छत्तीसगढ़ शराब घोटाला: आबकारी अधिकारी समेत 59 लोगों की ED कोर्ट में पेशी
रायपुर। छत्तीसगढ़ में शराब घोटाले की जांच में आज ईडी (Enforcement Directorate) की विशेष अदालत में कुल 59 लोग पेश हुए। इन लोगों में आबकारी विभाग के अधिकारी भी शामिल थे। सुबह से ही कोर्ट परिसर में भारी भीड़ जमा रही। इससे पहले पिछले तीन दिनों में EOW (Economic Offences Wing) ने दो शराब निर्माता कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उनके ट्रक जब्त किए थे। वहीं, कांग्रेस प्रदेश कार्यालय में काम करने वाले अकाउंटेंट समेत चार कर्मचारियों को भी पूछताछ के लिए EOW दफ्तर तलब किया गया था। शराब घोटाले की जांच कर रही एजेंसियां प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल की तलाश कर रही हैं, जो कई सालों से फरार हैं। एजेंसियों का मानना है कि उनके दस्तावेज और भूमिका मामले की जांच में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। मामला क्या है? EOW ने इस मामले में ACB (Anti-Corruption Bureau) में FIR दर्ज की है। FIR में लगभग 3200 करोड़ रुपये के घोटाले का जिक्र है। इसमें राजनेता, आबकारी विभाग के अधिकारी और कारोबारी शामिल हैं। ED की जांच में सामने आया कि तत्कालीन भूपेश सरकार के कार्यकाल में IAS अफसर अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के एमडी AP त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर के नेतृत्व में सिंडिकेट के जरिए यह घोटाला किया गया। घोटाले की रणनीति घोटाले को तीन श्रेणियों में बांटा गया: A: डिस्टलरी संचालकों से कमीशन2019 में डिस्टलरी संचालकों से प्रति पेटी 75 रुपए और बाद में 100 रुपए कमीशन लिया गया। इसके लिए शराब की कीमत बढ़ाई गई और ओवर बिलिंग की अनुमति दी गई। B: नकली होलोग्राम वाली शराब की बिक्रीसिंडिकेट ने सरकारी दुकानों में नकली होलोग्राम वाली शराब बेची। इसके लिए खाली बोतलें डिस्टलरी तक पहुंचाने और परिवहन की जिम्मेदारी अरविंद सिंह और उनके भतीजे अमित सिंह को दी गई। शराब बिक्री के लिए प्रदेश के 15 जिलों को चुना गया और दुकानों में बिक्री का रिकॉर्ड सरकारी कागजों में दर्ज नहीं किया गया। शुरुआत में प्रति पेटी की कीमत 2880 रुपए थी, बाद में इसे 3840 रुपए कर दिया गया। C: डिस्टलरीज के सप्लाई एरिया में बदलावदेशी शराब की सप्लाई के लिए डिस्टलरीज के क्षेत्र को आठ जोन में बांटा गया। सिंडिकेट ने ज़ोन के आधार पर कमीशन वसूला। तीन वित्तीय वर्षों में डिस्टलरीज ने लगभग 52 करोड़ रुपए C पार्ट के रूप में सिंडिकेट को दिए। अधिकारियों का मानना है कि अब तक मिले साक्ष्य इस घोटाले की गंभीरता को साबित करते हैं और आगे और बड़े खुलासे संभव हैं।
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