Raipur

CM विष्णुदेव साय का दावा: G-RAM-G योजना मनरेगा से अधिक प्रभावी, 125 दिन रोजगार और हफ्तेभर में भुगतान

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने विकसित भारत गारंटी के अंतर्गत शुरू की गई रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) – G RAM G योजना को मनरेगा की तुलना में ज्यादा असरदार बताया है। उन्होंने कहा कि नई योजना में न सिर्फ काम के दिन बढ़ाए गए हैं, बल्कि मजदूरी भुगतान को लेकर भी सख्त समय-सीमा तय की गई है। मुख्यमंत्री के अनुसार, जहां मनरेगा में प्रति परिवार 100 दिन के रोजगार की गारंटी थी, वहीं G-RAM-G योजना में यह सीमा बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। इससे ग्रामीण परिवारों को साल में 25 दिन अतिरिक्त रोजगार मिलेगा, जिससे उनकी आमदनी में सीधा लाभ होगा। सीएम ने कहा कि इस योजना का सबसे अहम पहलू यह है कि मजदूरी भुगतान एक सप्ताह के भीतर श्रमिकों के खातों में पहुंचाने का प्रावधान किया गया है। देरी पर मिलेगा अतिरिक्त भुगतान सीएम विष्णुदेव साय ने बताया कि यदि मजदूरी भुगतान में तय समय-सीमा से देरी होती है, तो श्रमिकों को अतिरिक्त राशि दी जाएगी। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि अब भुगतान में अनावश्यक विलंब को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस व्यवस्था से ग्रामीण मजदूरों की आर्थिक असुरक्षा कम होने का दावा किया गया है। खेती के मौसम में योजना अस्थायी रूप से बंद मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि G-RAM-G योजना पूरे साल लागू नहीं रहेगी। भारत और छत्तीसगढ़ को कृषि प्रधान राज्य बताते हुए उन्होंने कहा कि जब खेतों में काम अधिक रहेगा, खासकर धान कटाई के मौसम में, तब यह योजना अस्थायी रूप से बंद की जाएगी। वर्ष में करीब दो महीने योजना लागू नहीं होगी, ताकि किसान और खेतिहर मजदूर कृषि कार्यों में जुट सकें। योजना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज मनरेगा के विकल्प के रूप में लाई गई G-RAM-G योजना को लेकर राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे “नाम बदलने वाली योजना” बताते हुए कहा कि इससे जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। उन्होंने फंडिंग व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पहले मनरेगा की पूरी राशि केंद्र सरकार देती थी, जबकि अब राज्य सरकार को 40 प्रतिशत हिस्सा वहन करना होगा, जिससे योजना के क्रियान्वयन पर संदेह है। क्या है G-RAM-G योजना? G RAM G (विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण) अधिनियम 2025 के तहत शुरू की गई नई ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना है, जिसे मनरेगा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस योजना में— शामिल है। हालांकि, इसमें कृषि सीजन के दौरान लगभग 60 दिनों तक कार्य विराम और फंडिंग पैटर्न में बदलाव का प्रावधान भी रखा गया है। सरकार का दावा है कि इस योजना का लक्ष्य 2047 तक ग्रामीण आय और विकास को नई दिशा देना है।

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रायपुर हेलीपैड के पास मेडिकल वेस्ट का ढेर: सैकड़ों PPE किट खुले में फेंकी गईं, कोरोना काल की खरीद होने की आशंका

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेडिकल वेस्ट के लापरवाह निपटान का एक गंभीर मामला सामने आया है। हेलीपैड के पास स्थित खाली जमीन पर सैकड़ों की संख्या में PPE किट खुले में फेंकी गई हैं। स्थानीय लोगों ने जब मौके पर बड़ी मात्रा में बिखरी PPE किट देखीं, तब इस मामले का खुलासा हुआ। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, ये PPE किट कोरोना महामारी के दौरान खरीदी गई हो सकती हैं। घटनास्थल पर कई किट पैक हालत में तो कुछ खुले और पुराने रूप में पाई गई हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह मेडिकल सामग्री लंबे समय से यहां पड़ी थी, लेकिन हाल के दिनों में इसकी मात्रा अचानक बढ़ गई है। मेडिकल वेस्ट जलाने की भी सूचना स्थानीय लोगों का दावा है कि इनमें से कुछ PPE किट को मेडिकल कचरे के साथ जलाए जाने की भी जानकारी मिली है। यदि यह बात सही पाई जाती है, तो यह पर्यावरण नियमों का गंभीर उल्लंघन है। नियमों के अनुसार, मेडिकल वेस्ट को खुले स्थान पर जलाना प्रतिबंधित है, क्योंकि इससे जहरीली गैसें निकलती हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा होता है। प्रशासनिक निगरानी पर उठे सवाल राजधानी के एक संवेदनशील और हाई-सिक्योरिटी क्षेत्र के पास इस तरह से PPE किट का खुले में पड़ा होना प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। हेलीपैड जैसे महत्वपूर्ण स्थान के नजदीक बड़ी मात्रा में मेडिकल सामग्री का डंप होना सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि ये PPE किट किस विभाग या संस्था से संबंधित हैं। यह भी जांच का विषय है कि यह सरकारी खरीदी का हिस्सा थीं या किसी निजी एजेंसी द्वारा यहां लाकर फेंकी गईं। स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा विशेषज्ञों का कहना है कि PPE किट प्लास्टिक और सिंथेटिक पदार्थों से बनी होती हैं, जिन्हें खुले में छोड़ना या जलाना पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक है। यदि इनमें से कोई किट पहले इस्तेमाल की गई हो, तो संक्रमण फैलने का खतरा भी पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। जांच और कार्रवाई की मांग तेज मामला सामने आने के बाद स्थानीय लोगों ने नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग से तत्काल जांच की मांग की है। लोगों का कहना है कि कोरोना काल की मेडिकल सामग्री को इस तरह खुले में फेंकना या जलाना नियमों के साथ-साथ जनता के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और यह स्पष्ट हो पाता है या नहीं कि सैकड़ों PPE किट आखिर यहां कैसे और किसके निर्देश पर डंप की गईं।

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खरोरा पुलिस की बड़ी कार्रवाई: 4 किलो से अधिक गांजा जब्त, ओडिशा से ला रहे दो अंतरराज्यीय तस्कर गिरफ्तार

नशीले पदार्थों के खिलाफ अभियान के तहत खरोरा पुलिस ने 5 जनवरी को बड़ी कार्रवाई करते हुए 4.256 किलोग्राम गांजा जब्त किया है। इस मामले में दो अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार किया गया है, जो ओडिशा से गांजा लेकर छत्तीसगढ़ आ रहे थे। जब्त सामग्री की कुल कीमत करीब 1.65 लाख रुपए आंकी गई है। पुलिस के अनुसार, मुखबिर से सूचना मिली थी कि ग्राम तुलसी डहरिया निवासी राकेश सिंह ठाकुर एक ओडिशा के गांजा तस्कर के साथ नीले रंग की बिना नंबर वाली स्कूटी से कोसरंगी रोड होते हुए घिवरा पुलिया की ओर आ रहा है। सूचना मिलते ही खरोरा पुलिस टीम ने ग्राम घिवरा नहर पुलिया के पास घेराबंदी कर दी। नुवापाड़ा, ओडिशा का रहने वाला आरोपी कुछ समय बाद एक स्कूटी पर दो युवक आते हुए दिखाई दिए, जिन्हें पुलिस ने मौके पर रोका। पूछताछ में स्कूटी चला रहे युवक ने अपना नाम राकेश सिंह ठाकुर (38 वर्ष) बताया, जबकि पीछे बैठे युवक की पहचान पिंटू सतनामी (21 वर्ष), निवासी भलेसर भूतकायरा, बेलटुकरी, जिला नुवापाड़ा, ओडिशा के रूप में हुई। सफेद प्लास्टिक बैग से मिला गांजा तलाशी के दौरान स्कूटी की डिक्की में रखे सफेद प्लास्टिक के झोले से खाकी टेप से लिपटा गांजा का पैकेट बरामद किया गया। वहीं दूसरे आरोपी पिंटू सतनामी के हाथ में रखे सफेद प्लास्टिक बैग से भी इसी तरह पैक किया हुआ गांजा मिला। 1.65 लाख रुपए का माल जब्त दोनों आरोपियों के पास से कुल 4.256 किलोग्राम गांजा जब्त किया गया, जिसकी कीमत करीब 85,120 रुपए बताई जा रही है। इसके साथ ही गांजा परिवहन में इस्तेमाल की गई स्कूटी भी जब्त की गई है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 80,000 रुपए है। इस तरह कुल जब्त संपत्ति का मूल्य 1,65,120 रुपए आंका गया है। फिलहाल दोनों आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(बी) के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच की जा रही है।

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NDPS मामलों में सख्ती: रायपुर कोर्ट ने तीन दोषियों को सुनाई कड़ी सजा, कैप्सूल तस्करों को 10-10 साल जेल

नशीले पदार्थों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए रायपुर की विशेष अदालत ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज दो अलग-अलग मामलों में तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई है। ट्रामाडोल कैप्सूल की अवैध तस्करी के मामले में दो आरोपियों को 10-10 वर्ष की सश्रम कैद दी गई है, जबकि 7 किलो से अधिक गांजा रखने के दोषी एक युवक को 7 साल की सजा सुनाई गई है। मामला-1: ट्रामाडोल कैप्सूल बेचते पकड़े गए दो आरोपी विशेष लोक अभियोजक के.के. चंद्राकर के अनुसार, 19 अक्टूबर 2022 को थाना टिकरापारा क्षेत्र में सहायक उपनिरीक्षक विजय नेताम को सूचना मिली थी कि हनुमान नगर, पुराने धमतरी रोड पर दो युवक नशीली कैप्सूल की बिक्री के लिए खड़े हैं। सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने स्वतंत्र गवाहों के साथ मौके पर दबिश दी और घेराबंदी कर दोनों संदिग्धों को पकड़ा। पूछताछ में उनकी पहचान एहसान खान उर्फ एहसान और सरफराज खान उर्फ शाहरुख के रूप में हुई। तलाशी के दौरान दोनों के पास से काले रंग के बैग में रखे ट्रामाडोल कैप्सूल बरामद किए गए। प्रत्येक आरोपी के कब्जे से 144-144 कैप्सूल मिले। आरोपियों के पास न तो किसी तरह का लाइसेंस था और न ही डॉक्टर का कोई वैध पर्चा। पुलिस ने मौके पर ही कैप्सूल को सील कर जब्त किया और एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। जांच पूरी होने और एफएसएल रिपोर्ट आने के बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी मानते हुए 10-10 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई। मामला-2: 7.206 किलो गांजा के साथ युवक गिरफ्तार दूसरा मामला थाना सरस्वती नगर क्षेत्र से जुड़ा है। मुखबिर की सूचना पर पुलिस टीम ने परशुराम चौक, कोटा स्टेडियम के सामने रेड कार्रवाई की। यहां एक संदिग्ध युवक को रोका गया, जिसने अपना नाम भार्गव तांडी उर्फ चीकू तांडी बताया। एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के तहत प्रक्रिया का पालन करते हुए तलाशी ली गई। आरोपी की मोटरसाइकिल से खाकी पॉलीथिन में पैक गांजा बरामद हुआ, जिसका कुल वजन 7.206 किलोग्राम पाया गया। मौके पर ही सैंपलिंग और सीलिंग की गई। एफएसएल रायपुर की रिपोर्ट में गांजा होने की पुष्टि के बाद अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 7 वर्ष की सश्रम कैद की सजा सुनाई।

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बोर्ड परीक्षा से पहले छात्रों को मानसिक संबल: CBSE ने शुरू की साइको-सोशल काउंसलिंग सेवा

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कक्षा 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए निःशुल्क साइको-सोशल काउंसलिंग सेवा के पहले चरण की शुरुआत कर दी है। यह सेवा 6 जनवरी 2026 से 1 जून 2026 तक जारी रहेगी। CBSE के मुताबिक, इस पहल का मुख्य उद्देश्य बोर्ड परीक्षाओं के दौरान छात्रों में होने वाले तनाव, चिंता और भावनात्मक दबाव को कम करना है। ताकि 17 फरवरी 2026 से शुरू होने वाली परीक्षाओं में छात्र आत्मविश्वास और सकारात्मक मानसिकता के साथ शामिल हो सकें। इस योजना का लाभ रायपुर के 86 CBSE स्कूलों के छात्रों को भी मिलेगा। 📞 24×7 टोल-फ्री हेल्पलाइन उपलब्ध छात्र और अभिभावक किसी भी समय 1800-11-8004 पर कॉल कर सहायता प्राप्त कर सकते हैं। यह IVRS आधारित सेवा हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। इसके तहत— 🧠 टेली-काउंसलिंग: विशेषज्ञों से सीधी बातचीत सोमवार से शुक्रवार, सुबह 9:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक, छात्र और उनके अभिभावक टेली-काउंसलिंग का लाभ ले सकते हैं। इस सेवा में कुल 73 प्रशिक्षित विशेषज्ञ शामिल हैं, जिनमें CBSE स्कूलों के प्राचार्य, काउंसलर, विशेष शिक्षक और प्रोफेशनल मनोवैज्ञानिक शामिल हैं। ये विशेषज्ञ भारत के साथ-साथ नेपाल, जापान, कतर, ओमान और यूएई से भी जुड़े हुए हैं। 🌐 ऑनलाइन स्टडी और स्ट्रेस मैनेजमेंट सामग्री CBSE की आधिकारिक वेबसाइट www.cbse.gov.in पर छात्रों के लिए स्ट्रेस मैनेजमेंट, प्रभावी अध्ययन तकनीक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा डिजिटल कंटेंट उपलब्ध कराया गया है, जिसे सरल भाषा में तैयार किया गया है। 📢 CBSE की अपील बोर्ड ने छात्रों और अभिभावकों से अपील की है कि वे परीक्षा अवधि के दौरान इन सुविधाओं का अधिक से अधिक उपयोग करें, ताकि परीक्षा के दबाव को सकारात्मक रूप से संभाला जा सके और बेहतर प्रदर्शन किया जा सके।

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शेयर ट्रेडिंग में मुनाफे का झांसा: रायपुर में 2 करोड़ की ठगी, ओडिशा के कारोबारी से कैश लेकर फरार हुए ठग

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शेयर ट्रेडिंग में मोटा मुनाफा दिलाने का झांसा देकर 2 करोड़ रुपए की बड़ी ठगी का मामला सामने आया है। ओडिशा के कालाहांडी जिले के एक कारोबारी से आरोपियों ने कैश में यह रकम हासिल की और फिर फरार हो गए। पीड़ित की शिकायत पर देवेंद्र नगर थाना पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पीड़ित कारोबारी नेमीचंद जैन के मुताबिक, नवंबर 2025 में उनके मोबाइल फोन पर एक टेलीग्राम ग्रुप का लिंक आया था। ग्रुप में दावा किया गया था कि टाटा कंसलटेंसी के नाम पर निवेश करने पर मात्र 10 दिनों में भारी मुनाफा मिलेगा। 1 लाख रुपए के निवेश पर 30 हजार रुपए प्रॉफिट का लालच दिया गया। शुरुआत में भरोसा जीतने के लिए आरोपियों ने कारोबारी को 30 हजार रुपए का मुनाफा भी दिखाया। इसके बाद उससे बड़ी रकम निवेश करने के लिए लगातार कॉल आने लगे। ठगों के झांसे में आकर कारोबारी ने अपने साले से 2 करोड़ रुपए उधार लिए और रायपुर आकर एक होटल में आरोपियों को कैश सौंप दिया। रकम मिलने के बाद आरोपी लगातार टालमटोल करने लगे और कुछ दिनों बाद अचानक संपर्क तोड़कर फरार हो गए। खुद को ठगा महसूस होने पर पीड़ित ने रायपुर के देवेंद्र नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस का कहना है कि मामला संगठित साइबर और निवेश फ्रॉड से जुड़ा हो सकता है। आरोपियों की तलाश की जा रही है और बैंकिंग व डिजिटल लेन-देन से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा रही है।

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कवासी लखमा से मुलाकात के बाद भूपेश बघेल का हमला, ईडी–ईओडब्ल्यू की कार्रवाई पर उठाए सवाल

रायपुर। रायपुर सेंट्रल जेल में बंद पूर्व आबकारी मंत्री और वरिष्ठ आदिवासी नेता कवासी लखमा से मुलाकात के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना ठोस सबूतों के लखमा और अन्य लोगों को परेशान किया जा रहा है और यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है। मीडिया से बातचीत में भूपेश बघेल ने कहा कि फिलहाल कवासी लखमा का स्वास्थ्य ठीक है और उन्हें जेल में जरूरी दवाइयां मिल रही हैं। उन्होंने बताया कि पिछली मुलाकात के दौरान लखमा को सीने और पैर में दर्द की शिकायत थी, जिसके बाद उन्होंने डीजीपी को पत्र लिखकर मेडिकल जांच की मांग की थी। इसके बाद जेल प्रशासन द्वारा जांच कर इलाज कराया गया। जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव का आरोप भूपेश बघेल ने कहा कि सबसे गंभीर विषय यह है कि जांच एजेंसियों के पास ठोस और तथ्यात्मक सबूतों का अभाव है, इसके बावजूद लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने इसे केवल परेशान करने और दबाव बनाने की रणनीति बताया। पूर्व मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अदालत के निर्देश पर अपनी फाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है, लेकिन आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) अब तक रिपोर्ट दाखिल नहीं कर पाई है। उन्होंने कहा कि बार-बार प्रोडक्शन वारंट जारी कर कवासी लखमा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आदिवासी नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश का हिस्सा है। ‘एजेंसियां खुद को अदालत से ऊपर समझ रही हैं’ भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि कुछ जांच एजेंसियां खुद को अदालत से ऊपर मानने लगी हैं, जो लोकतंत्र और कानून व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया जाएगा, तो यह न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। डिप्टी सीएम अरुण साव के बयान पर तंज डिप्टी सीएम अरुण साव के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भूपेश बघेल ने कहा कि भाजपा नेताओं के मुंह से अनजाने में सच्चाई निकल रही है। उन्होंने कहा कि अरुण साव, केदार कश्यप और रामविचार नेताम जैसे नेताओं के बयानों से यह स्पष्ट होता है कि कवासी लखमा एक निर्दोष आदिवासी नेता हैं, जो पिछले एक साल से जेल में बंद हैं। भूपेश बघेल ने सवाल उठाया कि जब खुद भाजपा नेता उन्हें निर्दोष मान रहे हैं, तो फिर ईओडब्ल्यू की कार्रवाई आखिर किस आधार पर जारी है। आदिवासी राजनीति से जुड़ा मामला राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कवासी लखमा का मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। भूपेश बघेल के लगातार आक्रामक बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस इस मुद्दे को आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक विषय बना सकती है। आदिवासी समाज में भी इस कार्रवाई को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।

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रायपुर सेंट्रल जेल पहुंचे भूपेश बघेल, बोले– अगर मेरे हाथ में होता तो बेटा जेल ही नहीं जाता

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शुक्रवार को रायपुर सेंट्रल जेल पहुंचे, जहां उन्होंने शराब घोटाले के मामले में बंद पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा से मुलाकात की। जेल से बाहर निकलने के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए भूपेश बघेल ने जांच एजेंसियों और भाजपा पर तीखा हमला बोला। बघेल ने आरोप लगाया कि केंद्रीय जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं। उन्होंने अपने बेटे चैतन्य बघेल की जमानत को लेकर उठ रहे सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुछ लोग यह भ्रम फैला रहे हैं कि उन्होंने अपने बेटे को जेल से छुड़वा लिया, जबकि हकीकत यह है कि उसे अदालत से जमानत मिली है। पूर्व सीएम ने कहा, “अगर मेरे हाथ में होता, तो मेरा बेटा जेल जाता ही नहीं। कोर्ट ने जांच एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाई, तभी जाकर उसे जमानत मिली।” कवासी लखमा को लंबे समय तक जेल में रखने की कोशिश भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि कवासी लखमा को जानबूझकर लंबे समय तक जेल में रखने की साजिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में समय पर जवाब दाखिल नहीं किया, जिससे मामले का फैसला टल गया। उन्होंने दावा किया कि यदि एजेंसी समय पर जवाब पेश करती, तो 17 दिसंबर को ही निर्णय आ सकता था। लेकिन जवाब रोका गया ताकि लखमा को जेल में रखा जा सके। भाजपा नेताओं पर निशाना साधते हुए भूपेश बघेल ने कहा कि उनके बयानों से सच्चाई सामने आ रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब कवासी लखमा को निर्दोष बताया जा रहा है, तो फिर EOW और ED की कार्रवाई क्यों जारी है। साथ ही भाजपा नेताओं को “घड़ियाली आंसू” न बहाने की सलाह दी। कौन हैं कवासी लखमा कवासी लखमा बस्तर अंचल के प्रमुख आदिवासी नेताओं में गिने जाते हैं। वे सुकमा जिले की कोंटा विधानसभा सीट से छह बार विधायक रह चुके हैं। 2013 के दरभा घाटी नक्सली हमले में वे उन नेताओं में शामिल थे, जो जीवित बच पाए थे। 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद उन्हें आबकारी मंत्री बनाया गया था। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार के मंत्रियों में से गिने-चुने नेता ही अपनी सीट बचा पाए, जिनमें कवासी लखमा भी शामिल रहे। क्या है छत्तीसगढ़ शराब घोटाला छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) कर रहा है। एजेंसी का दावा है कि करीब 3,200 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ है। इस मामले में एसीबी में दर्ज FIR में राजनेताओं, आबकारी विभाग के अधिकारियों और कारोबारियों के नाम शामिल हैं। ED के अनुसार, पूर्ववर्ती भूपेश सरकार के कार्यकाल में IAS अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के तत्कालीन एमडी एपी त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर के कथित सिंडिकेट के जरिए इस घोटाले को अंजाम दिया गया।

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डिप्टी सीएम अरुण साव पर टिप्पणी को लेकर भूपेश बघेल घिरे, साहू समाज ने जताया विरोध, 10 दिन में माफी की मांग

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा उप मुख्यमंत्री अरुण साव को लेकर की गई विवादित टिप्पणी के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। भूपेश बघेल के बयान से साहू समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है। समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे अपमानजनक बताते हुए पूर्व मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की है। बिलासपुर में साहू समाज ने इस मामले को लेकर एसएसपी कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई है। समाज ने चेतावनी दी है कि यदि भूपेश बघेल ने 10 दिनों के भीतर माफी नहीं मांगी, तो प्रदेशव्यापी उग्र आंदोलन किया जाएगा। जंगल की कहानी से कसा था तंज दरअसल, बिलासपुर दौरे के दौरान भूपेश बघेल ने एक कथित उदाहरण देते हुए उप मुख्यमंत्री अरुण साव पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि जंगल में राजा चुनने की प्रक्रिया में सभी जानवरों ने मिलकर बंदर को राजा बना दिया। यह टिप्पणी सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से वायरल हुई, जिसे साहू समाज ने सीधे तौर पर अरुण साव का अपमान बताया। बयान सामने आने के बाद प्रदेश के कई जिलों में साहू समाज के लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रदर्शन किए और कुछ जगहों पर पुतला दहन भी किया गया। 29 दिसंबर को बिलासपुर में दिया गया था बयान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 29 दिसंबर 2025 को बिलासपुर के लिंगियाडीह क्षेत्र पहुंचे थे। यहां वे बस्ती हटाने के विरोध में चल रहे आंदोलन के समर्थन में शामिल हुए थे। इसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उप मुख्यमंत्री अरुण साव और विधायक अमर अग्रवाल पर तीखी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने लिंगियाडीह क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे और स्थानीय लोगों से आंदोलन जारी रखने की अपील की थी। इसी भाषण के दौरान उन्होंने अरुण साव को लेकर विवादित टिप्पणी की, जिसे अब समाज विशेष के अपमान के रूप में देखा जा रहा है। जशपुर में सौंपा गया ज्ञापन जशपुर जिले में भी साहू समाज ने पूर्व मुख्यमंत्री के बयान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। समाज के प्रतिनिधियों ने जशपुरनगर में एसएसपी शशि मोहन सिंह को ज्ञापन सौंपते हुए 10 दिनों के भीतर माफी की मांग की है। जिला साहू संघ के अध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता ने कहा कि उप मुख्यमंत्री अरुण साव साहू समाज के प्रतिनिधि हैं और एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। ऐसे में उनके खिलाफ इस तरह की टिप्पणी न केवल व्यक्तिगत बल्कि पूरे समाज का अपमान है। सक्ती जिले में भी आक्रोश सक्ती जिले में भी 5 जनवरी को जिला साहू संघ ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई की मांग की। जिला अध्यक्ष डॉ. खिलावन साहू ने प्रेस वार्ता में कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री की टिप्पणी असंवेदनशील और निंदनीय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहू समाज अपनी गरिमा से समझौता नहीं करेगा और यदि माफी नहीं मांगी गई तो संगठित रूप से आंदोलन किया जाएगा।

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जिला अस्पतालों में चार गुना बढ़ेगा दवाओं का स्टॉक, अब गांव के अस्पतालों में भी मिलेंगी शुगर-थायराइड की दवाएं

राज्य सरकार ने ग्रामीण और जिला स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा फैसला लिया है। अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में सर्दी-जुकाम, बुखार और उल्टी-दस्त के साथ-साथ शुगर, थायराइड और खून पतला करने वाली दवाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। अभी तक ये दवाएं केवल जिला अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों में ही मिलती थीं, जिससे ग्रामीण मरीजों को बार-बार शहर जाना पड़ता था। स्वास्थ्य विभाग ने आवश्यक दवाओं की सूची में बड़ी बढ़ोतरी की है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं की संख्या 146 से बढ़ाकर 247 कर दी गई है, जबकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में यह संख्या 196 से बढ़कर 365 हो जाएगी। इससे गांवों में रहने वाले मरीजों को अपने ही क्षेत्र में बेहतर इलाज मिल सकेगा। जिला अस्पतालों में 208 से बढ़कर 807 होंगी दवाएं जिला अस्पतालों में भी दवाओं के स्टॉक में बड़ा इजाफा किया गया है। वर्तमान में जहां जिला अस्पतालों में 208 प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं, वहीं अब इनकी संख्या बढ़ाकर 807 की जा रही है। इसका मतलब यह है कि जो दवाएं अब तक केवल मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में मिलती थीं, वे सुविधा अब जिला अस्पतालों में भी मरीजों को मिलेंगी। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती होने के बावजूद दवाओं की कमी के कारण गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता था। दवाओं की उपलब्धता बढ़ने से अब अधिकतर मरीजों का इलाज जिला अस्पतालों में ही संभव हो सकेगा, जिससे मेडिकल कॉलेजों पर मरीजों का दबाव भी कम होगा। केंद्र सरकार के निर्देशों के तहत लिया गया फैसला यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए इंडियन प्राइमरी हेल्थ सिस्टम के तहत लिया गया है। इस प्रणाली के अनुसार गांव-गांव के अस्पतालों में अधिकतम दवाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। राज्य सरकार ने इसी दिशा में कदम उठाते हुए ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थानों में दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने का फैसला किया है। उप स्वास्थ्य केंद्रों में भी बढ़ेंगी सुविधाएं अब उप स्वास्थ्य केंद्रों में भी केवल सामान्य दवाओं तक सीमित व्यवस्था नहीं रहेगी। यहां 146 प्रकार की दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जिनमें एंटीबायोटिक और दर्द निवारक इंजेक्शन भी शामिल होंगे। इससे उप स्वास्थ्य केंद्रों में वही सुविधाएं मिलेंगी, जो अब तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित थीं। सीएचओ देंगे दवाएं, जांच जरूरी राज्य के सभी उप स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO) मरीजों को शुगर और थायराइड जैसी बीमारियों की दवाएं देंगे। हालांकि, मरीज को कम से कम एक बार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराना अनिवार्य होगा। ग्रामीण मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत स्वास्थ्य संचालक संजीव झा ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में दवाओं की कमी से मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। अब गंभीर बीमारियों की दवाएं नजदीक मिलने से मरीजों को राहत मिलेगी। इस नई व्यवस्था की नियमित समीक्षा भी की जाएगी और यदि कोई कमी सामने आती है तो उसे दूर किया जाएगा, ताकि यह सिस्टम बेहतर तरीके से काम कर सके।

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