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दुर्ग में गंदे पानी से पीलिया फैला: उतई नगर पंचायत के 2 वार्ड प्रभावित, हैंडपंप बंद कर भेजे गए पानी के सैंपल

दुर्ग।छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की नगर पंचायत उतई में दूषित पानी पीने से पीलिया (जॉन्डिस) फैलने का मामला सामने आया है। वार्ड क्रमांक 14 और 15 में बीते करीब एक महीने से लगातार मरीज मिल रहे हैं, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि नालियों में जमा गंदे पानी की वजह से घरों और सार्वजनिक हैंडपंपों का जल स्रोत दूषित हो गया, जिसके बाद बदबूदार पानी की शिकायतें मिलने लगीं। शुरुआत में कुछ परिवारों ने इसे व्यक्तिगत समस्या समझा, लेकिन धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले में एक जैसे लक्षण नजर आने लगे। हैंडपंप और बोरिंग का पानी बना बीमारी की वजह सूचना मिलने पर स्वास्थ्य विभाग की टीम मौके पर पहुंची और करीब 20 मरीजों के घरों में जाकर जांच की। जांच के दौरान पाया गया किअधिकांश परिवार हैंडपंप या बोरिंग के पानी का उपयोग कर रहे थे। एहतियातन वार्ड में मौजूद एक सार्वजनिक हैंडपंप को तुरंत बंद कर दिया गया है। साथ ही सभी संदिग्ध जलस्रोतों से पानी के नमूने लेकर लैब भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। एक ही वार्ड में मिले 12 मरीज जानकारी के अनुसार, वहीं वार्ड 14 में पहले 12 मरीज सामने आए थे, लेकिन स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि सभी मरीज अब स्वस्थ हैं। यहां एक बोरिंग को संदिग्ध मानते हुए तुरंत बंद कर दिया गया। बीएमओ और डॉक्टरों की टीम ने किया घर-घर निरीक्षण बीएमओ डॉ. देवेंद्र बेलचंदन ने बताया किडॉक्टरों की टीम ने प्रभावित वार्डों के घरों में जाकर स्थिति का आकलन किया है।हालांकि हाल ही में दो घरों में हल्के लक्षण दिखे थे, लेकिन उनकी हालत फिलहाल सामान्य है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से किया गया है। लोगों को केवल उबला हुआ पानी पीने की सख्त सलाह दी गई है। हैंडपंप बंद, टैंकर से हो रही पानी की सप्लाई सुरक्षा के लिहाज से प्रभावित इलाकों में इसके साथ ही का काम भी तेज कर दिया गया है। नगर पंचायत के मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेंद्र नायक ने बताया कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरती जाएगी। पानी के सैंपल जांच में, स्थिति नियंत्रण में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया किप्रभावित घरों के सभी पानी के सैंपल जांच के लिए भेज दिए गए हैं।फिलहाल हालात नियंत्रण में हैं, लेकिन वार्ड 14 और 15 में निगरानी लगातार जारी है।

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मौसम बदलते ही बीमारियां बढ़ीं: रायपुर में रोज 600 से ज्यादा वायरल और सर्दी-खांसी के मरीज, डॉक्टरों की चेतावनी

रायपुर।मौसम में अचानक आए बदलाव का सीधा असर अब लोगों की सेहत पर दिखने लगा है। राजधानी रायपुर के सरकारी और निजी अस्पतालों में पिछले कुछ दिनों से वायरल फीवर, सर्दी और खांसी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। हालात यह हैं कि शहर में हर दिन 600 से अधिक मरीज वायरल जैसे लक्षणों के साथ इलाज के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार कई मरीजों में बीमारी ठीक होने के बाद 2–3 दिन के भीतर दोबारा बुखार लौट रहा है, जो सामान्य वायरल से अलग संकेत माना जा रहा है। 🏥 चार दिनों में अस्पतालों पर बढ़ा दबाव पिछले चार दिनों के आंकड़ों के मुताबिक, रायपुर के अलग-अलग अस्पतालों में रोज औसतन इतने मरीज पहुंच रहे हैं: अस्पतालों में ओपीडी का लोड लगातार बढ़ रहा है। 🔁 ठीक होने के बाद फिर लौट रहा बुखार डॉक्टरों का कहना है कि इस बार वायरल का पैटर्न अलग नजर आ रहा है।अधिकतर मामलों में: इस वजह से मरीज लंबे समय तक थकान और चक्कर की शिकायत कर रहे हैं। ⚠️ 3 दिन बाद दोबारा बुखार आए तो तुरंत डॉक्टर से मिलें डॉक्टरों की सलाह है कि यदि तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और जरूरी जांच कराएं। 💊 बिना जांच दवा लेना हो सकता है खतरनाक मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मिथिलेश चौधरी ने बताया किमौसम में उतार-चढ़ाव, बढ़ता प्रदूषण और कमजोर इम्यूनिटी के कारण वायरल और बुखार के मामलों में तेजी आई है। उन्होंने कहा कि कई मरीजों में डेंगू और मलेरिया जैसे लक्षण भी देखे जा रहे हैं।ऐसे में बिना ब्लड जांच, प्लेटलेट काउंट और अन्य जरूरी टेस्ट कराए दवा लेना नुकसानदायक हो सकता है। 🦠 ऐसे पहचानें नया वायरल फीवर ✅ बचाव के जरूरी उपाय डॉक्टरों का कहना है कि लापरवाही इस वायरल को गंभीर और लंबा बना सकती है, इसलिए शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें।

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रायपुर में मिलावटी पनीर पर बड़ी कार्रवाई: 1700 किलो पनीर जब्त, सैंपल जांच के लिए भेजे गए

रायपुर।छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मिलावटी और अस्वास्थ्यकर पनीर के खिलाफ खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने बड़ी कार्रवाई की है। प्रशासन ने भाठागांव क्षेत्र से 1700 किलो लूज पनीर जब्त किया है, जो खुले और गंदे हालात में रखा गया था। जब्त पनीर की अनुमानित कीमत करीब 4.76 लाख रुपये बताई जा रही है। यह कार्रवाई खाद्य एवं औषधि प्रशासन के नियंत्रक दीपक कुमार अग्रवाल (आईएएस) के निर्देश पर चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत की गई। 🧪 अस्वच्छ हालत में हो रहा था पनीर का निर्माण 7 जनवरी 2026 कोफूड विभाग के अधिकारी विनोद कुमार गुप्ता के नेतृत्व में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की टीम नेभाठागांव स्थित मेसर्स के.एल.पी. डेयरी एवं मिल्क प्रोडक्ट का निरीक्षण किया। जांच के दौरान पाया गया कि टीम ने मौके से भारी मात्रा में पनीर जब्त कर लिया और उसके नमूने प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गए हैं। साथ ही संबंधित फर्म को सुधार नोटिस भी जारी किया गया है। 📊 2025 में 9700 किलो नकली पनीर और खोवा हुआ था जब्त खाद्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार,जनवरी 2025 से अब तक अमानक पाए जाने पर इन सभी खाद्य पदार्थों को नष्ट कराया गया।अब तक इस मामले में 10 प्रकरण न्यायालय में पेश किए जा चुके हैं, जिन पर सुनवाई जारी है। 📞 जनता से अपील, जारी रहेगी सख्ती खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने आम नागरिकों से अपील की है किअगर कहीं भी मिलावटी या संदिग्ध खाद्य पदार्थ बिकने की जानकारी मिले,तो तुरंत हेल्पलाइन नंबर 9340597097 पर शिकायत दर्ज कराएं। अधिकारियों ने साफ किया है कि पर आगे भी लगातार और सख्त कार्रवाई की जाती रहेगी।

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खारून नदी में बिना ट्रीटमेंट छोड़ा जा रहा औद्योगिक गंदा पानी, बीरगांव की जल आपूर्ति पर बड़ा संकट

रायपुर।खारून नदी लगातार प्रदूषण की चपेट में आती जा रही है। कारा क्षेत्र में स्थित सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हुए उरला औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला केमिकल युक्त और जहरीला पानी बिना किसी शुद्धिकरण के सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि बीरगांव नगर निगम की पेयजल व्यवस्था पर सीधा खतरा मंडराने लगा है। जानकारी के अनुसार, कारा एसटीपी में पिछले कई महीनों से ट्रीटमेंट सिस्टम लगभग बंद पड़ा है। मशीनें निष्क्रिय हैं, फिल्टर काम नहीं कर रहे और दूषित पानी नालियों व खुली पाइप लाइनों के माध्यम से सीधे खारून नदी में बहाया जा रहा है। निरीक्षण के दौरान ट्रीटमेंट टैंकों के आसपास काले रंग का झाग, तेज दुर्गंध और केमिकल युक्त पानी जमा पाया गया। मंगलवार को बीरगांव नगर निगम के महापौर नंदलाल देवांगन, निगम आयुक्त युगल किशोर उर्वशा और अधिकारियों की टीम ने कारा स्थित एसटीपी का निरीक्षण किया। मौके पर कई पाइपलाइनें सीधे नदी की ओर खुली मिलीं, जिनसे बिना ट्रीटमेंट किया गया गंदा पानी लगातार बह रहा था। इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए महापौर ने इसे जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ बताया और तत्काल सुधार के निर्देश दिए। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि एसटीपी से कुछ ही दूरी पर बीरगांव नगर निगम का इंटकवेल स्थित है, जहां से हजारों घरों में पीने का पानी सप्लाई किया जाता है। खारून नदी में मिल रहा यह जहरीला पानी भू-जल को भी प्रभावित कर सकता है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो क्षेत्र में जल जनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसी आशंका को देखते हुए महापौर और निगम आयुक्त ने बेंद्री स्थित इंटकवेल का भी निरीक्षण किया और अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि किसी भी हालत में दूषित पानी जल स्रोत तक न पहुंचने पाए। गौरतलब है कि कारा एसटीपी का संचालन नगर निगम रायपुर के अधीन है, जबकि इसका सीधा असर बीरगांव नगर निगम क्षेत्र पर पड़ रहा है। दोनों निकायों के बीच जिम्मेदारी तय न होने से हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। निरीक्षण के दौरान एमआईसी सदस्य इकराम अहमद, संतोष साहू, कार्यपालन अभियंता डी.एल. देवांगन सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। महापौर नंदलाल देवांगन ने कहा कि इस पूरे मामले की जानकारी रायपुर कलेक्टर को दी जाएगी और दोषी अधिकारियों व एजेंसियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की जाएगी।

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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: कब तक लोग परेशानी झेलेंगे, स्कूल-कोर्ट परिसर में इनकी जरूरत क्या?

आवारा कुत्तों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। अदालत ने सवाल उठाया कि कुत्तों की वजह से आम लोगों को आखिर कब तक परेशानी झेलनी पड़ेगी। कोर्ट ने साफ किया कि उसका निर्देश सड़कों पर नहीं, बल्कि केवल संस्थागत परिसरों जैसे स्कूल, अस्पताल और अदालतों के लिए है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों की सुरक्षा प्राथमिकता है। ऐसे में यह समझ से परे है कि स्कूलों, अस्पतालों और कोर्ट कैंपस के भीतर आवारा कुत्तों की मौजूदगी क्यों जरूरी मानी जा रही है और इन्हें वहां से हटाने पर आपत्ति क्यों की जा रही है। बुधवार को यह सुनवाई करीब ढाई घंटे तक चली। मामले की अगली सुनवाई 8 जनवरी को सुबह 10:30 बजे फिर से शुरू होगी। सुनवाई के दौरान सामने आईं अहम बातें अदालत का स्पष्ट रुख सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि उसका आदेश केवल संस्थागत क्षेत्रों तक सीमित है और इसका उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि नियमों का सही ढंग से पालन नहीं हुआ, तो इस मुद्दे पर और सख्त रुख अपनाया जा सकता है।

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जिला अस्पतालों में चार गुना बढ़ेगा दवाओं का स्टॉक, अब गांव के अस्पतालों में भी मिलेंगी शुगर-थायराइड की दवाएं

राज्य सरकार ने ग्रामीण और जिला स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा फैसला लिया है। अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में सर्दी-जुकाम, बुखार और उल्टी-दस्त के साथ-साथ शुगर, थायराइड और खून पतला करने वाली दवाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। अभी तक ये दवाएं केवल जिला अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों में ही मिलती थीं, जिससे ग्रामीण मरीजों को बार-बार शहर जाना पड़ता था। स्वास्थ्य विभाग ने आवश्यक दवाओं की सूची में बड़ी बढ़ोतरी की है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं की संख्या 146 से बढ़ाकर 247 कर दी गई है, जबकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में यह संख्या 196 से बढ़कर 365 हो जाएगी। इससे गांवों में रहने वाले मरीजों को अपने ही क्षेत्र में बेहतर इलाज मिल सकेगा। जिला अस्पतालों में 208 से बढ़कर 807 होंगी दवाएं जिला अस्पतालों में भी दवाओं के स्टॉक में बड़ा इजाफा किया गया है। वर्तमान में जहां जिला अस्पतालों में 208 प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं, वहीं अब इनकी संख्या बढ़ाकर 807 की जा रही है। इसका मतलब यह है कि जो दवाएं अब तक केवल मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में मिलती थीं, वे सुविधा अब जिला अस्पतालों में भी मरीजों को मिलेंगी। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती होने के बावजूद दवाओं की कमी के कारण गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता था। दवाओं की उपलब्धता बढ़ने से अब अधिकतर मरीजों का इलाज जिला अस्पतालों में ही संभव हो सकेगा, जिससे मेडिकल कॉलेजों पर मरीजों का दबाव भी कम होगा। केंद्र सरकार के निर्देशों के तहत लिया गया फैसला यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए इंडियन प्राइमरी हेल्थ सिस्टम के तहत लिया गया है। इस प्रणाली के अनुसार गांव-गांव के अस्पतालों में अधिकतम दवाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। राज्य सरकार ने इसी दिशा में कदम उठाते हुए ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थानों में दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने का फैसला किया है। उप स्वास्थ्य केंद्रों में भी बढ़ेंगी सुविधाएं अब उप स्वास्थ्य केंद्रों में भी केवल सामान्य दवाओं तक सीमित व्यवस्था नहीं रहेगी। यहां 146 प्रकार की दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जिनमें एंटीबायोटिक और दर्द निवारक इंजेक्शन भी शामिल होंगे। इससे उप स्वास्थ्य केंद्रों में वही सुविधाएं मिलेंगी, जो अब तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित थीं। सीएचओ देंगे दवाएं, जांच जरूरी राज्य के सभी उप स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO) मरीजों को शुगर और थायराइड जैसी बीमारियों की दवाएं देंगे। हालांकि, मरीज को कम से कम एक बार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराना अनिवार्य होगा। ग्रामीण मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत स्वास्थ्य संचालक संजीव झा ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में दवाओं की कमी से मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। अब गंभीर बीमारियों की दवाएं नजदीक मिलने से मरीजों को राहत मिलेगी। इस नई व्यवस्था की नियमित समीक्षा भी की जाएगी और यदि कोई कमी सामने आती है तो उसे दूर किया जाएगा, ताकि यह सिस्टम बेहतर तरीके से काम कर सके।

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छत्तीसगढ़ में पहली बार सामने आया दुर्लभ मामला: ब्रश करते समय फट गई गर्दन की नस, 6 घंटे की जटिल सर्जरी से बची जान

छत्तीसगढ़ की राजधानी में मेडिकल साइंस का एक अत्यंत दुर्लभ मामला सामने आया है। यहां 40 वर्षीय युवक की गर्दन की प्रमुख धमनी कैरोटिड आर्टरी अचानक फट गई। हैरानी की बात यह रही कि यह घटना किसी दुर्घटना या बीमारी से नहीं, बल्कि साधारण रूप से ब्रश करते समय हल्का स्ट्रेन पड़ने से हुई। घटना के दौरान युवक को अचानक गले में तेज दर्द हुआ और गर्दन तेजी से सूजने लगी। कुछ ही देर में उसकी हालत बिगड़ गई और वह बेहोश हो गया। परिजन उसे तुरंत मेकाहारा अस्पताल के इमरजेंसी विभाग लेकर पहुंचे। प्राथमिक जांच के बाद मरीज को हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग में रेफर किया गया। जांच में सामने आई गंभीर स्थिति डॉक्टरों ने मरीज की तत्काल सीटी एंजियोग्राफी कराई, जिसमें पता चला कि उसकी दाईं कैरोटिड आर्टरी फट चुकी है और उसके आसपास गुब्बारे जैसी संरचना बन गई है। इस स्थिति को कैरोटिड आर्टरी स्यूडोएन्युरिज्म कहा जाता है, जिसमें कुछ ही मिनटों में मरीज की जान जा सकती है। डॉक्टरों के अनुसार यह मामला स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी रप्चर का है, जो पूरी दुनिया में अब तक गिने-चुने मामलों में दर्ज किया गया है। यह दुनिया का लगभग 10वां और छत्तीसगढ़ का पहला मामला बताया जा रहा है। हर पल जोखिम भरा था ऑपरेशन मरीज को बचाने के लिए डॉक्टरों ने बिना देरी किए सर्जरी का फैसला लिया। ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती गर्दन में अत्यधिक रक्तस्राव के कारण फटी धमनी को पहचानना था। जरा सी चूक से स्ट्रोक या ब्रेन डेड होने का खतरा बना हुआ था। करीब 6 घंटे तक चली अत्यंत जटिल सर्जरी में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बोवाइन पेरिकार्डियम पैच की मदद से धमनी की सफल मरम्मत की गई। राहत की बात यह रही कि सर्जरी के बाद मरीज को लकवे का कोई लक्षण नहीं हुआ और अब वह पूरी तरह स्वस्थ है। डॉक्टरों की टीम ने रचा मेडिकल इतिहास इस सफल ऑपरेशन का नेतृत्व मुख्य सर्जन डॉ. कृष्णकांत साहू ने किया। टीम में कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डॉ. संकल्प दीवान, डॉ. बालस्वरूप साहू, जूनियर डॉक्टर आयुषी, अंशिका, ख्याति, आकांक्षा साहू, डॉ. संजय, डॉ. ओमप्रकाश समेत नर्सिंग स्टाफ और तकनीशियन शामिल रहे। सभी के समन्वित प्रयास से मरीज को नई जिंदगी मिल सकी। क्या है स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी रप्चर? कैरोटिड आर्टरी गर्दन की मुख्य धमनी होती है, जो हृदय से मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाती है। सामान्यतः यह धमनी दुर्घटना, संक्रमण, कनेक्टिव टिश्यू डिसऑर्डर या एथेरोस्क्लेरोसिस के कारण फटती है। लेकिन बिना किसी स्पष्ट कारण के इसका फटना मेडिकल दुनिया में बेहद दुर्लभ माना जाता है और यह जानलेवा हो सकता है।

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अम्बेडकर अस्पताल रायपुर में चमत्कारी इलाज, छाती के दुर्लभ कैंसर से 29 वर्षीय युवक की जान बची

डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय, रायपुर ने चिकित्सा क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध इस अस्पताल के कैंसर सर्जरी विभाग ने छाती के एक दुर्लभ और जटिल कैंसर का सफल ऑपरेशन कर 29 वर्षीय युवक की जान बचाई है। मरीज छाती में गांठ, सांस लेने में गंभीर परेशानी और लगातार दर्द की शिकायत के साथ अस्पताल पहुंचा था। जांच में सामने आया कि वह मेडियास्टाइनल जर्म सेल ट्यूमर नामक दुर्लभ कैंसर से पीड़ित है, जो छाती के मध्य भाग में विकसित होता है। कैंसर सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. आशुतोष गुप्ता ने बताया कि मरीज का पहले इलाज एम्स रायपुर के कैंसर विभाग में चल रहा था। बायोप्सी रिपोर्ट में कैंसर की पुष्टि होने के बाद प्रारंभिक जांच में ट्यूमर का आकार करीब 13×18×16 सेंटीमीटर पाया गया, जो हृदय के पास स्थित बड़ी रक्त नलिकाओं से जुड़ा हुआ था। अत्यधिक जोखिम को देखते हुए पहले कीमोथेरेपी देने का निर्णय लिया गया। जनवरी 2025 से जून 2025 तक मरीज को छह चक्र कीमोथेरेपी दी गई, जिससे ट्यूमर का आकार घटकर 4×3×4 सेंटीमीटर रह गया। इसके बाद मरीज को आगे के उपचार के लिए अम्बेडकर अस्पताल रायपुर रेफर किया गया। सभी रिपोर्टों की गहन जांच के बाद डॉ. गुप्ता की टीम ने सर्जरी का निर्णय लिया। ट्यूमर की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए हृदय सर्जरी विभाग और निश्चेतना विभाग से परामर्श लेकर ऑपरेशन किया गया। लगभग 3 से 4 घंटे तक चले इस जटिल ऑपरेशन में ट्यूमर को बाएं फेफड़े के एक हिस्से सहित सफलतापूर्वक निकाल दिया गया। सर्जरी पूरी तरह सफल रही और कुछ दिनों के उपचार के बाद मरीज को स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। फिलहाल मरीज नियमित फॉलोअप के लिए अस्पताल आ रहा है। इस सफल ऑपरेशन में डॉ. आशुतोष गुप्ता, डॉ. के. के. साहू, डॉ. किशन सोनी, डॉ. गुंजन अग्रवाल, डॉ. सुश्रुत अग्रवाल, डॉ. समृद्ध, डॉ. लावण्या, डॉ. सोनम और डॉ. अनिल की अहम भूमिका रही। विशेषज्ञों के अनुसार, मेडियास्टाइनल जर्म सेल ट्यूमर एक दुर्लभ कैंसर है, जो आमतौर पर 20 से 40 वर्ष की आयु के पुरुषों में पाया जाता है। इसके प्रमुख लक्षणों में खांसी, सांस लेने में परेशानी और छाती में दर्द शामिल हैं। समय पर पहचान और सही इलाज होने पर इस कैंसर में पांच साल की सर्वाइवल दर 90 प्रतिशत से अधिक रहती है।

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6 माह की गर्भवती रेप पीड़िता को गर्भपात की अनुमति, हाईकोर्ट ने कहा— पीड़िता को अपने भविष्य का निर्णय लेने का अधिकार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने दुष्कर्म की शिकार एक नाबालिग किशोरी को गर्भपात कराने की अनुमति प्रदान की है। जस्टिस पी.पी. साहू ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शीतकालीन अवकाश के दौरान विशेष सुनवाई कर यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर रायपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल और पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज को निर्देश दिया है कि 23 दिसंबर को विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में पीड़िता का सुरक्षित गर्भपात कराया जाए। साथ ही अदालत ने भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए हैं। शादी का झांसा देकर किया गया दुष्कर्म मामला रायपुर जिले का है, जहां 16 वर्षीय नाबालिग लड़की को आरोपी युवक ने प्रेम जाल में फंसाकर शादी का वादा किया और उसके साथ दुष्कर्म किया। परिजनों को तब शक हुआ जब किशोरी के पेट का आकार असामान्य रूप से बढ़ने लगा। पूछताछ करने पर पीड़िता ने आपबीती बताई। इसके बाद परिजन उसे चिकित्सक के पास ले गए, जहां जांच में सामने आया कि किशोरी करीब 25 सप्ताह (6 महीने) की गर्भवती है। मेडिकल रिपोर्ट के बाद कोर्ट पहुंचा मामला पीड़िता की ओर से परिजनों के माध्यम से हाईकोर्ट में गर्भपात की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की गई। कोर्ट ने 19 दिसंबर को बीआर अंबेडकर अस्पताल और जेएनएम मेडिकल कॉलेज को मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि गर्भपात की प्रक्रिया से पीड़िता को कोई गंभीर चिकित्सकीय खतरा नहीं है। अवकाश में भी हुई सुनवाई, कोर्ट ने दी राहत रिपोर्ट आने के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने शीतकालीन अवकाश के बावजूद विशेष बेंच गठित कर सुनवाई की। सुनवाई के बाद अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए गर्भपात की अनुमति प्रदान कर दी। हाईकोर्ट की टिप्पणी— पीड़िता को मिले निर्णय की स्वतंत्रता हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दुष्कर्म पीड़िता को यह अधिकार और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वह स्वयं तय करे कि गर्भावस्था को जारी रखना है या समाप्त करना है। अदालत ने इसे पीड़िता के जीवन और भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्णय बताया। विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में होगा गर्भपात कोर्ट ने निर्देश दिया है कि गर्भपात की प्रक्रिया मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 के तहत की जाए। यह प्रक्रिया दो पंजीकृत चिकित्सकों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में संपन्न होगी। इसके साथ ही, भविष्य की जांच और ट्रायल को ध्यान में रखते हुए भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं। पीड़िता को निर्धारित तिथि पर अस्पताल में उपस्थित होकर सभी औपचारिकताएं पूरी करने को कहा गया है।

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9 साल की बच्ची की आंख से दिमाग तक घुसी घंटी: रायपुर डीकेएस अस्पताल में 4 घंटे चला ऑपरेशन, डॉक्टरों ने बचाई आंख और जान

रायपुर के डीकेएस सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में डॉक्टरों ने दिवाली की रात एक चमत्कारिक सर्जरी की। बिलासपुर की 9 साल की काव्या की आंख से होते हुए दिमाग तक घुसी घंटी का हैंडल डॉक्टरों ने सावधानीपूर्वक निकालकर न सिर्फ उसकी जान बचाई, बल्कि उसकी आंख की रोशनी भी बरकरार रखी। घटना बिलासपुर के सिविल लाइन इलाके की है। दिवाली के दिन खेलते-खेलते काव्या मुंह के बल गिर गई। जिस घंटी से वह खेल रही थी, उसका ऊपरी सिरा बाईं आंख में घुसकर सीधा दिमाग तक जा पहुंचा। बच्ची की चीख सुनकर परिजन दौड़े और उसे तुरंत सिम्स बिलासपुर ले गए। जांच में पता चला कि घंटी की नुकीली नोक आंख की हड्डी पार कर दिमाग में लगभग 5 सेंटीमीटर तक फंसी हुई है। स्थिति गंभीर थी, इसलिए डॉक्टरों ने तुरंत रायपुर के डीकेएस अस्पताल रेफर कर दिया। दिवाली की रात इमरजेंसी में न्यूरोसर्जन डॉ. राजीव साहू और उनकी टीम—डॉ. लवलेश राठौड़, डॉ. नमन चंद्राकर, डॉ. प्रांजल मिश्रा और डॉ. देवश्री—ने 4 घंटे तक चले ऑपरेशन में बच्ची को बचाने की जद्दोजहद की। ऑपरेशन एंडोस्कोपिक तकनीक से किया गया ताकि दिमाग के ऊत्तकों को नुकसान न पहुंचे। भौंह के ऊपर से छोटा चीरा लगाकर डॉक्टरों ने धीरे-धीरे घंटी का हिस्सा बाहर निकाला। सर्जरी के बाद जब बच्ची ने दोनों आंखों से साफ देखा और मुस्कुराई, तो ओटी में मौजूद सभी डॉक्टरों ने राहत की सांस ली। डॉक्टरों के अनुसार, यह प्रदेश में अपनी तरह का पहला केस है, जिसमें आंख के रास्ते दिमाग तक घुसे मेटल ऑब्जेक्ट को सफलतापूर्वक निकाला गया। बच्ची फिलहाल सुरक्षित है और अस्पताल में निगरानी में है।

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