सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 28 मार्च 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 28 मार्च 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के निर्देशानुसार तीन सदस्यीय इन-हाउस समिति द्वारा इस मामले की जांच चल रही है, और वर्तमान में न्यायालय का हस्तक्षेप अनुचित होगा। याचिकाकर्ता, अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्पारा, ने तर्क दिया कि न्यायाधीशों को नियमित आपराधिक जांच से छूट नहीं दी जानी चाहिए और पुलिस को स्वतंत्र रूप से जांच करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने 1991 के के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी चुनौती दी, जिसमें उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने से पहले मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने की आवश्यकता होती है। यह मामला 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लगने की घटना के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी मिलने से शुरू हुआ। आग बुझाने के दौरान फायर ब्रिगेड की टीम ने स्टोर रूम में नोटों की गड्डियां देखीं, जिनमें से कई जल चुकी थीं। इसके बाद, मुख्य न्यायाधीश ने तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. एस. संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल हैं। बाद में, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण इलाहाबाद हाईकोर्ट में करने की सिफारिश की, जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसके अलावा, दिल्ली हाईकोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश, जस्टिस चंद्रधारी सिंह का भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरण किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन-हाउस जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभी विकल्प खुले रहेंगे, और वर्तमान में किसी भी हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है। न्यायालय ने कहा कि इन-हाउस जांच समाप्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश रिपोर्ट की जांच करके एफआईआर दर्ज करने या मामले को संसद को भेजने जैसे निर्णय ले सकते हैं। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय इन-हाउस जांच प्रक्रिया के परिणामों की प्रतीक्षा कर रहा है और उसके बाद ही आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। यह मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति आम जनता की चिंताओं को भी उजागर करता है।
