छत्तीसगढ़ में रविवार को ही क्यों बढ़ते हैं हिंदू-ईसाई टकराव?
पिछले 5 साल में 200 से ज्यादा विवाद, 19 जिले प्रभावित, बस्तर बना हॉटस्पॉट छत्तीसगढ़ में हिंदू और ईसाई समुदाय के बीच टकराव की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इन घटनाओं में एक समान पैटर्न देखने को मिलता है—धर्मांतरण, मतांतरण और प्रार्थना सभाएं। खास बात यह है कि अधिकांश विवाद रविवार के दिन ही होते हैं। इसी आशंका को देखते हुए पुलिस और प्रशासन शुक्रवार व शनिवार से ही हाई अलर्ट पर रहता है। भास्कर डिजिटल की पड़ताल में सामने आया कि बीते 5 वर्षों में प्रदेश में हिंदू-ईसाई समुदायों के बीच 200 से अधिक विवाद दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में 60 से ज्यादा FIR हुई हैं। सबसे ज्यादा टकराव बस्तर संभाग सहित 19 जिलों में देखने को मिला है। इन घटनाओं में कांकेर में शव दफनाने को लेकर हिंसा, दुर्ग रेलवे स्टेशन से मिशनरी सिस्टर्स की गिरफ्तारी, रायपुर में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप, बिलासपुर में प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण जैसे कई मामले शामिल हैं। किन जिलों में सबसे ज्यादा विवाद छत्तीसगढ़ में ईसाई समाज की गतिविधियां 19 जिलों में अधिक सक्रिय बताई जाती हैं। इन इलाकों में चर्च और प्रार्थना सभाएं संचालित होती हैं, जिनमें कुछ पंजीकृत हैं तो कई घरों से संचालित हो रही हैं। इसी को लेकर धर्मांतरण और मतांतरण के आरोपों पर विवाद की स्थिति बनती है। सबसे ज्यादा तनाव बस्तर संभाग में देखने को मिला है। बस्तर, कोंडागांव, नारायणपुर, कांकेर और सुकमा जिले धर्मांतरण और अंतिम संस्कार (दफनाने) से जुड़े विवादों के प्रमुख केंद्र रहे हैं। इसके अलावा कोरबा, बलरामपुर, महासमुंद, दुर्ग और बिलासपुर में भी बार-बार टकराव हुआ है। वहीं सरगुजा और सूरजपुर में अपेक्षाकृत कम विवाद सामने आए हैं। रविवार को ही क्यों होती हैं घटनाएं दरअसल, रविवार को ईसाई समुदाय की प्रार्थना सभाएं आयोजित होती हैं। इनमें यीशु मसीह की आराधना, धार्मिक उपदेश और कथाएं सुनाई जाती हैं। इन सभाओं में कई बार हिंदू समुदाय के लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है। अनेक मामलों में जब हिंदू संगठनों को इन सभाओं में धर्मांतरण की आशंका होती है, तो वे विरोध दर्ज कराने पहुंचते हैं। इसी दौरान दोनों पक्ष आमने-सामने आ जाते हैं और तनाव की स्थिति बन जाती है। कई बार पुलिस को अतिरिक्त बल तैनात कर हालात संभालने पड़ते हैं। वरिष्ठ पत्रकार की राय वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार का कहना है कि हर रविवार को स्वतः दो समुदायों के बीच टकराव होना कहना सही नहीं है। उनके अनुसार, कुछ आक्रामक समूहों द्वारा दूसरे समुदायों की प्रार्थना सभाओं पर हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को स्वयं कानून के तहत कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि हालात न बिगड़ें। पिछले वर्षों की प्रमुख घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, बालोद और कांकेर जैसे जिलों में धर्मांतरण, प्रार्थना सभा, अवैध चर्च और अंतिम संस्कार को लेकर कई बड़े विवाद हुए। कई मामलों में पुलिस ने गिरफ्तारी की, FIR दर्ज हुई और प्रशासनिक कार्रवाई भी की गई। धर्मांतरण और मतांतरण क्या है धर्मांतरण का अर्थ है एक धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाना। छत्तीसगढ़ में इसके लिए जिला प्रशासन को पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।मतांतरण में व्यक्ति अपने विश्वास और आस्था में बदलाव करता है, लेकिन इसका सरकारी रिकॉर्ड आवश्यक नहीं होता। छत्तीसगढ़ का धार्मिक स्वतंत्रता कानून प्रदेश में छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 लागू है। इसके तहत जबरन, प्रलोभन या धोखे से धर्मांतरण कराना अपराध है। राज्य सरकार इसे और सख्त करने के लिए नया मसौदा तैयार कर रही है, जिसमें धर्म परिवर्तन से पहले और बाद में घोषणा और सत्यापन की प्रक्रिया को अनिवार्य किया जाएगा। राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 19 सीटों पर ईसाई मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। जशपुर जैसे जिलों में चुनावी परिणामों पर ईसाई मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक माना जाता है।
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