मैं टोनही नहीं हूं 20–21 साल से इंसाफ की लड़ाई, कोई कोर्ट में भटक रही तो कोई समाज से जूझ रही
छत्तीसगढ़ में आज भी कई महिलाएं “टोनही” (डायन) का ठप्पा लगने के बाद अमानवीय यातनाएं झेलने को मजबूर हैं। किसी की आंखें फोड़ दी गईं, किसी को घर से बेदखल कर दिया गया, तो किसी को गांव से बहिष्कृत कर दिया गया। इन पीड़ित महिलाओं का संघर्ष केवल हमलावरों से नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था दोनों से है—और यह संघर्ष 20 से 21 सालों से जारी है। एक पीड़िता श्याम बाई जब अपने घर की खाट पर बैठी मिलीं, तो उन्होंने दर्द भरी आवाज में कहा—“मुझे टोनही कहकर मारा गया, पीटा गया। मेरी और मेरे पति की आंखें फोड़ दी गईं। घर छीन लिया गया, लेकिन आरोपी खुले घूम रहे हैं।” उनके गांव की दीवारों पर आज भी चेतावनी लिखी है—महिला को मारने पर जेल होगी, टोनही कहने पर 13 साल की सजा—लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। पुनर्वास को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं सामाजिक संगठनों का कहना है कि राज्य में टोनही पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए अब तक कोई ठोस सरकारी नीति नहीं बनी है। इसी वजह से मांग उठ रही है कि कम से कम पीड़िताओं को न्याय के साथ जीवन दोबारा शुरू करने का अवसर मिले। प्रमुख मांगें: डराने वाले आंकड़े, हकीकत और भी भयावह ये तो सिर्फ दर्ज मामले हैं, असल संख्या इससे कहीं ज्यादा बताई जाती है। विशेषज्ञों की राय: मुआवजे का अलग प्रावधान जरूरी डॉ. दिनेश मिश्रा, अध्यक्ष, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति, कहते हैं कि टोनही प्रताड़ना के सैकड़ों मामले सालों से अदालतों में लंबित हैं। पीड़िताएं सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक तंगी झेल रही हैं, लेकिन मुआवजे और पुनर्वास को लेकर कोई स्पष्ट योजना नहीं है।उनका सवाल है—जब सड़क हादसे, करंट या सांप के काटने पर मुआवजा मिल सकता है, तो टोनही जैसे गंभीर अपराध में क्यों नहीं? वहीं गजेंद्र सोनकर, सरकारी वकील (रायपुर कोर्ट) बताते हैं कि कानून में अधिकतम 5 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है, और जुर्माने से ही मुआवजा दिया जाता है। कानून सख्त है, लेकिन जागरूकता और प्रभावी क्रियान्वयन की भारी कमी है। 22 साल बाद भी इंसाफ अधूरा 17 नवंबर 2025 को रायपुर की अदालत ने गरियाबंद जिले के लचकेरा गांव की तीन पीड़ित महिलाओं को सूचना दी कि आरोपियों से वसूले गए जुर्माने से उन्हें 75-75 हजार रुपये मुआवजा मिलेगा। यह मामला 2003 का है, जब महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया गया, मारपीट की गई और अमानवीय यातनाएं दी गईं।22 साल बाद भी आरोपी बरी हैं और पीड़िताएं मुआवजे के लिए आज भी अदालतों के चक्कर काट रही हैं। क्या कहता है कानून? टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005 के तहत: छत्तीसगढ़ में मामलों की गंभीरता को देखते हुए अलग कानून तो बना, लेकिन उसका असर अब तक जमीन पर पूरी तरह नहीं दिखा।

