जीवन त्यागकर मुमुक्ष बनने का निर्णय लिया है। इनमें एक 27 वर्षीय युवती, दो दंपती और 13 से 16 वर्ष की उम्र के तीन बच्चे शामिल हैं। इन सभी ने कठिन तपस्या और गुरुओं की कड़ी परीक्षा के बाद मोक्ष के मार्ग पर चलने की अनुमति प्राप्त की। गुरुओं द्वारा 18 घंटे तक नंगे पांव चलाकर, संयम और सहनशीलता की परीक्षा ली गई, जिसमें सभी सफल रहे। गुरु ने कहा – त्याग ही जैन धर्म की सबसे बड़ी शक्ति जैन संत योग तिलक सुरीश्वर ने बताया कि जैन धर्म में त्याग और तप का विशेष महत्व है। जब कोई व्यक्ति सांसारिक सुखों से ऊपर उठकर आत्मिक सुख को अपना लक्ष्य बना लेता है, तभी वह मुमुक्ष कहलाने योग्य बनता है। उन्होंने कहा कि सच्चे मार्गदर्शन और कठिन साधना के बिना यह मार्ग संभव नहीं। आधुनिक सोच वाली सुरभि अब बनेंगी साध्वी 27 साल की सुरभि भंसाली, जिन्होंने मास्टर ऑफ फूड टेक्नोलॉजी की पढ़ाई की है, आधुनिक जीवनशैली की शौकीन थीं। घूमना-फिरना, दोस्तों के साथ समय बिताना और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उनकी मां बदामी बाई भंसाली ने बताया कि सुरभि को स्विट्जरलैंड और कश्मीर घूमने का सपना था और वह वर्ल्ड टूर करना चाहती थी। लेकिन चातुर्मास के दौरान धार्मिक वातावरण से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन धर्म और साधना को समर्पित करने का फैसला किया। परिवार को पहले हैरानी हुई, लेकिन बाद में गर्व महसूस हुआ। एक ही परिवार के चार सदस्य बने मुमुक्ष रायपुर की आम्रपाली सोसायटी निवासी आशीष सुराना (44), उनकी पत्नी रितु सुराना (42) और दोनों बेटे आर्यन (16) व आरुष (14) भी मुमुक्ष बनने जा रहे हैं। चारों ने मिलकर सांसारिक रिश्तों और सुख-सुविधाओं को छोड़ने का निर्णय लिया है। दीक्षा के बाद इनका आपसी पारिवारिक रिश्ता भी समाप्त हो जाएगा। 18 घंटे नंगे पांव चलकर दी परीक्षा परिवार के सदस्य रितेश सुराना ने बताया कि गुरु द्वारा बच्चों और माता-पिता की कई स्तरों पर परीक्षा ली गई। इन सभी परीक्षाओं में परिवार सफल रहा। बिजनेस बेचकर मोक्ष की राह चुनी आशीष सुराना का रायपुर में बैग का होलसेल कारोबार था, जिसे उन्होंने दीक्षा से पहले बेच दिया। इसके बाद परिवार के साथ समय बिताया और फिर पत्नी व बच्चों के साथ मुमुक्ष बनने निकल पड़े। 13 साल का तनिष भी चुनेगा संयम का जीवन रायपुर के दावड़ा कॉलोनी निवासी 13 वर्षीय तनिष सोनिगरा भी मुमुक्ष बनने जा रहे हैं। उनके माता-पिता प्रमोद और शीतल सोनिगरा ने बताया कि शुरुआत में यह फैसला स्वीकार करना बेहद कठिन था, लेकिन तनिष के आत्मिक झुकाव को देखकर उन्होंने सहमति दी। तनिष को फिल्में देखना और अच्छा खाना पसंद था, लेकिन अब उसने स्वयं संयम और तप का जीवन चुना है। माता-पिता बने मुमुक्ष, बेटा बना सहारा सदर बाजार निवासी शैलेंद्र संकलेचा (49) और उनकी पत्नी एकता संकलेचा (47) भी मुमुक्ष बन रहे हैं। उनके बेटे यश ने कहा कि शुरुआत में यह फैसला दुखद लगा, लेकिन बाद में समझ आया कि हर इंसान को अपने जीवन में सच्चा सुख चुनने का अधिकार है। मुमुक्ष बनने के बाद ऐसा होगा जीवन मुमुक्ष बनने के बाद व्यक्ति: मुंबई में होगा दीक्षा समारोह 8 फरवरी को मुंबई में संयमरंग महोत्सव आयोजित होगा, जहां देशभर के 64 मुमुक्ष दीक्षा लेंगे। इनमें रायपुर के ये 8 मुमुक्ष भी शामिल होंगे। इससे पहले रायपुर में 25 और 26 जनवरी को संयम मनोरथ उत्सव आयोजित कर जैन समाज ने सभी मुमुक्षों को भावभीनी विदाई दी।

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राजनांदगांव में पकड़ा गया धर्मांतरण का विदेशी नेटवर्क, अमेरिका से आया मुख्य आरोपी

त्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में पुलिस ने धर्मांतरण के एक संगठित नेटवर्क का खुलासा किया है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि इस नेटवर्क में विदेशी फंडिंग, संदिग्ध प्रशिक्षण मॉड्यूल और ‘पॉल’ जैसे कोड नेम वाले जमीनी स्तर के कार्यकर्ता शामिल थे। मामला लालबाग थाना क्षेत्र का है। जांच में सामने आया कि मुख्य आरोपी डेविड चाको पहले अमेरिका में पढ़ाता था और भारत लौटने के बाद उसे बड़ी रकम मिली। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि यह पैसा किस रास्ते भारत आया, किन खातों में जमा हुआ और डॉलर को रुपए में कैसे बदला गया। संदेह है कि इस रकम का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर धर्मांतरण की गतिविधियों में किया गया। पुलिस को आश्रम और चर्च से कई संदिग्ध पुस्तकें और प्रशिक्षण सामग्री भी मिली हैं। इन सामग्री में इस्तेमाल कोड और प्रचार के तरीकों की विशेषज्ञों से जांच कराई जा रही है। दिसंबर 2025 में ग्राम पनेका में चार दिवसीय प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित किया गया था, जिसमें अन्य जिलों से अधिकारी शामिल हुए थे। प्रशिक्षण में जमीनी कार्यकर्ताओं को ‘पॉल’ जैसे नाम दिए गए और भुगतान ट्रैवल वाउचर के जरिए किया गया। 8 जनवरी को ग्राम धर्मापुर से लिखित शिकायत मिली थी कि आश्रम में नाबालिग बच्चों को रखा गया है और धर्मांतरण की गतिविधियां हो रही हैं। SP अंकिता शर्मा और टीम ने कार्रवाई करते हुए बच्चों को CWC के हवाले कर दिया। छापेमारी में सोलर-आधारित प्रोजेक्टर्स, लैपटॉप, टैबलेट, प्रीमियम मोबाइल फोन और फाइनेंशियल रिकॉर्ड जब्त किए गए। इन प्रोजेक्टर्स और डिजिटल दस्तावेजों का इस्तेमाल ब्रेनवॉश करने के लिए किया जाता था। राजनांदगांव SP अंकिता शर्मा ने कहा कि मामले की जांच पूरी गंभीरता से की जा रही है और सभी दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

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साहू समाज का बड़ा फैसला: प्री-वेडिंग शूट पर पूर्ण प्रतिबंध, तलाक रोकने पारिवारिक काउंसलिंग होगी शुरू

छत्तीसगढ़ में साहू समाज ने सामाजिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में अहम निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ ने प्री-वेडिंग शूट पर पूरी तरह रोक लगाने का ऐलान किया है। यह फैसला समाज में बढ़ते दिखावे, अनावश्यक खर्च और बदलते संस्कारों पर नियंत्रण के उद्देश्य से लिया गया है। शनिवार को आयोजित प्रदेश स्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष डॉ. नीरेंद्र साहू ने की। बैठक में प्रदेश के सभी जिलों से आए जिला अध्यक्षों और समाज के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। दिखावे और फिजूलखर्ची पर रोक का प्रयास बैठक के दौरान समाज की वर्तमान स्थिति, सामाजिक परंपराओं में आ रहे बदलाव और बढ़ती दिखावटी संस्कृति पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रदेश संयुक्त सचिव प्रदीप साहू ने बताया कि लंबे विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से प्री-वेडिंग शूट को समाजहित में बंद करने का निर्णय लिया गया। प्रदेश साहू संघ का मानना है कि साहू समाज की पहचान सादगी, संस्कार और सामाजिक सौहार्द से रही है, लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ती दिखावे की प्रवृत्ति समाज की परंपरागत जड़ों को कमजोर कर रही है। इस निर्णय के जरिए समाज को अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटाने का प्रयास किया जा रहा है। तलाक के मामलों पर चिंता, फैमिली काउंसलिंग की पहल बैठक में समाज के भीतर बढ़ते तलाक के मामलों पर भी गंभीर चिंता जताई गई। इस पर निर्णय लिया गया कि पारिवारिक विवादों को सुलझाने और रिश्तों को टूटने से बचाने के लिए फैमिली काउंसलिंग की व्यवस्था शुरू की जाएगी। इसका उद्देश्य पारिवारिक संस्कारों को मजबूत करना और दांपत्य जीवन में संतुलन बनाए रखना है। सामाजिक अनुशासन और एकता पर जोर प्रदेश स्तरीय बैठक में सामाजिक एकता, अनुशासन और संस्कार विकास को सशक्त करने के लिए संगठित रूप से कार्य करने का संकल्प लिया गया। प्रदेश साहू संघ ने स्पष्ट किया कि जो परंपराएं समाज को कमजोर करती हैं, उन्हें आगे स्वीकार नहीं किया जाएगा। संघ ने समाज के सभी सदस्यों से इन निर्णयों का पालन करने और समाजहित में सक्रिय सहयोग देने की अपील की है।

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छत्तीसगढ़ में रविवार को ही क्यों बढ़ते हैं हिंदू-ईसाई टकराव?

पिछले 5 साल में 200 से ज्यादा विवाद, 19 जिले प्रभावित, बस्तर बना हॉटस्पॉट छत्तीसगढ़ में हिंदू और ईसाई समुदाय के बीच टकराव की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इन घटनाओं में एक समान पैटर्न देखने को मिलता है—धर्मांतरण, मतांतरण और प्रार्थना सभाएं। खास बात यह है कि अधिकांश विवाद रविवार के दिन ही होते हैं। इसी आशंका को देखते हुए पुलिस और प्रशासन शुक्रवार व शनिवार से ही हाई अलर्ट पर रहता है। भास्कर डिजिटल की पड़ताल में सामने आया कि बीते 5 वर्षों में प्रदेश में हिंदू-ईसाई समुदायों के बीच 200 से अधिक विवाद दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में 60 से ज्यादा FIR हुई हैं। सबसे ज्यादा टकराव बस्तर संभाग सहित 19 जिलों में देखने को मिला है। इन घटनाओं में कांकेर में शव दफनाने को लेकर हिंसा, दुर्ग रेलवे स्टेशन से मिशनरी सिस्टर्स की गिरफ्तारी, रायपुर में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप, बिलासपुर में प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण जैसे कई मामले शामिल हैं। किन जिलों में सबसे ज्यादा विवाद छत्तीसगढ़ में ईसाई समाज की गतिविधियां 19 जिलों में अधिक सक्रिय बताई जाती हैं। इन इलाकों में चर्च और प्रार्थना सभाएं संचालित होती हैं, जिनमें कुछ पंजीकृत हैं तो कई घरों से संचालित हो रही हैं। इसी को लेकर धर्मांतरण और मतांतरण के आरोपों पर विवाद की स्थिति बनती है। सबसे ज्यादा तनाव बस्तर संभाग में देखने को मिला है। बस्तर, कोंडागांव, नारायणपुर, कांकेर और सुकमा जिले धर्मांतरण और अंतिम संस्कार (दफनाने) से जुड़े विवादों के प्रमुख केंद्र रहे हैं। इसके अलावा कोरबा, बलरामपुर, महासमुंद, दुर्ग और बिलासपुर में भी बार-बार टकराव हुआ है। वहीं सरगुजा और सूरजपुर में अपेक्षाकृत कम विवाद सामने आए हैं। रविवार को ही क्यों होती हैं घटनाएं दरअसल, रविवार को ईसाई समुदाय की प्रार्थना सभाएं आयोजित होती हैं। इनमें यीशु मसीह की आराधना, धार्मिक उपदेश और कथाएं सुनाई जाती हैं। इन सभाओं में कई बार हिंदू समुदाय के लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है। अनेक मामलों में जब हिंदू संगठनों को इन सभाओं में धर्मांतरण की आशंका होती है, तो वे विरोध दर्ज कराने पहुंचते हैं। इसी दौरान दोनों पक्ष आमने-सामने आ जाते हैं और तनाव की स्थिति बन जाती है। कई बार पुलिस को अतिरिक्त बल तैनात कर हालात संभालने पड़ते हैं। वरिष्ठ पत्रकार की राय वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार का कहना है कि हर रविवार को स्वतः दो समुदायों के बीच टकराव होना कहना सही नहीं है। उनके अनुसार, कुछ आक्रामक समूहों द्वारा दूसरे समुदायों की प्रार्थना सभाओं पर हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को स्वयं कानून के तहत कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि हालात न बिगड़ें। पिछले वर्षों की प्रमुख घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, बालोद और कांकेर जैसे जिलों में धर्मांतरण, प्रार्थना सभा, अवैध चर्च और अंतिम संस्कार को लेकर कई बड़े विवाद हुए। कई मामलों में पुलिस ने गिरफ्तारी की, FIR दर्ज हुई और प्रशासनिक कार्रवाई भी की गई। धर्मांतरण और मतांतरण क्या है धर्मांतरण का अर्थ है एक धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाना। छत्तीसगढ़ में इसके लिए जिला प्रशासन को पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।मतांतरण में व्यक्ति अपने विश्वास और आस्था में बदलाव करता है, लेकिन इसका सरकारी रिकॉर्ड आवश्यक नहीं होता। छत्तीसगढ़ का धार्मिक स्वतंत्रता कानून प्रदेश में छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 लागू है। इसके तहत जबरन, प्रलोभन या धोखे से धर्मांतरण कराना अपराध है। राज्य सरकार इसे और सख्त करने के लिए नया मसौदा तैयार कर रही है, जिसमें धर्म परिवर्तन से पहले और बाद में घोषणा और सत्यापन की प्रक्रिया को अनिवार्य किया जाएगा। राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 19 सीटों पर ईसाई मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। जशपुर जैसे जिलों में चुनावी परिणामों पर ईसाई मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक माना जाता है।

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बिरगांव में माँ परमेश्वरी की प्रतिमा का भव्य आगमन | देवांगन समाज का ऐतिहासिक उत्सव

दिनांक 15 जनवरी 2026, गुरुवार, शाम 5:00 बजे,देवांगन (कोस्टा) समाज की कुलदेवी माँ परमेश्वरी जी की नई प्रतिमा का भव्य आगमन बिरगांव में होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ का देवांगन (कोस्टा) समाज एक संगठित, परिश्रमी और जागरूक समाज है, जो परंपरागत रूप से वस्त्र उद्योग (बुनकर) एवं व्यापार-व्यवसाय से जुड़ा रहा है।यह समाज दहेज प्रथा, नशामुक्ति, शिक्षा और सामाजिक एकता के लिए निरंतर सक्रिय रहा है तथा माँ परमेश्वरी को अपनी इष्ट एवं कुलदेवी मानता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित नगर निगम बिरगांव में वर्ष 1991 में कोस्टा समाज द्वारा एक छोटे मंदिर का निर्माण कर माँ परमेश्वरी की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिससे इस क्षेत्र में आस्था की नींव पड़ी। लगभग 35 वर्षों के पश्चात, अब देवांगन (कोस्टा) समाज के सहयोग से करीब 75 लाख रुपये की लागत से भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण हो चुका है।माँ परमेश्वरी की संगमरमर से निर्मित दिव्य प्रतिमा राजस्थान के जयपुर से लाई जा रही है, जिसकी अनुमानित लागत ₹2,11,000 बताई जा रही है। 6 गाँवों से मिलकर बने नगर निगम बिरगांव में देवांगन समाज की कुल जनसंख्या 35,000 से अधिक है।अब वह पावन क्षण निकट है, जब माँ परमेश्वरी जी बिरगांव के हृदय स्थल बुधवारी बाजार स्थित अपने भव्य मंदिर में विराजमान होंगी। बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर, देवांगन (कोस्टा) समाज द्वारा तीन दिवसीय “परमेश्वरी महोत्सव” का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें समाज के लोग आस्था, श्रद्धा और एकता के साथ भाग लेंगे। माँ परमेश्वरी के आगमन से पूरा बिरगांव भक्तिमय हो उठा है।हर ओर जयकारे, भक्ति, विश्वास और उल्लास का वातावरण देखने को मिल रहा है।

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डिप्टी सीएम अरुण साव पर टिप्पणी को लेकर भूपेश बघेल घिरे, साहू समाज ने जताया विरोध, 10 दिन में माफी की मांग

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा उप मुख्यमंत्री अरुण साव को लेकर की गई विवादित टिप्पणी के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। भूपेश बघेल के बयान से साहू समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है। समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे अपमानजनक बताते हुए पूर्व मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की है। बिलासपुर में साहू समाज ने इस मामले को लेकर एसएसपी कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई है। समाज ने चेतावनी दी है कि यदि भूपेश बघेल ने 10 दिनों के भीतर माफी नहीं मांगी, तो प्रदेशव्यापी उग्र आंदोलन किया जाएगा। जंगल की कहानी से कसा था तंज दरअसल, बिलासपुर दौरे के दौरान भूपेश बघेल ने एक कथित उदाहरण देते हुए उप मुख्यमंत्री अरुण साव पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि जंगल में राजा चुनने की प्रक्रिया में सभी जानवरों ने मिलकर बंदर को राजा बना दिया। यह टिप्पणी सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से वायरल हुई, जिसे साहू समाज ने सीधे तौर पर अरुण साव का अपमान बताया। बयान सामने आने के बाद प्रदेश के कई जिलों में साहू समाज के लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रदर्शन किए और कुछ जगहों पर पुतला दहन भी किया गया। 29 दिसंबर को बिलासपुर में दिया गया था बयान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 29 दिसंबर 2025 को बिलासपुर के लिंगियाडीह क्षेत्र पहुंचे थे। यहां वे बस्ती हटाने के विरोध में चल रहे आंदोलन के समर्थन में शामिल हुए थे। इसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उप मुख्यमंत्री अरुण साव और विधायक अमर अग्रवाल पर तीखी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने लिंगियाडीह क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे और स्थानीय लोगों से आंदोलन जारी रखने की अपील की थी। इसी भाषण के दौरान उन्होंने अरुण साव को लेकर विवादित टिप्पणी की, जिसे अब समाज विशेष के अपमान के रूप में देखा जा रहा है। जशपुर में सौंपा गया ज्ञापन जशपुर जिले में भी साहू समाज ने पूर्व मुख्यमंत्री के बयान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। समाज के प्रतिनिधियों ने जशपुरनगर में एसएसपी शशि मोहन सिंह को ज्ञापन सौंपते हुए 10 दिनों के भीतर माफी की मांग की है। जिला साहू संघ के अध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता ने कहा कि उप मुख्यमंत्री अरुण साव साहू समाज के प्रतिनिधि हैं और एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। ऐसे में उनके खिलाफ इस तरह की टिप्पणी न केवल व्यक्तिगत बल्कि पूरे समाज का अपमान है। सक्ती जिले में भी आक्रोश सक्ती जिले में भी 5 जनवरी को जिला साहू संघ ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई की मांग की। जिला अध्यक्ष डॉ. खिलावन साहू ने प्रेस वार्ता में कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री की टिप्पणी असंवेदनशील और निंदनीय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहू समाज अपनी गरिमा से समझौता नहीं करेगा और यदि माफी नहीं मांगी गई तो संगठित रूप से आंदोलन किया जाएगा।

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